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तीन दशक बाद दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने की तैयारी में डबल-डेकर बसें; क्या लौटेगी पुरानी याद या चुनौतियां पड़ेंगी भारी

दिल्ली की सड़कों पर कभी रौनक बढ़ाने वाली डबल-डेकर बसें अब आधुनिक इलेक्ट्रिक रूप में वापसी की तैयारी कर रही हैं। 1989 में बंद हुई ये बसें अब ईको फ्रेंडली तकनीक से लैस होकर फिर से राजधानी की पहचान बनने जा रही हैं। अशोक लीलैंड ने CSR के तहत DTC को इलेक्ट्रिक डबल-डेकर बसें सौंपी हैं। दिल्ली पर्यटन के लिए भी एक नई डबल डेकर बस का ट्रायल होना है, तो ऐसे में क्या ये बसें फिर शुरू हो पाएंगी? आइए जानते हैं, क्यों बंद हो गई थी ये बसें और अब क्या है चुनौतियां।

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Photo : TN Innovations
दिल्ली में एक बार फिर दिखाई दे सकती हैं डबल-डेकर बसें (AI Image)
Authored by: निशांत तिवारी
Updated Dec 8, 2025, 16:05 IST
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Delhi Double Decker Bus: दिल्ली के पुराने रहवासियों को पक्का पता होगा कि दिल्ली की सड़कें भी कभी डबल-डेकर बसों से गुलजार हुआ करती थीं। लेकिन भला हो सोशल मीडिया का कि इस जानकारी से जेन-जी भी अछूते नहीं रहे। बीते दिनों तस्वीरों के वायरल होने के बाद शायद ही यह बात किसी से छुपी हो कि दिल्ली की सड़कों पर भी कभी डबल-डेकर बसें दौड़ा करती थीं। अब नई खबर ये है कि दिल्ली की पहचान रहीं ये डबल-डेकर बसें एक बार फिर राजधानी की सड़कों पर लौटने वाली हैं। 1989 में बंद होने के बाद यह बसें अब आधुनिक, इलेक्ट्रिक और पर्यावरण अनुकूल रूप में वापसी की तैयारी कर रही हैं। सरकार ने एक इलेक्ट्रिक डबल-डेकर बस को ट्रायल को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं और जल्द ही इसे चुनिंदा रूटों पर उतारे जाने की संभावना है। लेकिन ये इतना आसान भी नहीं है, यह ईको फ्रेंडली पहल खुद से जुड़ी पुरानी यादों, तकनीक और चुनौती तीनों का अनोखा संगम बनकर उभर रही है... आइए जानते हैं इसके बारे में।

जब ‘सुविधा बस’ थी दिल्ली की रौनक

कभी DTC की ‘सुविधा बस’ के नाम से जानी जाने वाली डबल-डेकर बसें दिल्ली की रोजमर्रा की तस्वीर का हिस्सा थीं। 1970 से लेकर 1980 के दशक के अंत तक लाल रंग की ये दो मंजिला बसें शहर की व्यस्त सड़कों पर दौड़ती थीं और स्कूली बच्चों से लेकर ऑफिस जाने वालों तक, सभी के लिए सफर को आसान बनाने के साथ रोमांच भी लाती थीं। ऊपर के डेक पर बैठने का अनुभव दिल्लीवासियों के लिए किसी छोटे रोमांच से कम नहीं होता था। लेकिन समय के साथ इन बसों की मरम्मत मुश्किल होती गई। बढ़ती ट्रैफिक, पुराने इंजन, प्रदूषण से जुड़े नियमों और रखरखाव की भारी लागत ने इन्हें धीरे-धीरे बेअसर बना दिया। 1989 में शहर CNG मॉडल की ओर बढ़ रहा था, और यही वह समय था जब डबल-डेकर बसें दिल्ली की सड़कों से गायब हो गईं।

कई बार लौटने की कोशिश, लेकिन हर बार अधूरा सपना

साल 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान इन्हें फिर से शुरू करने का विचार किया गया, लेकिन ऊंचाई, रूट की दिक्कत और तकनीकी समस्याओं के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

2011 के आसपास एक बार फिर दिल्ली में टूरिस्ट-रूट के लिए 'हॉप-ऑन हॉप-ऑफ (HoHo)' सेवा में ओपन-टॉप डबल-डेकर लाने का विचार भी हुआ, लेकिन दिल्ली की भारी ट्रैफिक और बसों की टाइमिंग के बीच लंबे गैप के कारण यह मॉडल भी सफल नहीं हो सका।

2022 में G20 की तैयारी के दौरान भी डबल-डेकर बसों को फिर से लाने की योजना बनी। CESL ने 100 डबल-डेकर इलेक्ट्रिक बसें दिल्ली को देने की घोषणा भी कर दी थी, लेकिन फीजिबिलिटी की जांच में पता चला कि कई रूटों पर पेड़, बिजली की तारें और फ्लाईओवर, इन बसों के लिए खतरा बन सकते हैं, और मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया।

delhi double decker bus feature.

delhi double decker bus feature.

अब आधुनिक इलेक्ट्रिक अवतार में वापसी

अब फिर से उम्मीद जगी है। अशोक लीलैंड ने CSR (Corporate Social Responsibility) के तहत कुछ इलेक्ट्रिक डबल-डेकर बसों को DTC को सौंपा है, जो अब ओखला डिपो में टेस्टिंग के लिए तैयार खड़ी है। यह बिल्कुल नए जमाने की तकनीक से लैस है। 9.8 मीटर लंबी और 4.75 मीटर ऊंची यह बस 63 यात्रियों को एक साथ बैठा सकती है। सामान्य DTC बसों से तुलना करें तो यह क्षमता इनके मुकाबले लगभग तीन गुना है।

एक डबल-डेकर को दिल्ली के पर्यटन सर्किट पर चलाने की भी तैयारी है। योजना है कि यह बस प्रधानमंत्री संग्रहालय से शुरू होकर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, भारत मंडपम, नए संसद भवन और दिल्ली हाट जैसी जगहों पर पर्यटकों को घुमाएगी। शाम 6 बजे के बाद चलने वाली इस टूरिस्ट सेवा के लिए 500 रुपये (वयस्क) और 300 रुपये (बच्चों) का किराया तय किया गया है। इसके साथ एक ट्रेंड गाइड भी यात्रियों को जगहों के इतिहास से जुड़ी जानकारी देगा।

delhi double decker tour.

delhi double decker tour.

इस बार क्या हैं चुनौतियां?

दिल्ली में डबल-डेकर चलाने की सबसे बड़ी समस्या इसकी ऊंचाई है। शहर की कई सड़कों पर अब भी पेड़ों की डालियां, लटकते तार और कम ऊंचाई वाले पुल, ओवरब्रिज मौजूद हैं। अधिकारियों को हर संभावित रूट पर पेड़ों की ऊंचाई नापनी पड़ रही है और बिजली की लाइनों की सुरक्षा जांच करनी पड़ रही है। इसके अलावा एक चुनौती बस का वजन भी है। इलेक्ट्रिक मॉडल पुराने डीजल मॉडल से भारी है, जिससे बैटरी की रेंज छोटी रूटों पर पहले टेस्टिंग के बाद ही साफ हो पाएगी। संकरी सड़कों और भारी ट्रैफिक में इतनी ऊंची बस को मोड़ना भी आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी बसें उन रूटों पर ही सफल होंगी जहां यात्रा लंबी हो और यात्री आराम से ऊपरी डेक तक जाने को तैयार हों। छोटे, भीड़भाड़ वाले रूट इन बसों की क्षमता को सीमित कर सकते हैं।

दिल्ली की सड़कों पर पुरानी शान की नई कहानी?

दिल्ली सरकार का उत्साह और नई बस का आधुनिक अंदाज यह संकेत देता है कि तीन दशक पहले जो कहानी अधूरी रह गई थी, उसे फिर से शुरू करने की कोशिश हो रही है। यह सिर्फ एक बस नहीं, राजधानी की एक याद का फिर सजीव होना है जो अब ईको फ्रेंडली होने के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने के नए उद्देश्य से जुड़ रहा है। समय बहुत कम रह गया है, अगले कुछ ही महीनों में यह साफ हो जाएगा कि डबल-डेकर बसें सिर्फ पुराने जमाने की याद बनकर रहेंगी या असल में दिल्ली की सड़कों पर फिर से पूरी शान के साथ दौड़ती नजर आएंगी।

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