Vande Mataram controversy: केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अमित शाह (Amit Shah) ने आज यानी शुक्रवार 10 अप्रैल को न्यूटाउन कोलकाता स्थित BJP कार्यालय में ‘वंदे मातरम संग्रहालय’ का विषय उठाया। इस मामले पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हम वंदे मातरम की परिकल्पना के जरिए बंगाल की संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने के लिए एक ‘वंदे मातरम संग्रहालय’ स्थापित करेंगे। ज्ञात हो कि हाल में वंदे मातरम पर विवाद काफी ज्यादा चर्चा का विषय रहा है। इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा तक हुई। चलिए जानते हैं वंदे मातरम विवाद क्या है?
वंदे मातरम विवाद क्या था?
वंदे मातरम, भारत का राष्ट्रीय गीत है। यह गीत जितना पुराना है, उतना ही पुराना इस गीत का विवादों से नाता भी है। वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता देने और इस गीत के हालिया इस्तेमाल को लेकर खूब राजनीति हुई है। क्योंकि इस गीत को लिखने वाले बंकिंम चंद्र चटर्जी बंगाल से ही आते थे। हालिया विवाद की बात करें तो यह तब सामने आया, जब इस राष्ट्रीय गीत की 150वीं जयंती मनाने का फैसला किया गया। नवंबर 2025 में इसको लेकर पक्ष-विपक्ष में जमकर आरोप-प्रत्यारोप हुए। इस विवाद के एक तरफ केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और दूसरी तरफ कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस (TMC) सहित तमाम विपक्ष मौजूद रहा।
वंदे मातरम गीत को लेकर विवाद की शुरुआत नवंबर 2025 में संसद सत्र के दौरान हुई। तब सत्तारूढ़ दल के कुछ सांसदों ने यह सुझाव दिया कि 'वंदे मातरम' को सभी सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों में अधिक व्यापक रूप से अपनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह गीत राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है और इसे और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
विपक्षी दलों ने सरकार और सत्तारूढ़ दल के इस सुझाव पर आपत्ति जताई। विपक्ष ने कहा कि वंदे मातरम एक ऐतिहासिक और भावनात्मक गीत है, लेकिन इसे किसी भी तरह की अनिवार्यता या राजनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इस दौरान यह भी कहा कि देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक को सभी पर थोपना उचित नहीं है।
'वंदे मातरम भारत की आत्मा का प्रतीक'
भाजपा नेताओं ने इस बयान का विरोध करते हुए कहा कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम की भावना से जुड़ा है और इसे राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना था कि वंदे मातरम भारत की आत्मा का प्रतीक है और इसका सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है।
गणतंत्र दिवस परेड में वंदे मातरम पर संस्कृति मंत्रालय की झांकी
पीएम मोदी बोले, नेहरू ने समझौता किया
वंदे मातरम की 150वीं जयंती के अवसर पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा हुई। दिसबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर चर्चा के दौरान लोकसभा में अपनी बातें रखीं। उन्होंने आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने मोहम्मद अली जिन्ना के विरोध में इस गीत के साथ धोखा दिया। पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो अंतरों को आत्मसात करने से ही विभाजन की नींव पड़ी।
'सिर्फ दो अंतरे रखने का फैसला सामूहिक'
विपक्ष ने पीएम मोदी के इन आरोपों का विरोध भी किया। TMC नेता महुआ मोइत्रा और वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा सहित तमाम बड़े-बड़े नेताओं ने विपक्ष की तरफ से मोर्चा संभाला। विपक्ष ने आरोप लगाया कि वह बंगाल चुनाव में फायदा लेने के लिए भाजपा इतिहास का हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। विपक्ष का कहना था कि वंदे मातरम के पहले दो अंतरों को रखने का फैसला साल 1937 में रविंद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर सामूहिक रूप से लिया गया, ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे।
वंदे मातरम पर नेताओं के बयान
लोकसभा में 'राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चर्चा' में भाग लेते हुए भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि वंदे मातरम से 'हमें एनर्जी' मिलती है, वहीं विपक्षी दल को इससे 'एलर्जी' होती है। उन्होंने आगे कहा, 'वंदे मातरम् गीत नहीं राष्ट्रीय प्रीत है इसलिए कांग्रेस इससे भयभीत है। सपा सांसद अबु आजमी ने कहा कि मैं वंदे मातरम नहीं कर सकता, क्योंकि इस्लाम मुझे इसकी इजाजत नहीं देता। लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा था कि देश का ध्यान जरूरी मुद्दों से भटकाने के लिए सदन में वंदे मातरम पर बहस की जा रही है।
वंदे मातरम पर नया प्रोटोकॉल
सरकार ने वंदे मातरम के गायन को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जनवरी 2026 में इसको लेकर एक नया प्रोटोकॉल जारी कर दिया। नए प्रोटोकॉल के तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के दौरान खड़े रहना अनिवार्य कर दिया गया। इसके साथ ही पहले से हटा दिए गए अंतरों को भी इसमें फिर से जोड़ दिया गया।
व्याख्याओं से जुड़ा है विवाद
वंदे मातरम को लेकर विवाद इसके ऐतिहासिक और धार्मिक अर्थों की अलग-अलग व्याख्याओं से जुड़ा है। पहले दो श्लोकों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन है, लेकिन बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ (1882) के बाद के हिस्सों में राष्ट्र को देवी दुर्गा से जोड़ा गया है, जिसे कुछ मुस्लिम समूह अपने एकेश्वरवाद के खिलाफ मानते हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों जैसे अरविंदो घोष और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए महामंत्र था। वहीं आलोचक आनंदमठ के कथित उग्र हिंदू संदर्भों पर सवाल उठाते हैं। पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इसे बंगाली पहचान का मुद्दा बताकर रवींद्रनाथ टैगोर जैसे आइकनों के सम्मान की बात करती है, जबकि भाजपा टीएमसी पर वोट बैंक राजनीति का आरोप लगाती है।
