Mumbai News: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में शिक्षा विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर संदीप सांगवे पर एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर को वैध पेंशन लाभ से वंचित करने के लिए कड़ा रुख अपनाते हुए 5 लाख का जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह जुर्माना सांगवे को व्यक्तिगत रूप से भरने का आदेश दिया है। यह राशि सीधे "आर्म्ड फोर्स बैटल कैजुअल्टी वेलफेयर फंड" में जमा कराई जाएगी।
कोर्ट ने लगाया 5 लाख का जुर्माना (सांकेतिक तस्वीर)
आदेश नहीं मानने की है आदत
जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस मिलिंद साथाये की पीठ ने इस मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सांगवे जैसे अधिकारी "आदतन हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना" करते हैं और कानून का कोई सम्मान नहीं रखते। अदालत ने साफ किया कि यदि सांगवे यह राशि खुद नहीं भरते हैं तो इसे उनकी सैलरी से काट लिया जाएगा।
क्या है मामला?
मामला ठाणे के बी.एन. बांदोडकर साइंस कॉलेज के प्रोफेसर अनिल अथावले से जुड़ा है। अथावले ने 2000 से 2007 तक पार्ट-टाइम और फिर 2007 से 31 मई 2024 को सेवानिवृत्ति तक पूर्णकालिक शिक्षक के रूप में काम किया। उन्हें पुरानी पेंशन योजना (OPS) के तहत पेंशन मिलनी चाहिए थी।
हालांकि, संदीप सांगवे ने जून 2023 में यह कहकर लाभ से इनकार कर दिया कि अथावले की फुल टाइम नियुक्ति नवंबर 2005 की कटऑफ तारीख के बाद हुई थी, इसलिए OPS लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने जुलाई 2024 में इस तर्क को खारिज करते हुए अथावले को OPS लाभ देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा ‘परेशान करने की मंशा’
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सांगवे ने इसके पालन की बजाय समीक्षा याचिका दाखिल की, जिसे कोर्ट ने दुर्भावनापूर्ण और केवल प्रोफेसर को परेशान करने के उद्देश्य से दायर बताया। कोर्ट ने कहा, "एक नागरिक को उसका वैध अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं मिल पा रहा है क्योंकि एक सरकारी अधिकारी जिद और दुर्भावना से आदेश की अवहेलना कर रहा है।"
पहले भी लग चुका है जुर्माना
यह कोई पहला मामला नहीं है जब सांगवे पर कार्रवाई हुई हो। अक्टूबर 2024 में, उन पर 11 अवमानना याचिकाओं में 3.3 लाख का जुर्माना भी लगाया गया था। यह स्पष्ट करता है कि सांगवे ने न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने की आदत बना ली थी।
कोर्ट का सख्त संदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले से न केवल प्रोफेसर अथावले को न्याय मिला, बल्कि यह भी संदेश गया कि कोई भी सरकारी अधिकारी अपनी कुर्सी का दुरुपयोग करके नागरिकों को उनके वैध अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि पेंशन कोई अनुग्रह नहीं, बल्कि सम्मानजनक सेवानिवृत्ति का अधिकार है।
