नई दिल्ली: महाराणा प्रताप इतिहास के उन योद्धाओं में शुमार होते हैं जिन्होंने मुगलों को घुटनों पर ला खड़ा किया। गुरुवार को महाराणा प्रताप की 485वीं जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। महाराणा प्रताप ने मातृभूमि की रक्षा के लिए राजमहलों का वैभव त्याग कर जंगलों का कष्टमय जीवन जीया, लेकिन आजीवन अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं किया। महाराणा प्रताप महान योद्धा, परम स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रेमी थे जिन्होंने सदैव सत्य, धर्म और राष्ट्रहित के मार्ग पर चलना सिखाया।
14 महीने माउंट आबू के घने जंगलों में रहें
महाराणा प्रताप माउंटआबू के घने जंगलों में रहें। हल्दीघाटी युद्ध के बाद यहीं रहें और महाराणा प्रताप ने यहीं से फिर विजय प्राप्त की थी। माउंट आबू राजस्थान की गौरव गाथाओं में महाराणा प्रताप का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है । मुगलों से लोहा लेते हुए वह युद्ध के बाद 14 महीने तक माउंट आबू में रहे थे और यहीं से बाद में महाराणा प्रताप ने उदयपुर और हल्दीघाटी पर विजय हासिल की थी।
438 साल पहले महाराणा प्रताप 14 माह तक रहे
माउंटआबू के गुरुशिखर से नीचे की ओर घना जंगल है जो ऐसा है कि आज भी वहां जाना मुश्किल है । बिना किसी स्थानीय व्यक्ति के मदद के आप यहां नहीं पहुंच सकते। ऐसे स्थान पर आज से करीब 438 साल पहले महाराणा प्रताप 14 माह तक रहे। लेकिन अफसोस इस बात का है कि एक भी स्मृति माउंट आबू नगर पालिका अबतक बनवा पाने में नाकाम रही है। राज्य सरकार ने इस साल महाराणा प्रताप सर्किट के लिए 100 करोड़ स्वीकृत किए हैं तो लगता है अगले साल तक माउंट आबू में महाराणा प्रताप अपने चेतक के घोड़े पर एक स्मारक के रूप में दिखेंगे ।
महाराणा ने जहां की तपस्या
माउंट आबू का शेरगांव उनकी तपस्या स्थल का प्रमाण है। उदयपुर हल्दीघाटी मैं उनकी वीरगाथाएं किसी से छिपी नहीं है । माउंट आबू के शेर गांव में सालों रहे और जहां तपस्या करते थे वहां शिव मंदिर भी आज भी मौजूद है जिसका प्रमाण हमारी कई पुस्तकों में मिलते हैं । लेकिन अफसोस नगर पालिका माउंट आबू द्वारा 2002 से नगर पालिका मंडल बोर्ड द्वारा 15 लाख स्वीकृत होने के बाद भी चेतक के घोड़े पर महाराणा प्रताप उनकी स्मृति स्थल या उद्यान के रुप में कुछ भी अभी तक नहीं बना पाया है। राज्य सरकार ने महाराणा प्रताप की गाथाओं के लिए इस साल के बजट में 100 करोड़ का प्रावधान किया है ताक महाराणा प्रताप के सर्किट को विकसित किया जा सकें।
सरकार का उदासीन रवैया
महाराणा प्रताप की वीर गाथाओं की बात आती है तो माउंट आबू भी उसमें जुड़ा रहता है क्योंकि अज्ञातवास के समय वे माउंट आबू में रहे थे । आबू में उनके लिए स्मृति स्थल आदि उद्यान बनाने की बात होती रही । माउंट आबू के चुंगी नाके पर एक उद्यान है जो महाराणा प्रताप स्मारक के रूप में जाना जाता है लेकिन जो उनके नाम को माउंट आबू की पहचान देनी थी उसकी बात राजस्थान के मुख्यमंत्री के द्वारा भी होती रही नगर पालिका में कई बार उनके स्मारक बनाने की बात होती रही और उदयपुर की तरह घोड़े पर विराजे महाराणा प्रताप लगाने के लिए कई बार प्रस्ताव लिए जा चुके लेकिन अभी भी माउंट आबू में उनकी स्मृतियां अधूरी है।
