Jodhpur: राजस्थान की एक युवती (बदला हुआ नाम 'खुशबू') ने समाज की एक ऐसी कुप्रथा के खिलाफ जंग जीती है, जिसने उसके बचपन को निगल लिया था। जोधपुर के फैमिली कोर्ट के जज वरुण तलवार ने खुशबू की उस शादी को 'शून्य' (Annul) घोषित कर दिया, जो साल 2016 में तब हुई थी जब वह 12 साल की थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बाल विवाह बच्चों के वर्तमान और भविष्य दोनों को प्रभावित करता है और इसे खत्म करने के लिए समाज को मिलकर कदम उठाने चाहिए।
10 साल बाद कोर्ट ने शादी को रद्द किया (AI Image)
खेलने की उम्र में हुई थी 'बड़ों की जिद'
बिश्नोई समुदाय से ताल्लुक रखने वाली खुशबू बताती हैं कि जब उसकी शादी तय हुई, उसे समझ ही नहीं था कि उसके चारों ओर क्या हो रहा है। समाज के बड़े-बुजुर्गों ने रीति-रिवाजों का हवाला देकर यह शादी तय कर दी थी। खुशबू के मुताबिक, "मेरे माता-पिता की भी इसमें बहुत कम चली थी।" यह शादी एक रस्म 'मौसर' (मृत्युभोज) के दौरान सामूहिक विवाह के रूप में हुई थी, जहां अक्सर परंपराओं को कानून से ऊपर रखा जाता है।
जब ससुराल का दबाव बना 'टर्निंग पॉइंट'
जैसे-जैसे खुशबू बड़ी हुई, उसे अहसास हुआ कि वह एक ऐसे रिश्ते में बंधी है जिसे उसने कभी चुना ही नहीं। असली संघर्ष तब शुरू हुआ जब ससुराल वालों ने विदाई करने और वैवाहिक जीवन शुरू करने का दबाव बनाना शुरू किया। खुशबू किसी भी कीमत पर उस बंधन में नहीं बंधना चाहती थी। उसने हिम्मत दिखाई, पुलिस से संपर्क किया और फिर उनकी मुलाकात सारथी ट्रस्ट की कृति भारती से हुई।
बहन का साथ और कानूनी जंग
खुशबू बताती हैं कि शुरुआत में परिवार हिचकिचा रहा था, लेकिन उनकी बड़ी बहन, जिसका खुद बाल विवाह हुआ था, ने खुशबू का पूरा साथ दिया। कृति भारती की मदद से 18 महीने पहले फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की गई। ससुराल पक्ष ने दावा किया कि शादी वयस्क होने पर हुई थी, लेकिन खुशबू ने अपने उम्र के दस्तावेज पेश कर सच साबित कर दिया।
अब उड़ान भरने की तैयारी
शादी रद्द होने के बाद खुशबू ने अपनी रुकी हुई पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है। सातवीं के बाद स्कूल छोड़ने वाली यह बेटी अब ओपन स्कूलिंग के जरिए दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही है। खुशबू का कहना है, "मेरी बड़ी बहन का सपना है कि मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं और आत्मनिर्भर बनूं।"
