Delhi News: दिल्ली में मजदूरों की भलाई के नाम पर 3579 करोड़ रुपये का फंड इकट्ठा तो किया गया, लेकिन ज्यादातर पैसा या तो रजिस्टरों में गुम है या अधिकारियों की लापरवाही में उलझा हुआ है। फंड से जुड़ा सवाल अब बेहद गंभीर हो गया है, क्योंकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारी-भरकम रकम तो इकट्ठी हुई लेकिन इसका लाभ जमीन पर मजदूरों को शायद ही मिल पाया हो। ज्यादातर पैसा लालफीताशाही और लापरवाही का शिकार हो गया।
मजदूरों के फंड का नहीं मिला पूरा फायदा (सांकेतिक तस्वीर)
सिर्फ 2 लाख मजदूरों का पुख्ता रिकॉर्ड
CAG रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में करीब 7 लाख निर्माण श्रमिक रजिस्टर्ड हैं लेकिन इनमें से केवल 1.98 लाख मजदूरों का ही पुख्ता डेटा उपलब्ध है। कई रजिस्ट्रेशन फाइलों में एक ही मजदूर की कई तस्वीरें पाई गईं, तो कहीं तस्वीरें ही गायब थीं। रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण की दर भी महज 7.3 फीसदी ही है, जबकि राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी है। इससे साफ होता है कि योजनाएं ना तो ठीक से लागू हुईं और ना ही उनका दायरा मजदूरों तक पहुंच पाया।
फंड का हाल
मार्च 2023 तक दिल्ली सरकार के पास कुल 3579 करोड़ रुपये जमा थे, लेकिन इसमें से 87 प्रतिशत से अधिक राशि कोविड राहत, मास्क वितरण और अस्थायी गतिविधियों में खर्च कर दी गई। वहीं शिक्षा, इलाज, औजार, ऋण सहायता जैसी योजनाओं के लिए नाममात्र की रकम ही निकाली गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आयुष्मान भारत जैसी बड़ी योजनाओं का कोई लाभार्थी तक सामने नहीं आया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुल फंड में से करीब 204.95 करोड़ रुपये का कोई साफ हिसाब नहीं मिल रहा। यह रकम या तो गड़बड़ी के कारण है या फिर रिकॉर्डिंग में भारी चूक हुई है। यह सवाल अब उठने लगे हैं कि इतने बड़े फंड का सही ऑडिट क्यों नहीं हुआ और जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई।
सिस्टम की विफलता
रिपोर्ट में कहा गया है कि 97 निजी संस्थान बिना श्रम कल्याण बोर्ड के पंजीकरण के ही सेस का भुगतान कर रहे हैं। इतना ही नहीं, 283 चेक बाउंस हुए जिनकी कुल राशि 9.5 करोड़ रुपये से अधिक है। कुछ सरकारी विभागों ने तो 21 महीने तक सेस की राशि जमा ही नहीं की।
कागजों पर रहीं योजनाएं
CAG द्वारा कराए गए सर्वे में भी स्थिति निराशाजनक रही। 300 श्रमिकों में से 72 फीसदी को सरकार की योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। किसी ने कभी किसी जागरूकता शिविर में हिस्सा नहीं लिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि योजनाएं सिर्फ कागजों पर रहीं, मजदूरों के जीवन तक उनका असर नहीं पहुंच सका।
CAG की सिफारिशें
रिपोर्ट में CAG ने कई जरूरी सिफारिशें की हैं। इसमें सभी मजदूरों और निर्माण कंपनियों का डिजिटल रजिस्ट्रेशन, फंड का लेखा-जोखा ऑनलाइन रखने, बंद योजनाओं को दोबारा शुरू करने, केंद्र की योजनाओं को लागू करने और श्रम कल्याण बोर्ड की हर बैठक में सोशल ऑडिट अनिवार्य करने की बातें शामिल हैं। इन कदमों से ही सिस्टम में पारदर्शिता लाई जा सकती है और मजदूरों तक योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचाया जा सकता है।
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