दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्त के अंत में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के परिसर के भीतर और बाहर वकीलों के साथ हुई कथित मारपीट के मामले की CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गिरिश कठपालिया की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि BCI चेयरमैन मानन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं करेगी।
CBI जांच की मांग वाली याचिका दिल्ली HC से खारिज
"बिना ठोस आधार पूरी पुलिस फोर्स को बदनाम करना उचित नहीं"
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस पर पक्षपात या निष्पक्ष जांच न करने का आरोप लगाने के लिए याचिकाकर्ताओं के पास कोई मजबूत आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब किसी आशंका का कोई ठोस आधार न हो, तो केवल अनुमानों के आधार पर पूरी दिल्ली पुलिस फोर्स की निष्पक्षता और नीयत पर सवाल उठाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं का अपना मामला भी प्रथम दृष्टया (Prima Facie) किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) को स्थापित करता हुआ प्रतीत नहीं होता।
"CBI भी तो एक सरकारी एजेंसी है"
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया था कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन काम करती है और BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल से जुड़े सांसद हैं, इसलिए स्थानीय पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि "यदि केवल सरकारी संस्था होने के नाते दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो वही तर्क केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) पर भी समान रूप से लागू होगा, क्योंकि CBI भी अंततः एक सरकारी एजेंसी ही है। किसी भी संवैधानिक या सरकारी संगठन के खिलाफ इस तरह के निराधार आरोप लगाने से सभी को बचना चाहिए।" अदालत ने आगे चिंता जताते हुए कहा कि बिना किसी वजह के संस्थाओं पर ऐसे आरोप लगाने से आम नागरिकों के मन में पूरी व्यवस्था को लेकर निराशावादी सोच और अविश्वास का भाव पैदा होता है, जिसका समाज पर उल्टा असर पड़ता है।
CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग और कानूनी पेच
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी मांग की थी कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को संबंधित अवधि की CCTV रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने और उसे जांच एजेंसी को सौंपने का निर्देश दिया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शिकायत दर्ज कराने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह भी दलील दी थी कि अधीनस्थ मजिस्ट्रेट के पास न तो सीसीटीवी फुटेज जब्त करने का निर्देश देने का पर्याप्त अधिकार है और न ही वे सीबीआई जांच के आदेश दे सकते हैं, इसलिए हाईकोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को अपर्याप्त मानते हुए याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
