Chandigarh City History: चंडीगढ़, जिसे “द सिटी ब्यूटीफुल” कहा जाता है, अपनी अनोखी खूबसूरती और सुनियोजित संरचना के लिए पूरे देश में एक मिसाल माना जाता है। शहर की चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कें, हर ओर फैली हरी-भरी पेड़ों की कतारें और शांत वातावरण इसे भारत के सबसे आकर्षक शहरी केंद्रों में शामिल करते हैं। यहां की वास्तुकला और प्राकृतिक सुंदरता का संगम हर आगंतुक को अपनी ओर खींच लेता है। लेकिन चंडीगढ़ सिर्फ अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने इतिहास और निर्माण की अनोखी कहानी के लिए भी जाना जाता है। यह शहर भारत की आजादी के बाद योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया पहला शहर था। देश के विभाजन के बाद पंजाब को एक नई राजधानी की आवश्यकता थी, क्योंकि लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था। इसी जरूरत से जन्म हुआ “चंडीगढ़” का एक ऐसा शहर जो आधुनिकता और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक बना।
चंडीगढ़ का इतिहास और इसकी उत्पत्ति
चंडीगढ़ का इतिहास और इसकी उत्पत्ति (फोटो: iStock)
हजारों साल पुराना क्षेत्र
चंडीगढ़ का क्षेत्र लगभग 8000 वर्ष पूर्व की हड़प्पा सभ्यता से जुड़ा माना जाता है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक यह इलाका विस्तृत और समृद्ध पंजाब प्रांत का हिस्सा रहा। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के समय इस क्षेत्र को पूर्वी और पश्चिमी पंजाब में बांट दिया गया। इसके बाद नई राजधानी की आवश्यकता महसूस हुई, ताकि न केवल पूर्वी पंजाब का प्रशासनिक केंद्र स्थापित किया जा सके, बल्कि पश्चिमी पंजाब से विस्थापित हुए हजारों शरणार्थियों को पुनर्वास भी मिल सके। मार्च 1948 में, पंजाब सरकार ने भारत सरकार के परामर्श से शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित क्षेत्र को नई राजधानी के रूप में चुना। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, जहां आज चंडीगढ़ बसा है, वह स्थान सन् 1892-93 के अंबाला जिला राजपत्र में तत्कालीन अंबाला जिले का हिस्सा बताया गया था। शहर की नींव 1952 में रखी गई, और यह स्वतंत्र भारत के आधुनिक नियोजित शहरों में से एक बना।
चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश कब बना?
1 नवंबर 1966 को चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। यह शहर अपने आप में अनोखा है क्योंकि यह पंजाब और हरियाणा दोनों की संयुक्त राजधानी के रूप में कार्य करता है। चंडीगढ़ की सड़कों के किनारों पर फैली घनी हरियाली इसे देश के सबसे स्वच्छ और हरे-भरे शहरों में शामिल करती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 8.51% वन क्षेत्र के साथ चंडीगढ़, लक्षद्वीप और गोवा के बाद भारत का तीसरा सबसे अधिक हरित क्षेत्र वाला केंद्र शासित प्रदेश है। इस शहर का डिजाइन प्रसिद्ध वास्तुकार ली कॉर्बूजिए (Le Corbusier) ने तैयार किया था। उनकी दूरदृष्टि और उत्कृष्ट शहरी योजना के कारण चंडीगढ़ आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में आधुनिक, व्यवस्थित और सुंदर शहरों के प्रतीक के रूप में जाना जाता है।चंडीगढ़ का नाम कैसे रखा गया?
7 अक्टूबर 1953 का दिन पंजाब के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ क्योंकि इसी दिन उसे अपनी नई राजधानी मिलने जा रही थी। दिलचस्प बात यह थी कि उस समय इस शहर का नाम तय नहीं हुआ था। उद्घाटन समारोह में शामिल हुए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कालका हाईवे के पास स्थित प्राचीन चंडी मंदिर के पुजारी से सुझाव लिया कि शहर का नाम चंडीगढ़ रखा जाए। इस सुझाव के पीछे एक रोचक कारण था मंदिर के पास स्थित रेलवे स्टेशन पहले से ही चंडीगढ़ स्टेशन के नाम से जाना जाता था, जिसका उल्लेख 1920-30 के पुराने पत्रों और अभिलेखों में मिलता है। इस प्रकार, “चंडीगढ़” नाम किसी नए स्थान से नहीं लिया गया था, बल्कि पहले से प्रचलित नाम को ही नए शहर की पहचान बना दिया गया। विभाजन के बाद बनी इस योजनाबद्ध नगरी को “चंडीगढ़” नाम देना प्रतीकात्मक भी था। यह पुराने इतिहास, धार्मिक महत्व और नए भारत के निर्माण की भावना, दोनों को जोड़ता है।
चंडीगढ़ का इतिहास और इसकी उत्पत्ति (फोटो: iStock)
चंडीगढ़ के डिजाइन की जिम्मेदारी
चंडीगढ़ के डिजाइन की जिम्मेदारी शुरुआत में अमेरिकी आर्किटेक्ट अल्बर्ट मेयर को सौंपी गई थी। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर शहर की योजना पर काम शुरू भी किया, लेकिन लगभग डेढ़ साल बाद उन्हें यह प्रोजेक्ट छोड़ना पड़ा। इसका मुख्य कारण उनकी टीम के सदस्य आर्किटेक्ट मैथ्यू नोविकी की विमान दुर्घटना में हुई मृत्यु मानी जाती है। कहा जाता है कि इस घटना से अल्बर्ट मेयर मानसिक रूप से टूट गए थे, हालांकि पंजाब सरकार और अन्य अधिकारी उनके कार्य करने के तरीके से पहले ही असंतुष्ट थे। अधिकारियों का झुकाव नोविकी को परियोजना की जिम्मेदारी देने की ओर था, लेकिन उनके निधन के बाद मेयर को हटाने का निर्णय आसान हो गया। इसके बाद सरकार ने नए आर्किटेक्ट की तलाश शुरू की।
स्विस-फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कॉर्बुजिए का नाम
अल्बर्ट मेयर की टीम के हटने के बाद चीफ इंजीनियर पी.एल. वर्मा को तीन हफ्तों के भीतर उपयुक्त आर्किटेक्ट खोजने का कार्य सौंपा गया। उन्होंने विभिन्न देशों के दूतावासों से संपर्क कर उनके श्रेष्ठ आर्किटेक्ट्स की जानकारी मांगी। इसी क्रम में वर्मा का संपर्क ब्रिटिश आर्किटेक्ट जेन ड्रयू से हुआ, जिन्होंने शहर के डिजाइन के लिए प्रसिद्ध स्विस-फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कॉर्बुजिए का नाम सुझाया। शुरुआत में कॉर्बुजिए इस प्रोजेक्ट को लेने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन जेन ड्रयू और उनके पति मैक्सवेल फ्राई के अनुरोध पर उन्होंने अंततः इसे स्वीकार किया।
आधुनिक और सुव्यवस्थित शहर की नींव
जेन ड्रयू और मैक्सवेल फ्राई, जो उस समय 40,000 पाउंड की स्थायी नौकरी कर रहे थे, चंडीगढ़ के निर्माण में योगदान देने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर कॉर्बुजिए की टीम से जुड़ गए। प्रोफेसर दीपिका के अनुसार, ली कॉर्बुजिए ने यह प्रोजेक्ट इस शर्त पर स्वीकार किया था कि उनके चचेरे भाई और प्रतिभाशाली आर्किटेक्ट पियरे जेनरे को भी टीम में शामिल किया जाए। दिलचस्प बात यह थी कि 1940 के दशक में किसी निजी मतभेद के चलते दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई थी। तब पी.एल. वर्मा ने दोनों के बीच सुलह कराई और जेनरे को प्रोजेक्ट में शामिल किया गया। इस तरह चंडीगढ़ के निर्माण के लिए ली कॉर्बुजिए, पियरे जेनरे, जेन ड्रयू और मैक्सवेल फ्राई की मुख्य टीम बनी, जिसने भारत के इस आधुनिक और सुव्यवस्थित शहर की नींव रखी।
