बाबर के आने से पहले इस वंश का था दिल्ली पर दबदबा, 75 साल बाद यहां से बदला सल्तनत का खेल

बाबर के आगमन से पहले दिल्ली की सत्ता पर एक शक्तिशाली वंश का वर्चस्व था, जिसकी पकड़ वर्षों तक अडिग रही। करीब 75 साल बाद एक निर्णायक युद्ध ने सत्ता के संतुलन को हिला दिया और इतिहास की दिशा बदल दी। यही वह मोड़ था, जिसने सल्तनत की राजनीति में एक नए युग की नींव रखी। ऐसे में आइए जानें इसके बारे में।

Last Dynasty of Delhi Sultanate: दिल्ली सल्तनत (1206–1526 ई.) भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग तीन शताब्दियों से अधिक समय तक अस्तित्व में रहने वाला एक प्रभावशाली इस्लामी शासन था। इस काल में गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैय्यद और लोदी इन पांच वंशों ने क्रमशः सत्ता संभाली। इसकी नींव मुहम्मद गोरी के विश्वासपात्र और पूर्व दास कुतुबुद्दीन ऐबक ने रखी थी, जबकि इसका अंत बाबर द्वारा स्थापित मुगल साम्राज्य के उदय के साथ हुआ। इस सल्तनत ने उत्तर भारत के विस्तृत भूभाग को एक राजनीतिक इकाई में बाँधा और भारतीय-इस्लामी संस्कृति, प्रशासन तथा स्थापत्य कला के विकास को गति दी।

Last Dynasty of Delhi Sultanate

दिल्ली सल्तनत का आखिरी वंश

दिल्ली सल्तनत की प्रमुख विशेषताओं में एक सुदृढ़ और केंद्रीकृत शासन व्यवस्था शामिल थी, जिसमें इक़्ता प्रणाली के माध्यम से प्रशासन चलाया जाता था। एक संगठित एवं शक्तिशाली सेना इसकी रीढ़ थी। शासन की वैधानिक नींव इस्लामी कानून (शरीयत) पर आधारित थी, हालांकि व्यवहार में सीमित स्तर पर धार्मिक सहिष्णुता भी दिखाई देती है। सुल्तान सर्वोच्च शासक होता था, जिसे उलेमा और अमीर प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्रदान करते थे। यह राज्य मुख्यतः सैन्य शक्ति पर आधारित था और उस समय मंगोल आक्रमणों से पलायन कर आए अनेक विद्वानों व कलाकारों के लिए आश्रय स्थल भी बना। कुतुब मीनार और अलाई दरवाजा जैसी भव्य इमारतें इस काल की स्थापत्य उपलब्धियों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

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