म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) में निवेश करने वाले ज्यादातर निवेशकों के साथ अक्सर एक अजीब स्थिति बनती है। जब वे अपने मोबाइल ऐप में किसी व्यक्तिगत म्यूचुअल फंड स्कीम को देखते हैं, तो वहां उनकी एसआईपी (SIP) का रिटर्न बहुत शानदार, जैसे 15 या 20 फीसदी दिखाई देता है। यह देखकर निवेशक को लगता है कि फंड मैनेजर उनके पैसे से खूब मुनाफा कमा रहा है। लेकिन, जैसे ही वे अपने पूरे निवेश का 'ओवरऑल पोर्टफोलियो रिटर्न' (Overall Portfolio Return) देखते हैं, तो वह आंकड़ा काफी कम, मान लीजिए 8 या 10 फीसदी ही नजर आता है। यह स्थिति देखकर किसी भी आम निवेशक का चकरा जाना लाजमी है। वे सोचने लगते हैं कि जब उनकी हर एसआईपी मुनाफे में है, तो फिर कुल मिलाकर उनका पूरा पोर्टफोलियो इतना पीछे क्यों छूट गया? आइए जानते हैं इसके पीछे कक गणित?
रिटर्न और पोर्टफोलियो में क्यों है अंतर?
इस अंतर को समझने के लिए सबसे पहले हमें रिटर्न मापने के दो अलग-अलग तरीकों CAGR (कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट) और XIRR (एक्सटेंडेड इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न) के फर्क को जानना होगा। जब आप किसी म्यूचुअल फंड का ऐतिहासिक रिटर्न देखते हैं या लम्पसम (एकमुश्त) निवेश करते हैं, तो वहां रिटर्न की गणना 'CAGR' से होती है, जो केवल शुरुआती और आखिरी वैल्यू को देखता है। लेकिन, जब आप एसआईपी करते हैं, तो आपका पैसा हर महीने अलग-अलग तारीखों पर निवेश होता है। यानी, जो किस्त आपने 3 साल पहले दी थी, उसे बढ़ने के लिए पूरा समय मिला, लेकिन जो किस्त आपने पिछले महीने दी है, उसे केवल 30 दिन का समय मिला है। इस तरह के टुकड़ों में होने वाले निवेश के सही रिटर्न को मापने के लिए 'XIRR' का इस्तेमाल किया जाता है। अक्सर ऐप में दिखने वाला एसआईपी रिटर्न XIRR होता है, जो व्यक्तिगत स्तर पर बहुत अधिक दिख सकता है, जबकि पूरे पोर्टफोलियो का औसत रिटर्न निकालते समय समय अवधि का यह गणित आंकड़े को बदल देता है।
कैश ड्रैग और एसेट अलोकेशन भी है कारण
दूसरा सबसे बड़ा कारण है 'कैश ड्रैग' (Cash Drag) और एसेट एलोकेशन (Asset Allocation) का होना। एक आदर्श पोर्टफोलियो में निवेशक सारा पैसा केवल एक हाई-रिटर्न वाले स्मॉल-कैप फंड में नहीं डालते। वे जोखिम को कम करने के लिए अपने पैसे को लार्ज-कैप, मिड-कैप, डेट फंड्स (Debt Funds) और कुछ हिस्सा गोल्ड या एफडी (FD) में भी बांटकर रखते हैं। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि आपकी इक्विटी एसआईपी 18% का रिटर्न दे रही हो, लेकिन आपके पोर्टफोलियो का 30 फीसदी हिस्सा डेट फंड या लिक्विड फंड में पड़ा हो जो सिर्फ 6% का रिटर्न दे रहा है। जब इन सभी को मिलाकर एक औसत (Weighted Average) निकाला जाता है, तो पूरे पोर्टफोलियो का कुल रिटर्न अपने आप नीचे आ जाता है। फंड मैनेजर तो हर स्कीम के हिसाब से बेहतरीन प्रदर्शन कर रहा होता है, लेकिन आपका खुद का एसेट एलोकेशन पूरे पोर्टफोलियो के रिटर्न को संतुलित (या कम) कर देता है।
इसके अलावा, नए निवेश का असर (Timing of New Investments) भी एक बड़ी वजह है। मान लीजिए आप पिछले 5 साल से निवेश कर रहे हैं और आपका पुराना पोर्टफोलियो बहुत मजबूत स्थिति में है। लेकिन पिछले 6 महीनों में आपने कुछ नए फंड्स में एसआईपी शुरू की है या बड़ी रकम लम्पसम निवेश की है। चूंकि हालिया निवेश को बढ़ने के लिए बहुत कम समय मिला है, या हो सकता है कि हाल के महीनों में बाजार में थोड़ी गिरावट रही हो, तो ये नए फंड्स फिलहाल बहुत कम या नेगेटिव रिटर्न दिखाएंगे। भले ही आपके पुराने फंड्स रॉकेट की तरह बढ़ रहे हों, लेकिन ये नए और कम समय वाले निवेश पूरे पोर्टफोलियो के कुल औसत को नीचे खींच लेते हैं। इसे तकनीकी भाषा में 'पोर्टफोलियो डाइल्यूशन' भी कहा जाता है।
निवेशक यहां कर देते हैं गलती
एक और महत्वपूर्ण पहलू जिसे निवेशक अक्सर भूल जाते हैं, वह है एग्जिट लोड, टैक्स और एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio)। हर फंड मैनेजर फंड को चलाने के लिए एक निश्चित फीस लेता है, जिसे एक्सपेंस रेशियो कहते हैं। यह फीस आपके रोजाना के एनएवी (NAV) से पहले ही काट ली जाती है। इसके अलावा, जब भी आप किसी खराब प्रदर्शन करने वाले फंड से निकलकर नए फंड में एसआईपी शिफ्ट करते हैं, तो पुराने फंड को बेचने पर लगा शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स और एग्जिट लोड आपके वास्तविक मुनाफे को कम कर देता है। यह घटा हुआ मुनाफा जब पोर्टफोलियो में अपडेट होता है, तो ओवरऑल रिटर्न कम दिखाई देने लगता है।
