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World Health Day: बीमारी से पहले तैयारी जरूरी! हेल्थ इंश्योरेंस खरीदें, तो इन 5 बातों का रखें ध्यान

World Health Day: अचानक बीमारी या अस्पताल के खर्च वर्षों की बचत साफ कर सकते हैं। इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ इलाज का कवर नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक ढाल भी है। सही प्लान के पांच बातों पर जरूर ध्यान दें।

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हेल्थ इंश्योरेंस बेहद जरूरी
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Apr 7, 2026, 14:54 IST

World Health Day: वर्ल्ड हेल्थ डे पर जानें कि कैसे हेल्थ इंश्योरेंस के जरिये सेहत के साथ वित्तीय सुरक्षा भी मिलती है। हेल्थ इंश्योरेंस और आपकी वित्तीय सेहत का गणित समझना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि, अचानक बीमारी या अस्पताल के खर्च वर्षों की बचत पर असर डाल सकते हैं। इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ इलाज का कवर नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक ढाल भी है। सही प्लान चुनते समय सम इंश्योर्ड, वेटिंग पीरियड और कैशलेस नेटवर्क पर ध्यान देना चाहिए।

WHO के मुताबिक World Health Day हर साल 7 अप्रैल को मनाया जाता है और 2026 की थीम “Together for health. Stand with science” है। बहरहाल, यहां हम बात कर रहे हैं कि क्यों स्वस्थ व्यक्ति को हेल्थ इंश्योरेंस की जरूरत है। दूसरे शब्दों में कहें, तो बीमारी से पहले ही बीमारी की तैयारी कर लेनी चाहिए।क्योंकि, मौजूदा दौर में लाइफस्टाइल से लेकर खानपान तक तमाम ऐसी चुनौतियां हैं, जिनके चलते सेहत के खिलवाड़ होता ही रहता है। ऐसे में अगर हेल्थ इंश्योरेंस जैसी सुरक्षा नहीं हो, तो वर्षों की बचत और योजनाएं एक पल में धराशायी हो सकती हैं।

डरावनी है हकीकत

भारत में हेल्थकेयर खर्च का बड़ा हिस्सा अभी भी लोगों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है, और यही वजह है कि देश में बड़ी संख्या में परिवारों और गरीबी के बीच सिर्फ एक बार किसी के हॉस्पिटल में भर्ती होने की देर है। World Bank और World Health Organization के आकलनों के अनुसार हर साल करोड़ों लोग सिर्फ मेडिकल खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं, क्योंकि एक गंभीर बीमारी न केवल बचत खत्म कर देती है बल्कि परिवार को कर्ज और आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल देती है।

क्यों है जरूरी हेल्थ इंश्योरेंस

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस और मेडिकल खर्च की हकीकत आंकड़ों के जरिये डरावनी सच्चाई बयां करती है। भारत में कुल हेल्थ खर्च का करीब 47%–48% हिस्सा लोग अपनी जेब से खर्च करते हैं, जो दुनिया के बड़े देशों की तुलना में काफी ज्यादा है। पहले यह आंकड़ा 60% से भी ऊपर था, जो यह दिखाता है कि हालात सुधरे जरूर हैं, लेकिन अभी भी आर्थिक बोझ बहुत भारी है।

अस्पताल जाते ही ढीली होती है जेब

भारत में एक व्यक्ति का अस्पताल में भर्ती होना परिवार के लिए लंबे समय तक भारी पड़ता है। एक रिसर्च के मुताबिक शहरी इलाकों में हॉस्पिटल में भर्ती होने का औसत आउट ऑफ पॉकेट खर्च ₹27,000 से ज्यादा और ग्रामीण इलाकों में ₹14,000 से ज्यादा होता है।

खरीदते समय इन पांच बातों का रखें ध्यान

हेल्थ इंश्योरेंस खरीदना सिर्फ एक पॉलिसी लेना नहीं, बल्कि अपनी और परिवार की वित्तीय सुरक्षा तय करना है। ऐसे में कुछ बुनियादी लेकिन बेहद अहम पहलुओं को समझना जरूरी है, ताकि जरूरत के समय पॉलिसी वास्तव में काम आए।

1. कवरेज की पूरी संरचना समझें : भारत के बीमा नियामक Insurance Regulatory and Development Authority of India के अनुसार हेल्थ पॉलिसी में सम इंश्योर्ड, एक्सक्लूजन, सब-लिमिट्स, डिडक्टिबल और वेटिंग पीरियड जैसे सभी अहम बिंदु साफ तौर पर दिए जाते हैं। इसका मतलब यह है कि सिर्फ कम प्रीमियम देखकर पॉलिसी लेना सही नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि वास्तव में क्या कवर हो रहा है और क्या नहीं।

2. सही विकल्प चुनें : फैमिली फ्लोटर पॉलिसी में पूरे परिवार के लिए एक ही सम इंश्योर्ड होता है, जिसे कोई भी सदस्य उपयोग कर सकता है। वहीं इंडिविजुअल प्लान में हर सदस्य का अलग कवर होता है। छोटे परिवारों के लिए फ्लोटर बेहतर विकल्प हो सकता है, लेकिन बड़े परिवार या ज्यादा हेल्थ रिस्क वाले मामलों में अलग-अलग कवर ज्यादा सुरक्षित रहता है।

3. सही सम इंश्योर्ड का चुनाव करें : सम इंश्योर्ड तय करने का कोई तय नियम नहीं है, लेकिन आमतौर पर इसे सालाना आय से कम से कम दोगुना रखना बेहतर माना जाता है। इसके साथ ही रेस्टोरेशन बेनिफिट, सब-लिमिट और वेटिंग पीरियड जैसे एड-ऑन को भी ध्यान से देखना चाहिए। शहर, अस्पताल खर्च और परिवार के आकार के आधार पर कवर तय करना ज्यादा व्यावहारिक होता है।

4. कैशलेस और नेटवर्क हॉस्पिटल जरूर जांचें : हेल्थ इंश्योरेंस का सबसे बड़ा फायदा कैशलेस इलाज है, लेकिन यह सुविधा सिर्फ नेटवर्क हॉस्पिटल में ही मिलती है। इसलिए पॉलिसी लेते समय यह देखना जरूरी है कि आपके आसपास और आपके पसंदीदा अस्पताल उस नेटवर्क में शामिल हैं या नहीं।

5. वेटिंग पीरियड और क्लेम सेटलमेंट पर नजर रखें : नई पॉलिसी में आमतौर पर 30 दिन का शुरुआती वेटिंग पीरियड होता है, जबकि पहले से मौजूद बीमारियों के लिए यह 48 महीने तक हो सकता है। इसके अलावा कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रेश्यो भी जरूर देखें, क्योंकि यही तय करता है कि जरूरत के समय क्लेम आसानी से मिलेगा या नहीं। पॉलिसी पोर्ट करते समय वेटिंग पीरियड के लाभ ट्रांसफर हो रहे हैं या नहीं, यह भी जांचना जरूरी है।

पैरामीटरक्या देखेंबेंचमार्क/डेटाक्यों जरूरी
सम इंश्योर्डकवर अमाउंटमेट्रो शहरों में ₹10–25 लाख, टियर-2 में ₹5–10 लाखमेडिकल इंफ्लेशन 10–12% सालाना, कम कवर जल्दी खत्म हो जाता है
आउट-ऑफ-पॉकेट खर्चखुद से कितना खर्च करना पड़ेगाभारत में ~47% खर्च जेब सेज्यादा OOP होने पर सेविंग खत्म हो सकती है
प्लान टाइपफैमिली फ्लोटर / इंडिविजुअलछोटे परिवार में फ्लोटर, बड़े में इंडिविजुअलरिस्क डिस्ट्रीब्यूशन सही होना जरूरी
नेटवर्क हॉस्पिटलकैशलेस नेटवर्क10,000+ अस्पताल वाले इंश्योरर बेहतरइमरजेंसी में कैशलेस इलाज आसान
क्लेम सेटलमेंट रेश्योकंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड90%+ अच्छा माना जाता हैक्लेम रिजेक्शन का जोखिम कम
वेटिंग पीरियडप्री-एग्जिस्टिंग बीमारी2–4 साल तक हो सकता हैतुरंत कवरेज न मिलने का रिस्क
रूम रेंट लिमिटICU/रूम कैपNo limit प्लान बेहतरलिमिट होने पर अतिरिक्त खर्च जेब से
सब-लिमिट्सबीमारी/प्रोसीजर कैपAvoid sub-limitsइलाज के समय क्लेम कम मिल सकता है
रेस्टोरेशन बेनिफिटकवर रीफिल100% restoration जरूरीएक से ज्यादा क्लेम में मदद
टॉप-अप/सुपर टॉप-अपबेस कवर के ऊपर सुरक्षा₹10–50 लाख अतिरिक्त कवर सस्ताहाई मेडिकल खर्च के लिए जरूरी

क्या कहता है डेटा?

भारत में मेडिकल खर्च तेजी से बढ़ रहा है और हेल्थ इंश्योरेंस का सही चुनाव अब वित्तीय प्लानिंग का अहम हिस्सा बन चुका है। कम सम इंश्योर्ड, सीमित नेटवर्क या लंबा वेटिंग पीरियड जैसी छोटी गलतियां बड़े आर्थिक जोखिम में बदल सकती हैं।

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