Women Farmers Explained : भारत में खेती को लंबे समय से पुरूष किसानों का काम माना जाता है। लेकिन खेती में महिलाओं की भूमिका भी बहुत बड़ी है। महिलाएं खेतों में बुवाई, रोपाई, निराई, कटाई और फसल की देखभाल जैसे कई काम करती हैं। इसके अलावा वे पशुओं की देखभाल और घर के स्तर पर खेती से जुड़े कई काम भी संभालती हैं। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में बहुत-सी महिलाओं को किसान के रूप में पहचान नहीं मिलती। यही वजह है कि महिला किसानों की पहचान और उनके अधिकारों का मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है। महाराष्ट्र ने इस साल यानी वर्ष 2026 में महिला किसान सशक्तीकरण बिल पारित किया है। इसके तहत जमीन महिला के नाम पर होने की शर्त के बिना उसे ‘महिला किसान प्रमाण-पत्र’ के जरिए किसान के रूप में पहचान देने का प्रयास किया गया है। इसका उद्देश्य महिलाओं को सरकारी योजनाओं, कृषि ऋण और दूसरी सुविधाओं तक पहुंच दिलाना है।
लगातार बढ़ रही है खेती में महिलाओं की भूमिका
भारत के ग्रामीण इलाकों में खेती के काम में महिलाओं की भागीदारी काफी अधिक है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण यानी PLFS 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली 76.95 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कृषि और उससे जुड़े कामों में लगी हुई हैं। इसका मतलब है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए खेती रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसे कृषि का ‘नारीकरण’ भी कहा जाता है। इसका मतलब है कि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है। लेकिन एक बड़ी समस्या यह है कि काम करने के बावजूद उन्हें किसान के रूप में वह पहचान नहीं मिलती, जो अक्सर पुरुषों को मिलती है।
जमीन पर मालिकाना हक सबसे बड़ी समस्या
महिला किसानों की समस्या को समझने के लिए जमीन के मालिकाना हक को समझना जरूरी है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, केवल 14 प्रतिशत परिचालन कृषि भूमि जोतों का स्वामित्व महिलाओं के पास था। इसके अलावा सिर्फ 12.8 प्रतिशत महिलाओं के पास कृषि भूमि पर स्वामित्व या कानूनी अधिकार थे। इसका सीधा असर सरकारी योजनाओं पर भी पड़ता है। कई योजनाओं में किसान की पहचान जमीन के रिकॉर्ड के आधार पर की जाती है। अगर जमीन महिला के नाम पर नहीं है, तो खेती में काम करने के बावजूद उसका नाम किसान के रूप में दर्ज नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए, PM-KISAN के लाभार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 23 प्रतिशत बताई गई है। इससे पता चलता है कि खेती में महिलाओं की भागीदारी और सरकारी योजनाओं में उनकी हिस्सेदारी के बीच अंतर है।
महिलाएं खेती में काम करती हैं, लेकिन भुगतान कम मिलता है
महिलाओं की समस्या सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। खेती में बड़ी संख्या में महिलाएं बिना वेतन के भी काम करती हैं। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 41 प्रतिशत से अधिक महिला कृषि श्रमिक पारिवारिक उद्यमों में बिना वेतन के सहायक के रूप में काम करती थीं। पुरुषों में यह हिस्सा करीब 20 प्रतिशत था। वहीं करीब 63 प्रतिशत पुरुष स्वयं-खाता श्रमिक थे, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा करीब 39 प्रतिशत था। यानी महिलाएं खेती में बड़ी भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनके काम को हमेशा स्वतंत्र आर्थिक काम के रूप में नहीं देखा जाता।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और निर्भरता (तस्वीर-AI)
पुरुषों के बाहर जाने से महिलाओं पर बढ़ी जिम्मेदारी
ग्रामीण इलाकों में कई पुरुष बेहतर मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर चले जाते हैं। निर्माण और दूसरे गैर-कृषि कामों में रोजगार मिलने की उम्मीद में पुरुषों का बाहर जाना आम है। ऐसे में घर और खेती की जिम्मेदारी महिलाओं पर बढ़ जाती है। कोविड-19 के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने शहरों से गांवों की ओर वापसी की। इसके बाद कई परिवारों में खेती और जमीन से जुड़े फैसलों पर पुरुषों का नियंत्रण फिर बढ़ गया। ऐसी स्थिति में महिलाएं खेती के कठिन और कम भुगतान वाले कामों तक सीमित रह सकती हैं।
कम मजदूरी और ग्रामीण रोजगार के कम विकल्प
महिलाओं को कृषि मजदूरी में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कुछ परिस्थितियों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 20 से 30 प्रतिशत तक कम भुगतान किया जाता है। इससे खेती करने वाले परिवारों के लिए महिलाओं से काम लेना सस्ता पड़ सकता है। इसके अलावा गांवों में महिलाओं के लिए गैर-कृषि रोजगार के विकल्प भी कम हैं। ग्रामीण उद्योगों की कमी और औपचारिक प्रशिक्षण के सीमित अवसरों के कारण कई महिलाएं खेती पर ही निर्भर रहती हैं।
घर और खेती दोनों की जिम्मेदारी
महिलाओं के सामने सामाजिक जिम्मेदारियां भी होती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पशुओं की देखभाल का काम अक्सर महिलाओं के हिस्से आता है। इसलिए पुरुषों के शहर जाने के बाद भी महिला के लिए गांव छोड़कर दूसरे स्थान पर रोजगार तलाशना आसान नहीं होता। सुरक्षा, सामाजिक दबाव और जाति या समुदाय से जुड़े नियम भी महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था में जमीन अक्सर पुरुषों के नाम पर चली जाती है। इससे महिलाओं के पास जमीन या दूसरी संपत्ति कम रह जाती है।
किसान की पहचान मिलने से क्या बदलेगा?
अगर किसी महिला को किसान के रूप में आधिकारिक पहचान मिलती है, तो उसके लिए कई सरकारी सुविधाओं तक पहुंच आसान हो सकती है। सबसे पहले उसे कृषि योजनाओं और सरकारी सहायता का लाभ लेने में मदद मिल सकती है। जमीन के बिना महिला के लिए बैंक से कृषि ऋण लेना भी मुश्किल हो सकता है, क्योंकि बैंक अक्सर जमीन को गारंटी के रूप में देखते हैं। किसान की अलग पहचान मिलने से इस समस्या को कम करने का रास्ता खुल सकता है। महिला किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने से परिवार को भी फायदा हो सकता है। महिलाओं के पास अपनी आय पर नियंत्रण बढ़ने से परिवार के पोषण, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा पर खर्च बढ़ सकता है।
महिला किसानों के लिए कौन-कौन सी योजनाएं हैं?
सरकार ने महिला किसानों को सहायता देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं। महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना यानी MKSP का उद्देश्य कृषि में महिलाओं की भागीदारी और उनकी क्षमता बढ़ाना है। कृषि सखी अभिसरण कार्यक्रम के तहत ग्रामीण महिलाओं को कृषि से जुड़ी सलाह देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसके अलावा कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं में कम से कम 30 प्रतिशत बजट महिलाओं के लिए निर्धारित किए जाने की बात कही गई है। महिला किसान उत्पादक संगठनों यानी FPO को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे महिलाएं मिलकर अपनी उपज बेच सकती हैं और बाजार में अपनी बातचीत की क्षमता बढ़ा सकती हैं। उत्तर प्रदेश में महिला के नाम पर रजिस्टर्ड संपत्ति या कृषि भूमि के लिए स्टाम्प शुल्क में 1 प्रतिशत की छूट भी दी जाती है।
महाराष्ट्र का नया मॉडल क्या है?
महाराष्ट्र के महिला किसान सशक्तीकरण बिल 2026 में किसान की पहचान को केवल जमीन के मालिकाना हक से जोड़ने के बजाय खेती में उसकी वास्तविक गतिविधि को महत्व देने का प्रयास किया गया है। इस मॉडल के तहत महिला किसान प्रमाण-पत्र की व्यवस्था का उद्देश्य उन महिलाओं को भी पहचान देना है जो खेती करती हैं लेकिन जमीन उनके नाम पर नहीं है। इससे उन्हें कृषि योजनाओं और दूसरी सुविधाओं तक पहुंच दिलाने में मदद मिल सकती है।
क्या करने की जरुरत है?
महिला किसानों की स्थिति सुधारने के लिए सबसे जरूरी कदम किसान की पहचान को केवल जमीन के मालिकाना हक से अलग करना हो सकता है। गांव की ग्राम सभाओं के माध्यम से महिला किसान प्रमाण-पत्र जारी किए जा सकते हैं। इसके साथ अलग-अलग राज्यों में महिला किसान की एक समान परिभाषा बनाकर इस जानकारी को एग्रीस्टैक से जोड़ा जा सकता है। इससे महिला किसानों के लिए अलग डिजिटल रिकॉर्ड और किसान आईडी बनाने में मदद मिल सकती है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ऐसे कृषि प्रमाण-पत्रों को मान्यता देकर बिना जमीन की गारंटी के कृषि ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड देने की दिशा में काम करना चाहिए। ग्राम पंचायतों को भी जागरूकता बढ़ाने और महिलाओं की जरूरतों को स्थानीय कृषि योजनाओं में शामिल करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
खेती में काम करने वाली हर महिला की पहचान जरूरी
भारत में खेती में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है, लेकिन जमीन के मालिकाना हक और सरकारी रिकॉर्ड में उनकी कम मौजूदगी के कारण उन्हें कई सुविधाओं से दूर रहना पड़ता है। इसलिए महिला को किसान मानने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि जमीन किसके नाम पर है। यह भी देखना जरूरी है कि खेती का काम कौन कर रहा है। अगर खेती करने वाली महिलाओं को आधिकारिक पहचान, ऋण, तकनीक, बाजार और सरकारी योजनाओं तक बेहतर पहुंच मिलती है, तो इससे महिलाओं के साथ-साथ पूरे कृषि क्षेत्र को फायदा हो सकता है।
