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Iran से सीजफायर पर गुफ्तगू और Hormuz की नाकेबंदी का खेल, आखिर क्या करना चाह रहे ट्रंप?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को झुकाने के लिए अलग लेवल का खेला खेल रहे हैं। वह होर्मुज की नाकेबंदी कर ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश में है।

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होर्मुज की नाकेबंदी
Authored by: Alok Kumar
Updated Apr 22, 2026, 13:45 IST
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Hormuz Blockade 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीजफायर बढ़ाने का ऐलान किया है। ट्रंप ने कहा कि वह यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध और ईरान के भीतर मतभेदों को देखते हुए ले रहे हैं। हालांकि, इस बात में कितनी सच्चाई है, इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। इस बीच ट्रंप ने होर्मुज पर अपनी नाकेबंदी जारी रखने का ऐलान किया है। आखिर, एक ओर सीजफायर और दूसरी ओर होर्मुज की घेराबंदी के पीछे ट्रंप की क्या रणनीति है? क्या ट्रंप इस अतिव्यस्त समुद्री रूट, होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी कर ईरान को घुटनों पर लाने की कोशिश कर रहे हैं? आइए इस पूरे खेल को समझते हैं।

नाकेबंदी क्या है और अमेरिका ने कैसे की?

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, 'नाकेबंदी' एक युद्धक कार्रवाई है जिसमें दुश्मन देश के बंदरगाहों पर किसी भी जहाज (चाहे वह तटस्थ देश का ही क्यों न हो) के आने-जाने पर रोक लगा दी जाती है। होर्मुज की नाकेबंदी करने में इस बार अमेरिकी नौसेना ईरान के तट के बहुत करीब जाने के बजाय ओमान की खाड़ी और खुले हिंद महासागर में जहाजों को रोक रही है। इसके लिए सैटेलाइट, ड्रोन और 'यूएसएस अब्राहम लिंकन' जैसे विमान वाहक पोतों का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, अमेरिका ने कहा है कि वह भोजन और दवाओं जैसी मानवीय सहायता वाले जहाजों को निरीक्षण के बाद जाने की अनुमति देगा।

ट्रंप की नाकेबंदी और पीछे की रणनीति

Donald Trump का मानना है कि यह नाकेबंदी ईरान को "दुनिया को ब्लैकमेल करने" से रोकने के लिए जरूरी है और जल्द ही मुक्त आवाजाही पर समझौता हो जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट मानना है कि ईरान की सत्ता की असली ताकत उसका तेल है। ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा कि हम ईरान को उन लोगों को तेल बेचकर पैसा नहीं कमाने देंगे जिन्हें वे पसंद नहीं करते हैं। ट्रंप का दावा है कि इस नाकेबंदी से ईरान को रोजाना $500 मिलियन (लगभग ₹4200 करोड़) का नुकसान हो रहा है। अमेरिका का लक्ष्य ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय दखल को छोड़कर एक नए 'यूनिफाइड प्रपोजल' पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो जाए।

समुद्र में यह पहली नाकेबंदी नहीं

इतिहास में नाकेबंदी का अर्थ जहाजों की भौतिक तैनाती और गश्त से होता था, जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन ने फ्रांस के खिलाफ किया था। उस समय 'ब्लॉकैड रनर्स' घेरे को तोड़कर निकल जाते थे। लेकिन 2026 की अमेरिकी नाकेबंदी तकनीक पर आधारित है। अब सैटेलाइट, ड्रोन, रडार और 'पोजीशन बीकन' के माध्यम से हजारों मील दूर से ही जहाजों को ट्रैक किया जा सकता है। हडसन इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों के अनुसार, अब समुद्र में 'ट्रैफिक पुलिस' की तरह काम करना आसान है, जहां संदिग्ध जहाजों को रोककर ओमान जैसे सुरक्षित क्षेत्रों में ले जाया जाता है।

क्या ईरान को घुटने पर ले आएगा अमेरिका?

इतिहास गवाह है कि नाकेबंदी हमेशा अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं करती। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाकेबंदी ने उसके रक्षा उद्योग से ज्यादा उसके कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया, जिससे वहां अकाल पड़ गया। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ईरान की तेल आय रोकने की कोशिश में वहां की खाद्य आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे आम नागरिकों पर मानवीय संकट मंडरा सकता है। हालांकि, यह कहना अभी मुश्किल है कि इस नाकेबंदी के जरिये अमेरिका, ईरान को घुटने पर ले आएगा।

US-Israel-Iran War.

US-Israel-Iran War.

कच्चे तेल के बाजार पर क्या होगा असर?

होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल तेल परिवहन का 20% हिस्सा गुजरता है। इस नाकेबंदी और ईरान द्वारा जलमार्ग बंद करने की धमकी से कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। अगर ईरान की ओर से अमेरिका पर जबाबी कार्रवाई की जाती है तो कच्चे तेल की कीमत में आग लग सकती है। इसके असर से पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ सकती है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सचेत किया है कि यदि यह तनाव जारी रहा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाएगी।

क्या कहता है कानून?

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के अनुसार, किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को रोकना अवैध है। वहीं, दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि यह 'एनर्जी शॉक' जारी रहा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी (Recession) की ओर बढ़ेगी। इसका सबसे बुरा असर उन विकासशील देशों पर पड़ेगा जो महंगे आयातित तेल पर निर्भर हैं। उर्वरकों और खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने से दुनिया भर में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।

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