Iran-USA Deal Impact on Crude and Gold : अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी में शुरू हुआ संघर्ष अब तक जारी है। फिलहाल, भले दोनों एक-दूसरे पर मिसाइलें नहीं दाग रहे हैं। लेकिन, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से ग्लोबल ऑयल-गैस की सप्लाई ठप पड़ी है। नतीजतन, क्रूड ऑयल 100 से 120 डॉलर के बीच बना हुआ है।
पश्चिम एशिया के इस संकट को भारत के आम उपभोक्ता के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यहां पर असर सबसे गहरा दिखाई देता है। भारत के आम आदमी को इस युद्ध के चलते चौतरफा मार पड़ रही है। क्रूड महंगा, मतलब डीजल-पेट्रोल महंगा। फ्यूल महंगा यानी ट्रांसपोर्टेशन महंगा, हर चीज की लॉजिस्टिक कॉस्ट महंगी यानी ओवरऑल महंगाई की मार।
इसके ऊपर से रुपये की बढ़ती कमजोरी इकोनॉमिक ढांचे में ऐसी दरारें खड़ी कर रही है, जिन्हें भरने के लिए सरकार खर्च में कटौती की तरफ कदम बढ़ा रही है। सरकार के खर्च घटाने का सीधा असर इकोनॉमी के स्लोडाउन के तौर पर दिखता है। क्योंकि, सरकार जब खर्च करती है, तो रुपया सरकारी योजनाओं से होते हुए आम आदमी की जेब तक पहुंचता है। जहां से यह वापस इकोनॉमी में जाता है और GDP बढ़ाता है। लेकिन, जब यह चक्र रुकता है, तो इकोनॉमी पर इसका सीधा असर होता है।
क्यों आम आदमी के लिए खुशखबरी?
ईरान और अमेरिका दोनों ही तरफ से अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि वे किसी डील के बेहद करीब हैं। अभी डील हुई नहीं है, लेकिन इससे पहले ही क्रूड ऑयल के दाम घटने लगे हैं। मई में पूरे समय ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊंची रही है। भारतीय बास्केट में भी क्रूड का दाम मई 2026 में 108 डॉलर प्रति डॉलर के आसपास रहा है। जबकि, पिछले साल की समान अवधि में यह करीब 70 डॉलर के आसपास रहा था। ऐसे में अगर दोनों देशों के बीच डील होती है, तो क्रूड के दाम पर इसका सीधा असर होगा, जो आम भारतीय के जीवन को आसान बनाएगा।
क्रूड का भारत पर कितना असर?
SBI रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की गिरावट भारत की खुदरा महंगाई को करीब 0.5% तक कम कर सकती है। वहीं GDP ग्रोथ में लगभग 0.3% तक का फायदा मिल सकता है। जब क्रूड के दाम घटेंगे, तो भारत में डीजल-पेट्रोल जैसे ईंधन के दाम भी घटेंगे। इस तरह क्रूड की नरमी भारत की इकोनॉमी के लिए बूस्टर का काम करेगीी।
जून में हो गई दोस्ती तो क्या होगा?
अगर जून 2026 तक दोनों देशों के बीच शांति समझौता हो जाता है, तो यह भारत के लिए बेस्ट केस सीनारियो माना जाएगा। क्योंकि, इस स्थिति में जल्द ही वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई सामान्य हो जाएगी और ब्रेंट क्रूड तेजी से गिरकर 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में आ सकता है। इसका सबसे बड़ा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिख सकता है। सरकारी तेल कंपनियां रिटेल कीमतों में अभी जो 4 रुपये तक की बढ़ोतरी हुइ है, उसे वापस कर सकती हैं। यानी मोटे तौर पर डीजल-पेट्रोल के दाम 3-4 रुपये तक घट सकते हैं। इससे कार, बाइक और ट्रांसपोर्ट का खर्च युद्ध के पहले जितना हो सकता है।
रुपये के मोर्चे पर बड़ी जीत
अगर जून में ही दोनों देश डील कर लेते हैं, तो यह लुढ़कते रुपये के लिहाज से बड़ी जीत होगी और रुपया फिर से युद्ध पूर्व स्थिति तक मजबूत हो सकता है। इसका फायदा क्रूड के साथ ही गोल्ड-सिल्वर जैसी धातुओं के आयात पर भी पड़ेगा। अगर रुपया फिर से डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 80-85 वाली रेंज में लौट आता है, तो क्रूड और गोल्ड के आयात में डबल बेनिफिट मिलेगा, एक तो रुपये की मजबूती और दूसरी कम कीमतें। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप, बैटरी जैस आयात में सस्ते होंगे।
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महंगाई और EMI पर कितना असर पड़ेगा?
हालांकि, अभी देश में रिजर्व बैंक ने ब्याज दर नहीं बढ़ाई है। RBI MPC की अगली बैठक जून में होनी है। इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि रिजर्व बैंक इस बैठक में ब्याज दर बढ़ा सकता है। लेकिन, इससे पहले ही अगर क्रूड सस्ता हो जाता है, तो शायद रिजर्व बैंक इस फैसले को टाल दे, जिससे EMI का बोझ नहीं बढ़ेगा। अगर यह डील नहीं होती है और RBI रेट बढ़ा देता है, तो इसका पूरी इकोनॉमी पर गहरा आघात लगेगा।
सोना क्यों टूट सकता है?
जब दुनिया में युद्ध, तनाव या आर्थिक डर बढ़ता है, तब निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानकर खरीदते हैं। लेकिन अगर ईरान और अमेरिका युद्ध के दौरान सोने के दाम में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। क्योंकि, निवेशकों ने सोने की जगह क्रूड को हेजिंग का जरिया बना लिया। बहरहाल, अगर यह युद्ध जून में ही खत्म हो जाता है और डील हो जाती है, तो निवेशक क्रूड से निकलकर इक्विटी मार्केट का रुख कर सकते हैं, जिससे सोने की मांग और घट सकती है। ऐसे में सोने की कीमतों में 8% से 10% तक गिरावट देखने को मिल सकती है।
अगर तनाव लंबा चला तो उल्टा होगा खेल
अगर यह संघर्ष अक्टूबर-दिसंबर 2026 तक खिंचता है, तो स्थिति पूरी तरह उलट सकती है। ऐसी स्थिति में ब्रेंट क्रूड 110-125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। भारत में पेट्रोल-डीजल 20 से 25 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो सकते हैं। रुपया कमजोर होकर 100 प्रति डॉलर तक जा सकता है और महंगाई में 1% से ज्यादा का उछाल देखने को मिल सकता है।
