IEC 2024: भारत ने क्यों ठुकराए क्लाइमेट चेंज के 300 अरब डॉलर्स, G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने बताई वजह

India Economic Conclave 2024: टाइम्स नेटवर्क द्वारा इंडिया इकॉनोमिक कॉन्क्लेव (IEC 2024) में नीति आयोग के पूर्व CEO और 2023 में भारत में आयोजित हुए G20 सम्मलेन में के शेरपा अमिताभ कांत ने बताया कि नवंबर में आयोजित हुए COP-29 सम्मलेन के दौरान ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील, कम विकसित और अविकसित देश) के लिए जमा किये गए 300 अरब डॉलर्स को भारत ने क्यों ठुकरा दिया।

India Economic Conclave 2024: देश की राजधानी दिल्ली में आज टाइम्स नेटवर्क द्वारा इंडिया इकॉनोमिक कॉन्क्लेव (Indian Economic Conclave) के 10वें एडिशन का आयोजन किया जा रहा है। नीति आयोग के पूर्व CEO और 2023 में भारत में आयोजित हुए G20 सम्मलेन में के शेरपा अमिताभ कांत ने कॉन्क्लेव में G-20 सम्मलेन को ऐतिहासिक बताया और कहा कि भारत ने G-20 ग्रुप में अफ्रीका को शामिल कर इसे G-21 बना दिया, जो अपने आप में एक बहुत ही ऐतिहासिक कदम है।

IEC 2024

भारत ने क्यों ठुकराए क्लाइमेट चेंज के 300 बिलियन डॉलर्स

‘सुस्त है ग्लोबल अर्थव्यवस्था’

साथ ही उन्होंने बताया कि ग्लोबल अर्थव्यवथा की रफ्तार धीमी हो गई है। इस शताब्दी की शुरुआत के बाद से पहली बार ग्लोबल अर्थव्यवस्था 3% की दर से आगे बढ़ रही है। G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने कहा कि दुनिया में एक तरफ जहां विकसित देश 1.8% की विकास दर से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं विकासशील देश और दक्षिण भाग में स्थित देश 4.4% की विकास दर से आगे बढ़ रहे हैं और यह रफ्तार आने वाले 3 दशकों तक जारी रहेगी।

यहां जताई थी सहमति

नवंबर में आयोजित हुए COP-29 सम्मलेन के दौरान ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील, कम विकसित और अविकसित देश) के लिए जमा किये गए 300 अरब डॉलर्स को भारत ने ठुकरा दिया था। G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने भारत के इस कदम को सही ठहराते हुए बताया कि पेरिस में आयोजित हुए COP-21 सम्मलेन में ‘समान लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों’ के मूल पर सहमति जताई गई थी।

क्यों ठुकराए 300 अरब डॉलर्स

अमिताभ कांत ने कहा कि दुनिया भर में मौजूद कुल कार्बन क्षेत्र में 82% हिस्सा विकसित देशों का है। भारत और ग्लोबल साउथ के लिए इस क्षेत्र में हिस्सेदारी बहुत ही कम रखी गई है। कार्बन क्षेत्र में इतनी अधिक हिस्सेदारी होने के बावजूद विकसित देश ग्रीन-हाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं और इस स्थिति में 2050 तक 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, जिसके लिए वो फाइनेंस और टैक्नोलॉजी भी प्रदान नहीं कर रहे हैं। जबकि COP-21 में यही तय हुआ था। इस तरह विकसित देश लक्ष्य को बदल रहे हैं और 1.3 ट्रिलियन डॉलर्स का समर्थन करने की बजाय सिर्फ 300 अरब डॉलर्स का समर्थन कर रहे हैं जो कि गलत है।’

End of Feed