डॉलर ही क्यों है दुनिया का 'बॉस'? करेंसी मार्केट के वो पर्दे के पीछे के खिलाड़ी जो हिला देते हैं ग्लोबल इकोनॉमी

दुनिया के किसी भी कोने में व्यापार हो या कच्चे तेल का सौदा, हर जगह 'डॉलर' की ही तूती बोलती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अमेरिकी डॉलर ही ग्लोबल इकोनॉमी का 'अनडिस्प्यूटेड बॉस' क्यों बना हुआ है? रुपये या यूरो जैसी मजबूत करेंसी भी इसके सामने फीकी क्यों पड़ जाती हैं? अगर नहीं तो आइए आपको बताते हैं?

दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, 'डॉलर' का नाम हर कोई जानता है। आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार से लेकर कच्चे तेल की खरीद तक, सब कुछ डॉलर के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कागज का एक टुकड़ा, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति की तस्वीर होती है, वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को कैसे नचाता है? रुपये, पाउंड या येन के मुकाबले डॉलर की बादशाहत कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह दशकों की आर्थिक नीतियों और वैश्विक भरोसे का नतीजा है। आइए जानते हैं कि डॉलर कैसे दुनिया का 'बॉस' बना और वो कौन सी ताकतें हैं जो इसे चलाती हैं।

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डॉलर की बादशाहत का ऐतिहासिक कारण

डॉलर की ताकत की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद 'ब्रेटन वुड्स' (Bretton Woods) समझौते से हुई थी। उस समय दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपनी करेंसी को डॉलर से जोड़ दिया और अमेरिका ने वादा किया कि वह हर डॉलर के बदले एक निश्चित मात्रा में सोना (Gold) देगा। हालांकि, 1971 में अमेरिका ने सोने के साथ इस संबंध को खत्म कर दिया, लेकिन तब तक डॉलर पूरी दुनिया के व्यापार की मुख्य भाषा बन चुका था। आज डॉलर दुनिया की 'रिजर्व करेंसी' है। इसका मतलब है कि दुनिया के तमाम देशों के केंद्रीय बैंक अपने खजाने में सबसे ज्यादा डॉलर ही रखते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि संकट के समय सिर्फ यही करेंसी हर जगह स्वीकार की जाएगी।

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