Tax on Rental Income: मुंबई के एक कपल ने 17 लाख रुपये की रेंटल इनकम पर 0 इनकम टैक्स दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में यह दावा किया गया है। इसके साथ ही बताया गया है कि कैसे मुंबई जैसे कॉस्मोपॉलिटन शहर में 5-7 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी पर 17 लाख रुपये तक की रेंटल इनकम लीगली टैक्स फ्री हो सकती है। दावे के साथ दिए गए गणित को देखते हुए कोई भी सहज रूप से यह मानने को तैयार हो जाता है कि वाकई ऐसा हो सकता है और यह तो बड़ा आसान है। हालांकि, टैक्स एक्सपर्ट रियल लाइफ में इसकी प्रैक्टिकल वैल्यू पर सवाल उठा रहे हैं।
क्या है 17 लाख पर 0 टैक्स का दावा?
X पर टैक्सबडी नाम के एक हेंडल ने अपने पोस्ट में बताया कि कैसे मुंबई में एक फ्लैट, जो एक व्यक्ति की पत्नी के नाम पर रजिस्टर्ड है, उससे सालाना 17 लाख रुपये की कमाई होती है, फिर भी कोई टैक्स नहीं दिया जाता। टैक्सबडी का दावा है, “अगर आपके पास किराए की प्रॉपर्टी है, तो आप जीरो टैक्स भी दे सकते हैं।”
क्या है टैक्सबड़ी का दावा?
टैक्सबड़ी ने पोस्ट में यह भी दावा किया है कि इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 24(a) के तहत नेट एनुअल वैल्यू (NAV) पर 30 परसेंट का स्टैंडर्ड डिडक्शन है। यह डिडक्शन रिपेयर खर्च पर ध्यान दिए बिना लागू होता है और पुराने और नए, दोनों टैक्स सिस्टम में उपलब्ध है।
कैसे 17 लाख की रेंटल इनकम होगी टैक्स फ्री?
दावे की बुनियाद आयकर अधिनियम, 1961 के सेक्शन 24(a) पर रखी गई है। इसके तहत नेट एनुअल वैल्यू (NAV) पर 30 परसेंट का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। इसके लिए किसी खर्च का बिल या प्रमाण देना जरूरी नहीं होता है। ऐसे में अगर सालाना किराया 17,00,000 रुपये है, तो 30 परसेंट यानी 5,10,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलेगा। इसके बाद टैक्सेबल इनकम 11,90,000 रुपये बचेगी।
यहां से न्यू टैक्स रिजीम की भूमिका शुरू होती है, जिसमें टैक्स पर 3 लाख रुपये की बेसिक छूट दी गई है। इसके साथ ही सेक्शन 87A के तहत 12 लाख रुपये तक की टैक्सेबल इनकम पर रिबेट उपलब्ध है। अगर प्रॉपर्टी मालिक की कोई अन्य आय नहीं है और 30 परसेंट डिडक्शन के बाद इनकम 11.9 लाख रुपये है, तो सैद्धांतिक रूप से पूरी टैक्स देनदारी रिबेट के जरिए खत्म हो सकती है। यानी 17 लाख रुपये किराया होने के बावजूद फाइनल टैक्स शून्य हो सकता है।
पुराने टैक्स सिस्टम में तस्वीर अलग
पुराने टैक्स सिस्टम में 30 परसेंट डिडक्शन के बाद 11.9 लाख रुपये पर लगभग 1,69,500 रुपये टैक्स बनता है। इस पर 4 फीसदी सेस जोड़कर कुल टैक्स करीब 1,76,280 रुपये होता है। यहां 5 लाख रुपये से ज्यादा आय पर सेक्शन 87A की रिबेट उपलब्ध नहीं होती। हालांकि, पुराने सिस्टम में 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की कटौती, स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का लाभ और सेक्शन 24(b) के तहत ब्याज पर अतिरिक्त राहत मिल सकती है। लेट आउट प्रॉपर्टी पर पूरा ब्याज खर्च क्लेम किया जा सकता है और 2 लाख रुपये तक का हाउस प्रॉपर्टी लॉस अन्य आय से सेट ऑफ किया जा सकता है।
Rental income tax old vs new tax
टैक्स एक्सपर्ट ने उठाए सवाल
टैक्स एक्सपर्ट बलवंत जैन का कहना है कि, कागजी गणित के तौर पर, तो यह संभव है। लेकिन, रियल लाइफ में इसकी प्रैक्टिकल वैल्यू बहुत कम है। इसी तरह ET की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Tax2Win.com के फाउंडर और CEO अभिषेक सोनी का कहना है, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रॉपर्टी रेजिडेंशियल है या कमर्शियल। अगर आप इससे किराया कमाते हैं, तो इस हेड के तहत इनकम टैक्सेबल है। भले ही प्रॉपर्टी किराए पर न दी गई हो, लेकिन उसे ‘डीम्ड लेट आउट’ माना जाता है और फिर भी टैक्स लग सकता है।” वहीं, जैन कहते हैं कि सोशल मीडिया पर ऐसे दावे चर्चा में बने रहने के लिए कर दिए जाते हैं, जबकि इनकी रियल लाइफ प्रैक्टिकल वैल्यू न के बराबर होती है।
प्रैक्टिकल वैल्यू पर सवाल
बलवंत जैन कहते हैं कि इस गणित की प्रैक्टिकल वैल्यू खास नहीं है, क्योंकि यह तभी संभव है, जब प्रॉपर्टी के मालिक की किसी दूसरे स्रोत से कोई आय नहीं हो। यहां घर को पत्नी के नाम पर बताया गया है। इसके साथ ही यह भी बताया गया है कि उनकी कोई अन्य आय नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि 17 लाख रुपये का रेंट देने वाली प्रॉपर्टी उनके पास कहां से आई? अगर प्रॉपर्टी के लिए भुगतान पति ने किया है, तो टैक्स चुकाना होगा।
हर केस में जीरो टैक्स संभव नहीं
बलवंत का जैन का कहना है कि 4% के रेंटल यील्ड के हिसाब से 17 लाख रुपये सालाना रेंट देने वाली प्रॉपर्टी की कीमत करीब 4.25 करोड़ रुपये होगी। इस तरह की प्रॉपर्टी को खरीदने के लिए आमतौर पर होम लोन, अन्य आय, जॉइंट ओनरशिप या फंडिंग सोर्स जैसे फैक्टर जुड़ जाते हैं। ऐसे में हर केस में जीरो टैक्स संभव नहीं। निष्कर्ष यही है कि 17 लाख रुपये की रेंटल इनकम पर जीरो टैक्स संभव है, लेकिन यह ऑटोमेटिक नहीं है। ओनरशिप स्ट्रक्चर, टैक्स सिस्टम का चुनाव और कुल आय मिलकर अंतिम देनदारी तय करते हैं। सोशल मीडिया पर दिखने वाला आसान गणित हर किसी पर लागू नहीं होता।
