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रुपये की गिरावट पर ब्रेक! RBI के पास कौन सी 'जादू की छड़ी' जो कर रही है यह करिश्मा?

अमेरिकी डॉलर के सामने रुपये की गिरावट थम गई है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के दखल के बाद हुआ है। आखिर, RBI ने ऐसा क्या किया है कि ईरान युद्ध जारी रहने के बावजूद रुपये में रिकवरी आ गई है।

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डॉलर बनाम रुपया
Authored by: Alok Kumr
Updated Apr 6, 2026, 11:50 IST

ईरान संकट थमा नहीं है लेकिन रुपये की गिरावट पर ब्रेक लग गया है। आज लगतार दूसरे दिन अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अच्छी मजबूती के साथ ट्रेड कर रहा है। बता दें कि रुपया सोमवार को शुरुआती कारोबार में 33 पैसे चढ़कर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92.85 (Dollar Vs Rupee) पर पहुंच गया है। वहीं, गुरुवार को 13 साल की सबसे बड़ी एकदिवसीय तेजी दर्ज की गई थी और यह अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 152 पैसे मजबूत होकर 93.18 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। आखिर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कौन सी 'जादू की छड़ी' धूमा दी है जो रुपये में गिरावट थम गई है और तेजी लौट आई है। अगर आप भी इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं तो आइए जानते हैं।

क्यों टूट रहा था भारतीय रुपया?

ईरान विवाद की वजह से ग्लोबल रिस्क की वजह से हाल के हफ्तों में रुपया लगातार गिर रहा था। रुपये में गिरावट की वजह डॉलर की बढ़ी डिमांड है। ईरान युद्ध के चलते डॉलर की लगातार डिमांड में है, क्योंकि अमेरिकी डॉलर को सेफ-हेवन माना जाता है। इसको देखते हुए कई बैंकों ने बड़ी लॉन्ग-डॉलर (बाय) पोजीशन बनाई थी। बैंक कीमतों में अंतर का फायदा उठाने के लिए ऑनशोर मार्केट में डॉलर खरीद रहे हैं और ऑफशोर NDF मार्केट में बेच रहे थे। इससे रुपये में लगातार गिरावट आ रही थी।

RBI ने क्या किया कि रुपये में गिरावट थम गई?

27 मार्च को, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने निर्देश दिया कि अधिकृत डीलर हर बिजनेस डे के आखिर में ऑनशोर डिलिवरेबल मार्केट में अपनी NOP-INR पोजीशन 100 मिलियन डॉलर के अंदर बनाए रखें। बैंकों को इसका पालन करने के लिए 10 अप्रैल, 2026 तक का समय दिया गया है। इससे बैंकों को डॉलर बेचना होगा। इसलिए, NOP-INR पर कैप लगाकर, RBI इन आर्बिट्रेज ट्रेड के लिए डॉलर की खरीद को असल में लिमिट कर रहा है। इससे उन्हें मौजूदा एक्सपोजर खत्म करने पर भी मजबूर होना पड़ता है, जिससे डॉलर की बिक्री और रुपये की खरीद होती है।

केंद्रीय बैंक ने निर्देश दिया है कि अधिकृत डीलर यानी विदेशी मुद्रा लेनदेन की अनुमति वाले बैंक अब रुपये से जुड़े 'नॉन-डिलीवेरेबल डेरिवेटिव’ (एनडीडी) अनुबंधों की पेशकश निवासी एवं अनिवासी ग्राहकों के लिए नहीं कर सकेंगे। इससे पहले, आरबीआई ने अधिकृत डीलर बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की 'नेट ओपन पोजीशन’ (विदेशी मुद्रा में कुल खरीद एवं बिक्री के बीच का अंतर) पर 10 करोड़ डॉलर की सीमा भी तय की थी। आरबीआई के इस कदम से रुपये में गिरावट थमी है और तेजी लौटी है।

NOP-INR क्या है?

रुपये में नेट ओपन पोजीशन, या NOP-INR, घरेलू मार्केट में ऑथराइज्ड डीलर्स (ADs), खासकर कमर्शियल बैंकों के नेट फॉरेन एक्सचेंज एक्सपोजर को बताता है। आसान शब्दों में, यह रुपये के मुकाबले फॉरेन करेंसी, खासकर US डॉलर में बैंक की लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन के बीच के अंतर को दिखाता है। NOP-INR की गिनती ओवर-द-काउंटर (OTC) मार्केट में स्पॉट, फॉरवर्ड और स्वैप के साथ-साथ फ्यूचर्स और ऑप्शंस जैसे एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी डेरिवेटिव्स (ETCDs) सहित अलग-अलग सेगमेंट में पोजीशन को मिलाकर की जाती है। हालांकि ETCDs कैश में सेटल होते हैं, फिर भी वे NOP में शामिल होते हैं क्योंकि वे ओवरऑल एक्सचेंज रेट रिस्क में योगदान करते हैं।

ऑनशोर बनाम ऑफशोर मार्केट

ऑनशोर मार्केट का मतलब भारत के अंदर घरेलू फॉरेन एक्सचेंज मार्केट है। इसमें घरेलू एक्सचेंज पर ट्रेड होने वाले स्पॉट, फॉरवर्ड, स्वैप और ETCDs शामिल हैं। यह मार्केट RBI द्वारा रेगुलेट किया जाता है। इसके उलट, ऑफशोर मार्केट में नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) कॉन्ट्रैक्ट होते हैं जो भारत के बाहर, सिंगापुर और दुबई जैसे फाइनेंशियल सेंटर में ट्रेड होते हैं। ये कॉन्ट्रैक्ट कैश-सेटल होते हैं (ज्यादातर US डॉलर में) और इनमें रुपये का असल में लेन-देन नहीं होता है। ऑफशोर मार्केट पर ग्लोबल बैंकों और हेज फंड का दबदबा है और यह ऑनशोर मार्केट के मुकाबले ज्यादा देर तक चलता है। अलग होने के बावजूद, दोनों मार्केट आपस में जुड़े हुए हैं और इसमें आर्बिट्रेज का अहम रोल है। बैंक अक्सर कीमतों में अंतर का फायदा उठाने के लिए दोनों सेगमेंट में पोजीशन लेते हैं, यानी आर्बिट्रेज ट्रेड।

रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI के पास 5 हथियार

1. स्पेशल ऑयल विंडो

आने वाले दिनों में रुपये में गिरावट न हो, इसके लिए आरबीआई के पास एक तात्कालिक विकल्प यह है कि तेल रिफाइनर कंपनियों के लिए एक विशेष डॉलर स्वैप विंडो खोली जाए, जो रोजाना करीब 250–300 मिलियन डॉलर की मांग पैदा करती हैं। RBI अपनी बैलेंस शीट से सीधे डॉलर उपलब्ध कराकर बाजार में मांग का बड़ा हिस्सा कम कर सकता है और रुपये को तुरंत सहारा दे सकता है। इन स्वैप्स को बाद में वापस लिया जा सकता है।

2013 के ‘टेपेर टैंट्रम’ के दौरान RBI ने इसी रणनीति का इस्तेमाल करते हुए रिफाइनर्स को लगभग 12 अरब डॉलर दिए थे।

2. अमेरिकी डॉलर बेचना

RBI सीधे बाजार में हस्तक्षेप भी बढ़ा सकता है। आरबीआई के पास करीब 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ। ऐसे में उसके पास डॉलर बेचकर और रुपये खरीदकर उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की क्षमता है।

3. FIMA रेपो सुविधा

RBI अमेरिकी फेडरल रिजर्व की Foreign and International Monetary Authorities (FIMA) रेपो सुविधा का उपयोग कर सकता है। इसके तहत RBI अपने 190 अरब डॉलर के ट्रेजरी होल्डिंग्स को गिरवी रखकर डॉलर प्राप्त कर सकता है।

4. NRI से डॉलर जुटाना

एक और विकल्प है NRI (प्रवासी भारतीय) से आकर्षक ब्याज दरों पर डॉलर जुटाना। 2013 में RBI ने करीब 3.5% ब्याज दर पर 30 अरब डॉलर जुटाए थे।

5. CRR में बढ़ोतरी

RBI बैंकों के लिए फंड की लागत बढ़ाने के लिए कैश रिजर्व रेशियो (CRR) में अस्थायी बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे सिस्टम से लिक्विडिटी कम हो जाएगी। इसकी उम्मीद 8 अप्रैल के मॉनिटरी पॉलिसी में बहुत अधिक है। आरबीआई सीआरआर में बढ़ोतरी का ऐलान कर सकता है।

Why Rupee Bounce Back

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क्या रुपये में अब नहीं आएगी गिरावट?

करेंसी एक्सपर्ट का मनना है कि आरबीआई के हालिया कदम से घरेलू मार्केट में सट्टेबाजी की एक्टिविटी कम होने की संभावना है, क्योंकि NOP-INR पोजीशन 100 मिलियन डॉलर करने से यह बैंकों की क्षमता को कम करता है, जो मुख्य लिक्विडिटी प्रोवाइडर हैं। इससे रुपये में शॉर्ट-टर्म सपोर्ट मिलने की उम्मीद है। लेकिन लंबी अवधि को लेकर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है।

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