भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), शुक्रवार (5 जून) को मौद्रिक पॉलिसी (MPC) का ऐलान करेगा। इस बार की पॉलिसी काफी खास होने वाली है क्योंकि ईरान संकट के कारण महंगा तेल, डॉलर के सामने कमजोर होता रुपया और तेजी से बढ़ती महंगाई के ट्रिपल संकट में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने का जिम्मा केंद्रीय बैंक के कंधों पर है। इसलिए कल की पॉलिसी नतीजों पर पूरे देश की नजर टिकी हैं। ऐसे में बड़ा सवाल कि क्या आरबीआई इस चक्रव्यूह को भेद पाएगा? क्या आरबीआई ब्याज सस्ता कर आम आदमी से राहत देते हुए इकोनॉमी की रफ्तार को तेज कर पाएगा? आइए समझते हैं आरबीआई के पास क्या हैं विकल्प?
महंगाई पर काबू करना बड़ी चुनौती
मौजूदा समय में भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही नाजुक मोड़ पर खड़ी है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पाच पहुंचने और रुपया कमजोर होने से आर्थिक बोझ और महंगाई तेजी से बढ़ रहा है। अप्रैल महीने में खुदरा और थोक महंगाई में बड़ा उछाल आया है। खाने—पीने के सामान तेजी से महंगे हुए हैं। इससे लोगों की परेशानी बढ़ रही है। वहीं, दूसरी ओर कमजोर होता रुपया विदेशी निवेशकों को परेशान कर रहा है। इसलिए वह तेजी से भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। इससे निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ रही है जो सरकार और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा रहे हैं।
कमजोर रुपये ने बढ़ाई मुश्किलें
कल की मौद्रिक पॉलिसी में आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती लगातार कमजोर होते रुपये को सहारा देना होगा। वैश्विक अनिश्चितता के कारण डॉलर इंडेक्स (DXY) लगातार मजबूत हो रहा है। वहीं, दूसरी ओर रुपया कमजोर रहा है। रुपया कमजोर होने से भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) लगातार पैसे निकाल रहे हैं। पूंजी की इस निकासी के कारण डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये की वैल्यू घटी है। रुपये को बचाने के लिए रिजर्व बैंक को लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचने पड़ रहे हैं। इसके बावजूद हालात में सुधार नहीं हो रहा है। अगर रुपया इसी तरह गिरता रहा, तो देश में 'आयातित महंगाई' बढ़ जाएगी।
कच्चे तेल की आग से झुलसती इकोनॉमी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। अब जब कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई तो आयात बिल तेजी से बढ़ा है। महंगे तेल का सीधा मतलब है कि भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ रहा है। आरबीआई के लिए मुश्किल यह है कि कच्चे तेल के कारण पैदा होने वाली महंगाई 'सप्लाई-साइड शॉक'को कैसे संभाले। मौद्रिक नीति (रेपो रेट बढ़ाना या घटाना) केवल मांग (Demand) को नियंत्रित कर सकती है, भू-राजनीति या तेल उत्पादन को नहीं।
'ग्रोथ बनाम महंगाई' का जाल
पिछले दो महीनों में ईरान संकट के कारण महंगे कच्चे तेल से खाद्य महंगाई तेजी से बढ़ी है। इस बार अल-नीनो/कमजोर मानसून के कारण सब्जियों और दालों की कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है। पिछले महीने खुदरा और थोक महंगाई तेजी से बढ़ी है। ऐसे में कल की पॉलिसी में आरबीआई के लिए महंगाई को काबू करते हुए ग्रोथ को बढ़ाना बड़ी चुनौती होगी। ऐसा इसलिए कि अगर केंद्रीय बैंक महंगाई पर लगाम लगाने के लिए रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए कर्ज देना महंगा रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की होम लोन, कार लोन की EMI पर होगा। वहीं, अगर आरबीआई ग्रोथ को सहारा देने के लिए दरों को समय से पहले घटा देता है, तो बाजार में लिक्विडिटी बढ़ने से महंगाई और बढ़ सकती है। इसके साथ ही सुस्त निजी निवेश और कॉर्पोरेट क्रेडिट में सुस्ती भी आरबीआई की चिंता बढ़ा सकता है।
RBI Policy
क्या हो सकते हैं ऐलान?
आर्थिक विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कल आरबीआई रेपो रेट को बिना किसी बदलाव के पुरानी दर पर बरकरार रखे और अपने रुख को 'विड्रॉल ऑफ एकोमोडेशन'पर ही कायम रहेगा। केंद्रीय बैंक यह संदेश दे सकता है कि वे फेडरल रिजर्व के अगले कदम और मानसून की प्रगति की पुष्टि होने तक "रुको और देखो" की नीति अपनाएंगे।
