रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत को आर्कटिक के उस समुद्री रास्ते में सहयोग का न्योता दिया है, जो आने वाले वर्षों में दुनिया के समुद्री व्यापार का गणित बदल सकता है। पुतिन ने भारत और चीन को उन प्रमुख देशों में बताया है, जिनकी नॉर्दर्न सी रूट में दिलचस्पी बढ़ रही है। यह रास्ता रूस के आर्कटिक तट के साथ चलता है और एशिया तथा यूरोप के बीच पारंपरिक समुद्री मार्गों का एक छोटा विकल्प बन सकता है।
आर्कटिक में भारत की भागीदारी चाहता है रूस
बर्फ के बीच बना नया समुद्री रास्ता
नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट से होकर गुजरता है। यह यूरोप और एशिया के बीच जहाजों को स्वेज नहर वाले पारंपरिक रास्ते की तुलना में कम दूरी तय करने का विकल्प देता है। आर्कटिक की समुद्री बर्फ में बदलाव के कारण साल के कुछ महीनों में इस रास्ते पर व्यावसायिक आवाजाही बढ़ी है। बेहद ठंडा मौसम, समुद्री बर्फ, सीमित बंदरगाह सुविधाएं और खास तरह के जहाजों की जरूरत इस रास्ते को महंगा और चुनौतीपूर्ण बनाती है।
भारत को क्यों बुला रहा रूस?
रूस के लिए यह सिर्फ समुद्री व्यापार का मामला नहीं है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद मॉस्को अपने व्यापार और ऊर्जा निर्यात को एशिया की ओर मोड़ रहा है। नॉर्दर्न सी रूट (NSR) इस रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। इसका असर 2026 में दिखाई भी दे रहा है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अब तक करीब 60 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल इस आर्कटिक रास्ते से एशिया की ओर भेजा जा चुका है। 7 खेपों में भेजा गया यह तेल 2025 के पूरे मौसम में इस रास्ते से भेजे गए तेल की लगभग आधी मात्रा के बराबर है।
चीन कर रहा इस्तेमाल
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि चीन आर्कटिक व्यापार की दौड़ में भारत से आगे है। चीनी कंपनियां नॉर्दर्न सी रूट पर कंटेनर कारोबार बढ़ा रही हैं। अब चीन से यूरोप तक नियमित आर्कटिक कंटेनर सेवा की दिशा में भी कदम बढ़ रहे हैं। इसे चीन के ‘आइस सिल्क रोड’ के विस्तार के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पुतिन का भारत को न्योता सिर्फ रूस और भारत के बीच नए समुद्री रास्ते की कहानी नहीं है। इसके पीछे बदलती वैश्विक सप्लाई चेन की बड़ी तस्वीर है।
भारत के लिए क्या बदलेगा?
भारत के लिए नॉर्दर्न सी रूट रूस से ऊर्जा, खनिज और दूसरे सामान की आवाजाही के लिए एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है। इससे भारत को पारंपरिक समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन असली चुनौती लागत और भरोसेमंद सालभर की आवाजाही होगी। छोटा समुद्री रास्ता हमेशा सस्ता रास्ता नहीं होता। अगर रूस आर्कटिक में बंदरगाह, आइसब्रेकर और नेविगेशन सुविधाओं का नेटवर्क मजबूत कर पाता है, तो आने वाले समय में यह रास्ता केवल रूस-भारत व्यापार नहीं, बल्कि यूरोप-एशिया के पूरे समुद्री व्यापार के नक्शे को प्रभावित कर सकता है।
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