Make In India : 21 जून को भारत ने रक्षा आत्मनिर्भरता के मामले में पूरी दुनिया को चौंकाने वाला काम किया है। कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) शिपयार्ड से भारतीय नौसेना में तीन स्वदेशी युद्धपोत एक साथ शामिल किए गए। आईएनएस दुनागिरी (INS Dunagiri), आईएनएस संशोधक (INS Sanshodhak) और आईएनएस अग्रय (INS Agray) का एक साथ शामिल होना महज एक सैन्य घटना नहीं है।
इन तीनों स्वदेशी युद्धपोतों का आकार, उनमें इस्तेमाल हुई तकनीक और उनके मिशन बिल्कुल अलग हैं, इसलिए इनकी निर्माण लागत में भी बड़ा अंतर है। रक्षा मंत्रालय के प्रोजेक्ट्स और सार्वजनिक दस्तावेजों के विश्लेषण के अनुसार, इन तीनों जहाजों को तैयार करने में सामूहिक रूप से कुल मिलाकर लगभग ₹5,400 करोड़ से ₹7,400 करोड़ का अनुमानित खर्च आया है।
अगर भारत इन तीनों युद्धपोतों को खुद बनाने की जगह रूस, फ्रांस या ब्रिटेन जैसे किसी देश से आयात करता, तो देश के खजाने पर कम से कम 1.5 से 2 गुना अधिक वित्तीय बोझ पड़ता। यानी जो तीन जहाज आज स्वदेशी तकनीक से करीब ₹5,400 करोड़ से ₹7,400 करोड़ में बनकर तैयार हो गए हैं, उनके लिए भारत को विदेशी शिपयार्ड्स को सीधे तौर पर ₹11,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ चुकाने पड़ सकते थे।
इंडस्ट्री की बड़ी कामयाबी का सबूत
एक साथ तीन अलग-अलग भुमिकाओं वाले पोतों को लॉन्च किया जाना भारतीय नौसेना के साथ ही देश की डिफेंस इंडस्ट्री की बड़ी कामयाबी का सबूत है। भारतीय नौसेना अब तक मोटे तौर पर युद्धपोतों के लिए रूस और फ्रांस जैसे देशों पर निर्भर रहा है। लेकिन, यह कामयाबी भारत के रक्षा औद्योगिक बेस (Defence Industrial Base) की उस ऐतिहासिक संप्रभुता का जश्न है, जिसने देश को विदेशी आयात की दशकों पुरानी बेड़ियों को तोड़ा है।
52 वीक हाई पर डिफेंस इंडेक्स
भारत के निजी औद्योगिक दिग्गजों ने मिलकर समंदर में 'मेक इन इंडिया' का ऐसा दम दिखाया है, जिसकी धमक वैश्विक रक्षा बाजार में सुनाई दे रही है। यह मील का पत्थर साबित करता है कि दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा भारत अब एक कुशल मैन्युफैक्चरर और ग्लोबल बिल्डर बन चुका है। इंडस्ट्री की इस कामयाबी की गूंज स्टॉक मार्केट में लिस्टेड रक्षा कंपनियों के शेयरों में देखने को मिल रहा है। जब पिछले 3 महीनों में पूरे दुनिया के बाजारों में हाहाकार मचा हुआ था, उस दौरान भारत के डिफेंस शेयरों ने 25.77% का रिटर्न दिया है।
Nifty Defence
अरबों डॉलर की बचत
रक्षा अर्थशास्त्र (Defence Economics) के नजरिये से देखें तो युद्धपोत निर्माण का घरेलू मॉडल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। अतीत में भारत को एक युद्धपोत बनाने के लिए विशेष वॉरशिप-ग्रेड स्टील (DMR 249A) से लेकर प्रोपल्शन सिस्टम और रडार तक रूस या पश्चिमी देशों से ऊंचे दामों पर आयात करने पड़ते थे। इससे न केवल देश की विदेशी मुद्रा बाहर जाती थी, बल्कि पुर्जों की सप्लाई के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू शिपबिल्डिंग का मल्टीप्लायर इफेक्ट (Multiplier Effect) बेहद शानदार है। भारतीय शिपयार्ड में निवेश किया जाने वाला हर 1 रुपया देश की घरेलू इंडस्ट्री में लगभग 1.82 रुपये का आर्थिक मूल्य वापस पैदा करता है। आज 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री के साथ तैयार इन तीन जहाजों ने देश के खजाने के अरबों डॉलर बचाए हैं और भारत को रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर बना दिया है।
200 से ज्यादा MSMEs बने नौसेना की असली रीढ़
इन तीन युद्धपोतों का एक साथ तैयार होना भारत के मजबूत होते औद्योगिक इकोसिस्टम की एक बड़ी कामयाबी है। कोलकाता के जीआरएसई शिपयार्ड ने इन जहाजों का एकीकरण (Integration) किया है, लेकिन इनकी धमनियों में बहने वाला खून भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) ने तैयार किया है। देश के विभिन्न औद्योगिक कॉरीडोर्स में फैले 200 से अधिक एमएसएमई इस महा-परियोजना से सीधे जुड़े हैं। जहाजों के लिए जटिल वेंटिलेशन सिस्टम, इलेक्ट्रिकल केबलिंग, अत्याधुनिक पंप, रडार के कंसोल और नट-बोल्ट जैसी बुनियादी से लेकर हाई-टेक सामग्रियां इन्हीं घरेलू कंपनियों से आई हैं। लार्सन एंड टुब्रो (L&T), गोदरेज एयरोस्पेस और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों के साथ मिलकर इन छोटे उद्योगों ने एक ऐसा टियर-1 और टियर-2 सप्लायर बेस बना दिया है, जो अब किसी भी वैश्विक चुनौती का सामना करने के लिए सक्षम है।
पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट का असर
भारत सरकार की तरफ से रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई 'पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट' (Positive Indigenisation Lists) इस औद्योगिक क्रांति की सबसे बड़ी उत्प्रेरक रही है। इस नीति के तहत हजारों रक्षा उपकरणों और स्पेयर पार्ट्स के आयात पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसने भारतीय इंजीनियरों को स्वदेशी विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया। आईएनएस दुनागिरी में लगी ब्रह्मोस मिसाइल, आईएनएस संशोधक के आधुनिक सोनार सिस्टम और आईएनएस अग्रय के एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर इसी नीति की पैदाइश हैं। विदेशी कंपनियों पर निर्भरता खत्म होने से अब युद्ध के समय स्पेयर पार्ट्स की किल्लत का कोई खतरा नहीं रहेगा। भारत ने न केवल मैन्युफैक्चरिंग में महारत हासिल की है, बल्कि हथियारों के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम (CMS) जैसे जटिल सॉफ्टवेयर भी खुद बनाकर अपनी तकनीकी संप्रभुता को सुरक्षित कर लिया है।
रक्षा निर्यात का खुलता नया बाजार
भारत का यह स्वदेशी रक्षा मॉडल अब केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के रक्षा निर्यात (Defence Exports) को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए तैयार है। भारत का कुल रक्षा पिछले एक दशक में करीब 25 गुना तक बढ़ा है। ये तीन स्वदेशी प्लेटफार्म इस आंकड़े को और बड़ा करेंगे। यूरोपीय और अमेरिकी शिपयार्ड्स की तुलना में भारतीय शिपयार्ड्स में अत्यधिक कुशल मैनपावर और कम लागत के कारण युद्धपोत निर्माण का खर्च काफी प्रतिस्पर्धी है। फिलीपींस, वियतनाम, मॉरीशस और अफ्रीकी देशों जैसे मित्र राष्ट्रों के लिए भारत में बने ये स्टील्थ फ्रिगेट, सर्वे वेसल और एंटी-सबमरीन क्राफ्ट एक बेहतरीन और किफायती विकल्प बनकर उभरे हैं। यह औद्योगिक क्षमता भारत को आने वाले समय में दुनिया के शीर्ष रक्षा निर्यातकों की कतार में खड़ा करने का दम रखती है।
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