स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CPRI) की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया का रक्षा खर्च (Global Defense Budget) बढ़कर रिकॉर्ड 2.2 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा हो गया है। यह लगातार 11वां साल है, जब दुनिया की डिफेंस बजट बढ़ा है। यह दुनिया की कुल GDP का 2.5% है, जो 2009 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर है। यह तब है, जब इस दशक में ही दुनिया ने सदी की सबसे बड़ी महामारी Covid 19 का सामना किया है। इन हालात में जहां, दुनिया में वेलफेयर, हेल्थकेयर, एनवायरमेंट और शिक्षा जैसे मदों पर खर्च बढ़ना चाहिए था। लेकिन, खर्च परमाणु बम, इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन्स पर हो रहा है।
हालांकि, रक्षा खर्च बढ़ने का सीधे तौर पर यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता है कि दुनिया ने विकास से ज्यादा विनाश के उपकरणों पर ज्यादा खर्च शुरू कर दिया है। क्योंकि, अब भी रक्षा बजट कुल बजट का 2.5 फीसदी है। लेकिन, जब भी यह 2 फीसदी से ऊपर बढ़ता है, तो आम लोगों के लिए मुश्किलें जरूर बढ़ती हैं। रक्षा बजट में सीधे बढ़ोतरी भले ही रोजमर्रा की जिंदगी से सीधा संबंध नहीं रखती है। लेकिन, यह ऐसी परिस्थितियों को बयां करती है, जहां हालात सामान्य नहीं होने के संकेत मिलने लगते हैं।
क्यों बढ़ता बजट चिंता बढ़ाता है?
Bomb vs Bread : बढ़ता रक्षा खर्च अक्सर आम आदमी के लिए यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि अवसरों की कमी का सबूत होता है। यह बताता है कि सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण, सड़क, किसानी और गरीबी हटाने वाली योजनाओं में कटौती करेंगी या फिर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा डिफेंस पर बढ़ने वाला खर्च बेरोजगारी को लेकर भी चिंता खड़ी करता है। क्योंकि, UN और SIPRI जैसे संगठन बताते हैं कि $1 बिलियन सैन्य खर्च पर जितने रोजगार बनते हैं, उतने से दोगुने शिक्षा या स्वास्थ्य पर बन सकते हैं।
defense budget
अमेरिका सबसे आगे, सबसे अलग
दुनिया में अमेरिका सबसे ज्यादा सैन्य खर्च करने वाला देश है। लेकिन, यहां दो बड़ी चीजों अमेरिका के पक्ष में हैं, जो इसे दुनिया के बाकी देशों से अलग करती हैं। चूंकि, अमेरिका खुद एक मेजर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग स्टेट है। इसके अलावा ग्लोबल ट्रेड में US Dollar हावी है। इन दोनों वजहों से डिफेंस पर जब खर्च बढ़ता है, तो अमेरिका में रोजगार बढ़ता है और महंगाई नियंत्रित रहती है। क्योंकि, अमेरिका का बढ़ता रक्षा खर्च दुनिया में बढ़ती जियो पॉलिटिकल अस्थिरता को दिखाता है। जब भी दुनिया में अस्थिरता बढ़ती है, डॉलर मजबूत होता है। ऐसे में यह अमेरिका के फेवर में काम करता है। लेकिन, बाकी दुनिया के लिए यह इक्वेशन अलग है।दूसरे देशों के लिए क्यों बोझ?
बढ़ता रक्षा खर्च जहां अमेरिका के पक्ष में काम करता है। वहीं, दुनिया के ज्यादातर दूसरे देशों के लिए इकोनॉमी से जियो पॉलिटिकल लेवल पर चिंता बढ़ाने वाला होता है। अतीत यह बताता है कि अमेरिका जब भी रक्षा बजट बढ़ाता है, तो अपनी सीमाओं से दूर किसी दूसरे देश में जाकर युद्ध कर रहा होता है, जिससे वह पूरा खित्ता या दुनिया परेशान रहती है। वहीं, दुनिया के बाकी देश जब रक्षा खर्च बढ़ाते हैं, तो इसका मतलब होता है कि खतरा उनकी सीमाओं पर मंडरा रहा है।
defense budget vs Inflation
भारत कितना खर्च कर रहा?
भारत ने 2026-27 में कुल ₹7.85 लाख करोड़ का रक्षा बजट पेश किया। यह पिछले वर्ष (2025-26) के ₹6.81 लाख करोड़ से करीब 15% ज्यादा है। इसमें कैपिटल आउटले (हथियार व आधुनिकीकरण) के लिए ₹2.19 लाख करोड़ शामिल हैं, जबकि SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक भारत रक्षा पर खर्च करने वाले देशों में 5वें स्थान र है। हालांकि, भारत का रक्षा खर्च बेहद संतुलित है। लेकिन, बदलते जियो पॉलिटिकल हालात के बीच भारत पर भी
क्यों आम लोगों की बढ़ती है चिंता?
अर्थशास्त्री एन ग्रिगोराकिस (N. Grigorakis) और जी गैलीफियानकिस (G. Galyfianakis) के अध्ययन "Warfare vs. Welfare Finance: Assessing the Effect of Military Expenditure on Out of Pocket Healthcare Financing" के मुताबिक जिन देशों में सैन्य बजट में भारी उछाल आया है, वहां सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक फंडिंग कम कर दी है। नतीजा यह हुआ कि आम नागरिकों का अस्पताल का वह खर्च, जो उन्हें खुद की जेब से देना पड़ता है, तेजी से बढ़ गया। वहीं, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट 'The Security We Need' के मुताबिक, रक्षा पर अत्यधिक खर्च रोजगार के अवसरों को भी सीमित करता है।
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