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हाईवे पर जितना चलेंगे, उतना ही लगेगा टोल, समझें कैसे काम करेगी नई सेटेलाइट टोलिंग तकनीक

देश के NH बेहतर हो गए हैं लेकिन टोल प्लाजा पर लंबी लाइन खत्म नहीं हो रहा है। पीक आवर में यह समस्या काफी बढ़ रही है। इसको देखते हुए सेटेलाइट टोलिंग लाने की तैयारी चल रही है।

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टोल टैक्स
Authored by: आलोक कुमार
Updated Oct 30, 2026, 16:28 IST
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देश में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे का जाल बिछ गया है। इससे सफर करना बहुत ही आसान हो गया है। लेकिन टोल प्लाज पर लंबी जाम वाहन चालकों की परेशानी बढ़ा रहा है। इसी को देखते हुए भारत अब बिना रुकावट वाले (बैरियर-फ्री) हाईवे टोल सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक टैग, नंबर-प्लेट पहचानने वाली तकनीक और आगे चलकर सैटेलाइट-आधारित टोल तकनीक को शामिल किया जाएगा। इसका मकसद ट्रैफिक को बेहतर बनाना, राजस्व के नुकसान को कम करना और वाहन चालकों से उनके द्वारा तय की गई दूरी के हिसाब से टोल वसूलना है। आइए समझते हैं कि सैटेलाइट टोलिंग क्या है और यह कैसे काम करेगा? इसके लिए गाड़ियों में क्या बदलाव करने होंगे और वाहन चलाकों को कैसे इस नई तकनीक से फायदा होगा?

टोल प्लाजा क्यों खत्म करने की तैयारी?

देश में गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके चलते तमाम टोल प्लाजा पर गाड़ियों की लंबी लाइन लग रही है। भले ही भुगतान FASTag के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रूप से किया जा रहा है लेकिन वाहन चालकों को टोल प्लाज क्रॉस करने में काफी समय बर्बाद हो रहा है। कई वाहनों के एक साथ आ जाने, टैग रीड न हो पाने, लेन की पाबंदियों और पीक-ऑवर (व्यस्त समय) में जाम जैसी स्थिति पैदा हो जा रही है। इसलिए देशभरा में टोल प्लाजा खत्म करने की तैयारी चल रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रीनितिन गडकरी इस बारे में कई बार बोल चुके हैं।

क्या है मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग?

अगला कदम 'मल्टी-लेन फ्री-फ्लो' (MLFF) टोलिंग है। इसमें वाहनों को पारंपरिक टोल बूथों पर रुकने की जरूरत नहीं पड़ती और वे सीधे ऊपर लगे गैंट्री (ढांचों) के नीचे से गुजर सकते हैं। सरकार को उम्मीद है कि बिना बैरियर वाली इस टोल व्यवस्था से ट्रैफिक बेहतर चलेगा, ईंधन की खपत कम होगी और टोल का काम-काज ज्यादा कुशल हो जाएगा।

MLFF में फास्टैग को स्वचालित नंबर प्लेट पहचान (एएनपीआर) कैमरों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित विश्लेषण के साथ एकीकृत किया गया है। ओवरहेड गैंट्री पर आरएफआईडी रीडर और कैमरे लगे होते हैं जो वाहनों के गुजरते ही उनकी पहचान और पंजीकरण संख्या निर्धारित करते हैं।

फास्टैग टोल कटौती को आसान बनाता है, जबकि नंबर प्लेट पहचान वाहनों की पहचान करने और लेनदेन की जांच करने का एक अतिरिक्त साधन प्रदान करती है। इन तकनीकों के संयोजन से पहचान में सुधार हो सकता है और उन वाहनों को चिह्नित किया जा सकता है जिनके टैग गायब हैं, पढ़ने योग्य नहीं हैं या गलत तरीके से जुड़े हुए हैं।

इस तकनीक से क्या फायदा मिलेगा?

पारंपरिक टोल प्लाज के विपरीत, MLFF में वाहनों को अलग-अलग पेमेंट बूथों पर कतार में लगने की जरूरत नहीं होती। इससे व्यस्त शहरी मार्गों और भारी कमर्शियल ट्रैफिक वाले हाइवे को फायदा मिल सकता है।

सैटेलाइट टोलिंग क्या है और यह कैसे काम करेगा?

हाईवे पर चलने वाले को और बेहतर अनुभव देने के लिए सैटेलाइट टोलिंग पर भी काम किया जा रहा है। इस तकनीक में ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) का इस्तेमाल करके सैटेलाइट-आधारित टोल व्यवस्था लागू होने की संभावना है। सैटेलाइट पोजिशनिंग और वाहन से जुड़ी तकनीक की मदद से हाइवे पर तय की गई दूरी का पता लगाया जा सकेगा। इससे वाहन चालकों को किसी एक टोल प्लाजा पर तय शुल्क देने के बजाय, केवल उतनी ही दूरी के लिए पैसे देने पड़ सकते हैं, जितनी दूरी उन्होंने तय की है। यह विशेष रूप से उन माल-ढुलाई ऑपरेटरों और वाहनों के लिए उपयोगी हो सकता है जो कई राजमार्ग गलियारों से होकर गुजरते हैं।

अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ

हालांकि, भारत ने अभी तक पूरे देश में GNSS-आधारित टोल व्यवस्था को लागू करने को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। जुलाई में, सरकार ने बताया कि विशेषज्ञ समितियों ने सुरक्षा, गोपनीयता और परिचालन नियंत्रण से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए, GPS-आधारित 'बैरियर-मुक्त' (बिना रुकावट वाली) टोल व्यवस्था पर और अधिक विचार-विमर्श करने की सिफारिश की है। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए सटीक लोकेशन ट्रैकिंग, टोल लगने वाली दूरी की गणना के लिए स्पष्ट नियम, गलत बिलिंग से बचाव के उपाय और विवादों को सुलझाने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता होगी।

FASTag और एनुअल पास का क्या होगा?

MLFF लागू होने के दौरान भी टोल कलेक्शन में FASTag बना रहेगा। यह तकनीक पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन सिस्टम का हिस्सा है। MLFF में इसका इस्तेमाल ANPR के साथ किया जाता है, जिससे वाहन चालकों को तुरंत कोई नया पेमेंट तरीका अपनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

क्या 2028 से लागू हो सकती है नई व्यवस्था?

सैटेलाइट आधारित टोलिंग को लेकर 2028 का लक्ष्य चर्चा में रहा है। लेकिन इसे पूरे देश में लागू करने की पक्की तारीख समझना सही नहीं होगा। इस तकनीक को लेकर कई महत्वपूर्ण सवालों पर अभी विचार किया जाना है।

वाहन चालकों को क्या फायदा होगा?

नई टोलिंग व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि हाईवे पर सफर के दौरान टोल प्लाजा पर रुकने की जरूरत कम हो जाए। इससे यात्रा का समय बच सकता है और टोल प्लाजा के आसपास ट्रैफिक का दबाव घट सकता है।

इसके अलावा, वाहनों को बार-बार रुकने और फिर गति पकड़ने की जरूरत कम होगी। इससे ईंधन की खपत और वाहन से होने वाले उत्सर्जन में भी कमी आने की संभावना है। टोल वसूली की डिजिटल प्रक्रिया बेहतर होने से नकद लेनदेन और टोल संग्रह में होने वाली गड़बड़ियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

दूरी के आधार पर टोल तय करने की व्यवस्था लागू होती है, तो वाहन चालकों को दूरी के हिसाब से भुगतान का विकल्प मिलेगा। इससे पैसे की बचत होगी।

Toll Plaza News

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सेटेलाइट टोलिंग के लिए गाड़ी में क्या बदलाव करने होंगे?

आपके मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से आ सकता है कि क्या इसके लिए गाड़ी में कोई भारी-भरकम बदलाव कराना होगा या कोई नया उपकरण लगाना पड़ेगा? तो बता दें कि भविष्य में आने वाली या मौजूदा गाड़ियों में सरकार एक खास प्रकार की सैटेलाइट ट्रैकिंग डिवाइस या ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) अनिवार्य कर सकती है। यह डिवाइस गाड़ी की सटीक लोकेशन को केंद्रीय सर्वर तक भेजती है। सरकार की योजना ऐसी व्यवस्था बनाने की भी है जिसमें आधुनिक वाहनों में यह चिप या तकनीक पहले से ही फिट होकर आए। इससे स

सिर्फ सैटेलाइट डिवाइस ही नहीं, बल्कि हाईवे पर जगह-जगह हाई-टेक ANPR (Automatic Number Plate Recognition) कैमरे भी लगाए जा रहे हैं। यदि किसी गाड़ी में OBU नहीं भी है, तो ये कैमरे गाड़ी की नंबर प्लेट को स्कैन करके उसकी आवाजाही को ट्रैक कर लेंगे और तदनुसार टोल की गणना हो जाएगी। इसलिए गाड़ी मालिकों को टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। इस तकनीक के आने से पहले वाहन कंपनियों को अपनी गाड़ी इस अनुरूप लानी होगी।

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