इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख करीब है। अगर आप चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 (मूल्यांकन वर्ष 2027-28) के लिए अपना रिटर्न दाखिल करने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो इनकम टैक्स विभाग ने ITR-1 (सहज), ITR-2, ITR-3, ITR-4 (सुगम), ITR-5 और ITR-7 के लिए ऑनलाइन फॉर्म और एक्सेल यूटिलिटी को पोर्टल पर उपलब्ध करा दिया है। इस एक्सेल यूटिलिटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि करदाता अपनी आय और टैक्स से जुड़ी जानकारी को ऑफलाइन मोड में आसानी से तैयार कर सकते हैं और बाद में उस फाइल को पोर्टल पर डिजिटल रूप से अपलोड कर सकते हैं। अगर आप अपना इनकम टैक्स रिटर्न ऑनलाइन जमा करना चाहते हैं, तो विभाग की आधिकारिक ई-फाइलिंग वेबसाइट (www.incometax.gov.in) पर यूजर आईडी और पासवर्ड के जरिये लॉगिन कर सकते हैं। पहली बार फाइल करने वाले टैक्सपेयर्स को सबसे पहले इस पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। समय पर फाइलिंग करने से अंतिम समय की हड़बड़ी और किसी भी प्रकार की तकनीकी समस्याओं से बचा जा सकता है।
ITR Filing 2026: पुरानी या नई? जानें किस टैक्स व्यवस्था में होगा आपको ज्यादा फायदा!
पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) में टैक्स की गणना
पुरानी टैक्स व्यवस्था उन टैक्सपेयर्स के लिए फायदेमंद साबित होती है जो विभिन्न सरकारी योजनाओं और कटौतियों (Deductions) का लाभ उठाते हैं। इस व्यवस्था के तहत करदाताओं को 50,000 रुपये की मानक कटौती (Standard Deduction) का सीधा लाभ मिलता है। इसके साथ ही 5 लाख रुपये तक की कुल आय वाले व्यक्तियों को सेक्शन 87A के तहत 12,500 रुपये की छूट मिलती है, जिससे उनकी टैक्स देनदारी शून्य हो जाती है। इसके अतिरिक्त, पुरानी टैक्स व्यवस्था में सेक्शन 80C के तहत 1.5 रुपये लाख तक के निवेश पर छूट प्राप्त की जा सकती है। साथ ही मकान किराया भत्ता (HRA), होम लोन के ब्याज, एनपीएस (NPS) और बच्चों की ट्यूशन फीस जैसी कई अन्य कटौतियों का दावा भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की आय 7.10 लाख रुपये है और वह इन सभी कटौतियों का पूरा लाभ उठाता है, तो उसकी टैक्स योग्य आय घटकर शून्य कर देनदारी के दायरे में आ सकती है। इस व्यवस्था में 2.5 लाख रुपये तक की आय टैक्स-फ्री रहती है, जबकि 2.5 रुपये से 5 लाख रुपये पर 5%, 5 से 10 लाख रुपये पर 20% और 10 लाख रुपये से अधिक की आय पर 30% टैक्स लगता है।
नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) और मार्जिनल रिलीफ
नई टैक्स व्यवस्था में टैक्स की दरें काफी कम रखी गई हैं और टैक्स फ्री आय की सीमा भी अधिक है, लेकिन इसमें मिलने वाली कटौतियों और छूटों की संख्या सीमित होती है। बिना जटिल निवेशों के सीधी कमाई वाले करदाताओं (विशेषकर 12 लाख रुपये प्रति वर्ष से कम आय वाले) के लिए यह व्यवस्था काफी सरल और आकर्षक मानी जाती है। नई टैक्स व्यवस्था की एक खास बात मार्जिनल रिलीफ (Marginal Relief) की सुविधा है। अगर किसी व्यक्ति की आय निर्धारित 12 लाख रुपये की सीमा से थोड़ी ही ऊपर निकलती है, तो वह इस सुविधा का लाभ उठाकर अत्यधिक टैक्स देनदारी से बच सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर कुल आय 12.15 लाख रुपये है, तो सीमा से अधिक आय केवल 15,000 रुपये है। बिना मार्जिनल रिलीफ के इस राशि पर कुल टैक्स बहुत अधिक बनता है, लेकिन रिलीफ का गणित लागू होने के बाद प्रभावी टैक्स देनदारी काफी कम हो जाती है और इसमें 4% स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर जोड़कर कुल देय राशि तय की जाती है। नई टैक्स व्यवस्था में 4 लाख तक कोई टैक्स नहीं लगता, इसके बाद 4 से 8 लाख रुपये पर 5%, 8 से 12 लाख रुपये पर 10% और इसी क्रम में आय बढ़ने पर 15% से 30% तक की दरें लागू होती हैं।
पुरानी बनाम नई टैक्स व्यवस्था: आपके लिए क्या सही है?
दोनों व्यवस्थाओं की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। नई व्यवस्था जहां कम टैक्स रेट और अधिक स्टैंडर्ड डिडक्शन प्रदान करती है, वहीं पुरानी व्यवस्था आपको निवेशों के जरिए अपनी कर योग्य आय को घटाने का पूरा अवसर देती है। सेक्शन 87A के तहत मिलने वाली रिबेट की बात करें तो पुरानी व्यवस्था में 5 लाख रुपये तक की आय पर 12,500 रुपये की छूट मिलती है, जबकि नई व्यवस्था में 12 लाख रुपये तक की आय पर 60,000 रुपये तक की छूट मिलती है। इसलिए चुनाव करते समय अपनी कुल आय, मिलने वाली कटौतियों और स्लैब का सही आकलन करना जरूरी है।
अपने लिए सही ITR फॉर्म का चयन कैसे करें?
ई-फाइलिंग पोर्टल पर उपलब्ध "Help me decide" विकल्प के जरिए आप अपनी आय के स्रोत के अनुसार सही फॉर्म चुन सकते हैं:
- ITR-1 (सहज): वेतन, एक मकान संपत्ति और अन्य साधारण स्रोतों से आय वाले व्यक्तियों के लिए।
- ITR-2: बिना किसी व्यापारिक या पेशेवर आय वाले व्यक्तियों और हिंदू अविभाजित परिवारों (HUF) के लिए।
- ITR-3: व्यापार या व्यवसाय से आय अर्जित करने वाले व्यक्तियों और HUF के लिए।
- ITR-4 (सुगम): संभावित आय (Presumptive Income) योजना चुनने वाले करदाताओं के लिए।
अंतिम तिथि और ई-वेरिफिकेशन का महत्व
ज्यादातर व्यक्तिगत करदाताओं के लिए ITR फाइल करने और self-assessment टैक्स जमा करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई है। रिटर्न जमा करने के बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम 30 दिनों के भीतर उसका ई-वेरिफिकेशन (e-Verification) करना है। अगर आप ई-वेरिफिकेशन पूरा नहीं करते हैं, तो आपका ITR अमान्य माना जाएगा और रिफंड प्रक्रिया में देरी होगी। ई-वेरिफिकेशन के लिए आधिकारिक पोर्टल पर नेट बैंकिंग, बैंक खाते या डीमैट खाते से जनरेटेड EVC जैसी कई सुविधाएं उपलब्ध हैं। अगर आप 31 जुलाई की समय सीमा चूक जाते हैं, तो आप 31 दिसंबर तक विलंबित (Belated) ITR दाखिल कर सकते हैं। हालांकि, सेक्शन 234F के तहत 5,000 रुपये तक का विलंब शुल्क (5 लाख रुपये तक की आय के लिए 1,000 रुपये) देना पड़ सकता है।
