31 जुलाई से पहले भरें ITR: जानें पुरानी और नई टैक्स व्यवस्था का पूरा गणित और बचाएं बड़ी रकम

इनकम टैक्स विभाग ने FY 2026-27 के लिए ITR फॉर्म और ऑफलाइन एक्सेल यूटिलिटी जारी कर दी है। 31 जुलाई की समय-सीमा से पहले पुरानी या नई टैक्स व्यवस्था चुनकर सही रिटर्न जरूर दाखिल करें।

इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख करीब है। अगर आप चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 (मूल्यांकन वर्ष 2027-28) के लिए अपना रिटर्न दाखिल करने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो इनकम टैक्स विभाग ने ITR-1 (सहज), ITR-2, ITR-3, ITR-4 (सुगम), ITR-5 और ITR-7 के लिए ऑनलाइन फॉर्म और एक्सेल यूटिलिटी को पोर्टल पर उपलब्ध करा दिया है। इस एक्सेल यूटिलिटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि करदाता अपनी आय और टैक्स से जुड़ी जानकारी को ऑफलाइन मोड में आसानी से तैयार कर सकते हैं और बाद में उस फाइल को पोर्टल पर डिजिटल रूप से अपलोड कर सकते हैं। अगर आप अपना इनकम टैक्स रिटर्न ऑनलाइन जमा करना चाहते हैं, तो विभाग की आधिकारिक ई-फाइलिंग वेबसाइट (www.incometax.gov.in) पर यूजर आईडी और पासवर्ड के जरिये लॉगिन कर सकते हैं। पहली बार फाइल करने वाले टैक्सपेयर्स को सबसे पहले इस पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। समय पर फाइलिंग करने से अंतिम समय की हड़बड़ी और किसी भी प्रकार की तकनीकी समस्याओं से बचा जा सकता है।

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ITR Filing 2026: पुरानी या नई? जानें किस टैक्स व्यवस्था में होगा आपको ज्यादा फायदा!

पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) में टैक्स की गणना

पुरानी टैक्स व्यवस्था उन टैक्सपेयर्स के लिए फायदेमंद साबित होती है जो विभिन्न सरकारी योजनाओं और कटौतियों (Deductions) का लाभ उठाते हैं। इस व्यवस्था के तहत करदाताओं को 50,000 रुपये की मानक कटौती (Standard Deduction) का सीधा लाभ मिलता है। इसके साथ ही 5 लाख रुपये तक की कुल आय वाले व्यक्तियों को सेक्शन 87A के तहत 12,500 रुपये की छूट मिलती है, जिससे उनकी टैक्स देनदारी शून्य हो जाती है। इसके अतिरिक्त, पुरानी टैक्स व्यवस्था में सेक्शन 80C के तहत 1.5 रुपये लाख तक के निवेश पर छूट प्राप्त की जा सकती है। साथ ही मकान किराया भत्ता (HRA), होम लोन के ब्याज, एनपीएस (NPS) और बच्चों की ट्यूशन फीस जैसी कई अन्य कटौतियों का दावा भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की आय 7.10 लाख रुपये है और वह इन सभी कटौतियों का पूरा लाभ उठाता है, तो उसकी टैक्स योग्य आय घटकर शून्य कर देनदारी के दायरे में आ सकती है। इस व्यवस्था में 2.5 लाख रुपये तक की आय टैक्स-फ्री रहती है, जबकि 2.5 रुपये से 5 लाख रुपये पर 5%, 5 से 10 लाख रुपये पर 20% और 10 लाख रुपये से अधिक की आय पर 30% टैक्स लगता है।

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