वाकई 'फ्री' होता है जीरो बैलेंस अकाउंट? इन 5 छिपे हुए चार्जेस को जानकर उड़ जाएंगे आपके होश!

क्या जीरो बैलेंस अकाउंट सच में पूरी तरह 'फ्री' होता है? विज्ञापन भले ही लुभावने लगें, लेकिन बैंकों के पास अपनी लागत वसूलने के कई गुप्त तरीके होते हैं। एटीएम ट्रांजैक्शन की सीमा से लेकर डेबिट कार्ड के सालाना शुल्क और चेकबुक के छिपे हुए खर्चों तक, ऐसे 5 मुख्य चार्जेस हैं जो धीरे-धीरे आपकी जेब खाली कर देते हैं।

आज के समय में लगभग हर बैंक 'जीरो बैलेंस अकाउंट' (Zero Balance Account) की सुविधा देता है। विज्ञापन देखकर हमें लगता है कि इसमें ₹1 भी रखने की जरूरत नहीं है और सारी सेवाएं मुफ्त मिलेंगी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर बैंक आपसे मंथली बैलेंस नहीं रखवा रहा, तो वह कमाई कैसे करता है? दरअसल, जीरो बैलेंस अकाउंट पूरी तरह 'मुफ्त' नहीं होता। इसमें कई ऐसे छिपे हुए चार्जेस (Hidden Charges) होते हैं, जो आपके खाते से धीरे-धीरे पैसे काटते रहते हैं। अगर आप भी जीरो बैलेंस खाते के भरोसे हैं, तो इन 5 बड़े खर्चों के बारे में जान लेना आपके लिए बहुत जरूरी है, वरना मुफ्त के चक्कर में आपको मोटा चूना लग सकता है।

zero account

जीरो अकाउंट वालों से बैंक लूटता है पैसा

सबसे पहला और बड़ा झटका लगता है 'डेबिट कार्ड और एनुअल मेंटेनेंस' फीस से। सामान्य बचत खातों में अक्सर कार्ड के चार्जेस कम होते हैं या कई बार छूट मिल जाती है, लेकिन जीरो बैलेंस खातों में बैंक अक्सर डेबिट कार्ड के लिए ₹200 से ₹500 तक सालाना फीस वसूलते हैं। इसके अलावा, अगर आपका कार्ड खो जाता है और आप उसे दोबारा जारी (Re-issue) करवाते हैं, तो उसके लिए भी भारी चार्ज देना पड़ता है। कई बार ग्राहक को लगता है कि बैलेंस मेंटेन नहीं करना है तो कोई खर्च नहीं होगा, लेकिन साल के अंत में जब कार्ड की फीस कटती है, तो खाता माइनस में चला जाता है।

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