RBI Repo Rate : पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत में एक बार फिर महंगाई की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आरबीआई ब्याज दरों में इजाफा कर सकता है।
तिगत समीक्षा में रेपो दर 0.25 प्रतिशत बढ़ा सकता है आरबीआई (तस्वीर-PTI/istock)
क्या है नया अनुमान और रेपो रेट की स्थिति?
अर्थशास्त्रियों और बैंकिंग क्षेत्र के अधिकारियों का मानना है कि पश्चिम एशिया में गहराते संकट के कारण बने महंगाई के दबाव को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपनी आगामी समीक्षा बैठक में नीतिगत दर 'रेपो रेट' में 0.25 प्रतिशत (25 बेसिस पॉइंट्स) की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर केंद्रीय बैंक इस बार रेपो रेट में इजाफा करता है, तो यह उसकी ब्याज दर नीति में एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे पहले 2025 में ब्याज दरों में कटौती का दौर देखा गया था और उसके बाद लंबे समय तक दरों को स्थिर रखा गया था।
फिलहाल देश में नीतिगत रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बनी हुई है। यदि इसमें 0.25 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो यह बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी। ऐतिहासिक रूप से देखें तो फरवरी 2023 में आरबीआई ने दर बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत की थी, जिसके बाद लंबे समय तक कोई बदलाव नहीं किया गया और बाद में 2025 से दरों में कटौती शुरू की गई थी।
महंगाई और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर
समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा द्वारा किए गए एक सर्वे में शामिल 16 प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से ज्यादातर का कहना है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में की जा रही बढ़ोतरी, खाद्य और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और मजबूत आर्थिक विकास आरबीआई को ब्याज दरें बढ़ाने का अवसर देती हैं।
क्रिसिल (CRISIL) की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे के अनुसार, पिछली नीति समीक्षा के बाद से पश्चिम एशिया संघर्ष के भड़कने के कारण ऊर्जा और जिंसों (कमोडिटीज) के दाम काफी तेजी से बढ़े हैं। यदि यह वैश्विक दबाव इसी तरह बना रहता है, तो आने वाले समय में भी दरों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य आर्थिक सलाहकार कनिका पसरीचा का कहना है कि वैश्विक रुझानों के साथ तालमेल बैठाने और भविष्य में महंगाई के जोखिमों से निपटने के लिए ब्याज दरों को थोड़ा बढ़ाना एक व्यावहारिक कदम साबित हो सकता है।
क्या आरबीआई रुख बदलकर सख्त करेगा?
सर्वे में शामिल एक्सपर्ट्स की राय इस बात पर थोड़ी बंटी हुई है कि आरबीआई अपना रुख किस तरह का रखेगा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक 'नपे-तुले ढंग से सख्ती' या 'उदार रुख को वापस लेने' का संकेत दे सकता है।
दूसरी ओर, लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के समूह मुख्य अर्थशास्त्री सच्चिदानंद शुक्ला का सोचना थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि आरबीआई फिलहाल दरें बढ़ाने के बजाय 'जैसे हैं वैसे ही' (यथास्थिति) रहने का विकल्प चुन सकता है। उनके मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था में फिलहाल मांग के कारण महंगाई बढ़ने का कोई सीधा और ठोस सबूत नहीं मिला है, इसलिए आरबीआई थोड़ा इंतजार कर सकता है।
हालांकि, व्यापक स्तर पर एक्सपर्ट्स का यह भी अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान रेपो रेट में कम से कम दो से तीन बार तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता का कहना है कि आने वाली तिमाहियों में वास्तविक ब्याज दरों को ऋणात्मक (नेगेटिव) होने से बचाने के लिए नीति को धीरे-धीरे सामान्य बनाना जरूरी है।
महंगाई और जीडीपी विकास दर का नया अनुमान
कच्चे तेल की कीमतें हाल के दिनों में 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी हैं। इक्रा (ICRA) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, कच्चे तेल की इस तेजी का असर आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों (आरएसपी) में बढ़ोतरी के रूप में दिख सकता है। इससे रोजमर्रा की चीजों पर महंगाई का दबाव और ज्यादा फैलेगा, जिसके कारण आरबीआई को अपने सीपीआई (खुदरा) मुद्रास्फीति अनुमान को ऊपर की ओर संशोधित (बढ़ाना) करना पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, देश की आर्थिक वृद्धि दर (जीडीपी) को लेकर अच्छी खबर मिलने की उम्मीद है। वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधियां उम्मीद से बेहतर रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने जीडीपी विकास दर के अनुमान को बढ़ा सकता है।
डीबीएस बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव को उम्मीद है कि जीडीपी अनुमान को थोड़ा बढ़ाकर 7 प्रतिशत से अधिक किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय बैंक ने अपनी अगस्त नीति में 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था।
