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मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन रूट पर क्या है 'Tunnel Hood'? समझिए रफ्तार के इस खेल में इसकी जरुरत

Mumbai Ahmedabad Bullet Train: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में पहली बार टनल हुड तकनीक का उपयोग हो रहा है, जो तेज गति ट्रेनों से उत्पन्न दबाव तरंगों और टनल बूम प्रभाव को नियंत्रित करेगी।

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टनल हुड क्या है? मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजैक्ट में हो रहा है पहली बार तकनीक का इस्तेमाल (तस्वीर-PIB)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Jun 16, 2026, 19:25 IST
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Mumbai Ahmedabad Bullet Train : भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना यानी मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल (MAHSR) अब सुरंग निर्माण के एक नए और अहम चरण में पहुंच चुकी है। इस परियोजना में एक खास तकनीक पहली बार इस्तेमाल की जा रही है, जिसे टनल हुड (tunnel hood) कहा जाता है। यह तकनीक हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन को सुरक्षित और अधिक सुगम बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस 508 किलोमीटर लंबी परियोजना में महाराष्ट्र और गुजरात दोनों राज्यों में सुरंगों का निर्माण हो रहा है। इनमें सात पहाड़ी सुरंगें महाराष्ट्र के पालघर जिले में और एक सुरंग गुजरात के वलसाड में है। इन सभी सुरंगों के दोनों छोर पर टनल हुड बनाए जा रहे हैं। गुजरात की एकमात्र सुरंग के प्रवेश द्वार पर टनल हुड का निर्माण करीब पूरा हो चुका है। रेल मंत्रालय और नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के अनुसार, यह तकनीक भारत में पहली बार इस्तेमाल हो रही है और इसका मुख्य उद्देश्य टनल बूम यानी तेज आवाज और दबाव तरंगों को नियंत्रित करना है, जो तेज रफ्तार ट्रेनों के सुरंग में प्रवेश करने पर उत्पन्न होती हैं।

टनल हुड क्या होते हैं?

टनल हुड सुरंग के प्रवेश और निकास पर बनाए जाने वाले विशेष प्रकार के ढांचे होते हैं। इनकी बनावट बेलनाकार (cylindrical) होती है और इनमें हवा के दबाव को नियंत्रित करने के लिए छोटे-छोटे खुले हिस्से या खिड़कियां (vents/windows) होती हैं। जब कोई ट्रेन बहुत तेज गति से चलती है, खासकर 300 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक, तो वह अपने आगे की हवा को बहुत तेजी से धकेलती है। सुरंग में घुसते ही यह हवा एक सीमित जगह में फंस जाती है और एक तरह का दबाव (pressure wave) पैदा करती है। टनल हुड इस समस्या को कम करने के लिए एक संक्रमण क्षेत्र की तरह काम करते हैं। यानी खुली हवा और बंद सुरंग के बीच एक ऐसा हिस्सा बनाया जाता है, जहां हवा धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो सके। इससे अचानक दबाव नहीं बनता और तेज आवाज या झटका कम हो जाता है।

टनल बूम की समस्या क्यों होती है?

जब हाई-स्पीड ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती है, तो यह एक पिस्टन की तरह काम करती है। जैसे सिलेंडर में पिस्टन हवा को आगे धकेलता है, वैसे ही ट्रेन सुरंग के अंदर हवा को तेजी से आगे बढ़ाती है। इससे हवा का दबाव अचानक बढ़ जाता है और दबाव की तरंगें सुरंग के भीतर यात्रा करती हैं। जब ये तरंगें सुरंग के दूसरे छोर से बाहर निकलती हैं, तो एक जोरदार बूम जैसी आवाज सुनाई दे सकती है। यह न केवल शोर पैदा करता है, बल्कि सुरंग की संरचना और यात्रियों की आरामदायक यात्रा पर भी असर डाल सकता है। इसलिए इस समस्या को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है।

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

टनल हुड कैसे काम करते हैं?

टनल हुड इस दबाव को धीरे-धीरे कम करने का काम करते हैं। इनके भीतर बनी खिड़कियां और खुले हिस्से हवा को नियंत्रित तरीके से बाहर निकलने देते हैं। इस प्रक्रिया से जब ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती है, तो हवा एकदम से दबती नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे संतुलित होती रहती है। इसी वजह से दबाव की तीव्रता कम हो जाती है और टनल बूम जैसी समस्या नियंत्रित हो जाती है। हर सुरंग के अनुसार इन खिड़कियों की संख्या अलग-अलग होती है। पालघर की सात सुरंगों में करीब 20 से 26 खिड़कियां बनाई जा रही हैं। टनल हुड की लंबाई भी 31 मीटर से 45 मीटर तक हो सकती है, जिससे सुरंग की कुल लंबाई भी बढ़ जाती है।

महाराष्ट्र और गुजरात में सुरंगों की स्थिति

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में कुल 508 किलोमीटर में से करीब 27.4 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों का है। इसमें 21 किलोमीटर लंबी अंडरग्राउंड सुरंग और 6.4 किलोमीटर की पहाड़ी या सतही सुरंगें शामिल हैं। महाराष्ट्र के पालघर जिले में बनने वाली सात सुरंगें कुल मिलाकर करीब 6.05 किलोमीटर लंबी हैं। वहीं गुजरात के वलसाड में एक सुरंग लगभग 350 मीटर लंबी है। हाल ही में इन सुरंगों के निर्माण में कई महत्वपूर्ण ब्रेकथ्रू हासिल किए गए हैं। ब्रेकथ्रू का मतलब होता है कि जब सुरंग को दोनों तरफ से खोदते हुए बीच में मिलाया जाता है। यह सुरंग निर्माण में एक बड़ा और अहम पड़ाव होता है।

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

MT-6 सुरंग

पालघर की MT-6 सुरंग इस तकनीक का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी मूल लंबाई करीब 390 मीटर है, लेकिन दोनों ओर टनल हुड जोड़ने के बाद इसकी कुल लंबाई 454 मीटर हो गई है। इस सुरंग में 20 खिड़कियों वाले टनल हुड बनाए जा रहे हैं। इसका निर्माण जनवरी 2025 में शुरू हुआ था और करीब 360 दिनों में इसका ब्रेकथ्रू पूरा हुआ। यह इंजीनियरिंग के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

निर्माण कार्य की चुनौतियां

इस परियोजना में काम कर रहे इंजीनियरों के अनुसार, पहाड़ी क्षेत्रों में सुरंग बनाना आसान नहीं है। खासकर पालघर जैसे इलाकों में जहां जमीन की ऊपरी परत (overburden) कम है, वहां काम और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। निर्माण कार्य के दौरान रोजाना केवल 0.5 मीटर से 1 मीटर तक ही खुदाई हो पाती है। इसका कारण जटिल भूगर्भीय संरचना और सुरक्षा संबंधी सावधानियां हैं। निर्माण कंपनी एल एंड टी (L&T) के अधिकारियों के अनुसार, यह परियोजना केवल भारत की पहली बुलेट ट्रेन नहीं है, बल्कि देश की सुरंग निर्माण तकनीक को भी एक नई दिशा दे रही है।

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में ‘टनल हुड’ (तस्वीर-PIB)

अंडरग्राउंड सुरंग की प्रगति

इस परियोजना की सबसे बड़ी सुरंग मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) से शिलफाटा तक बनाई जा रही है, जिसकी लंबाई करीब 21 किलोमीटर है। इसमें से 4.88 किलोमीटर का एक हिस्सा हाल ही में सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। यह हिस्सा घनसोली और शिलफाटा के बीच स्थित है। यह अंडरग्राउंड सुरंग भारत की सबसे लंबी और आधुनिक रेल सुरंगों में से एक मानी जा रही है।

परियोजना का महत्व

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना भारत के परिवहन क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव मानी जा रही है। इसमें इस्तेमाल हो रही नई तकनीकें, जैसे टनल हुड, देश की इंजीनियरिंग क्षमता को वैश्विक स्तर पर ले जा रही हैं। टनल हुड जैसी तकनीकें यह सुनिश्चित करती हैं कि हाई-स्पीड ट्रेनों का संचालन सुरक्षित, शांत और अधिक स्थिर हो। इससे भविष्य में भारत में और भी हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं के लिए रास्ता आसान होगा।

टनल हुड केवल एक तकनीकी संरचना नहीं है, बल्कि यह आधुनिक रेल इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन में आने वाली दबाव और शोर की समस्याओं को नियंत्रित करता है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में इसका इस्तेमाल भारत के रेल ढांचे को एक नई दिशा दे रहा है। आने वाले समय में यह तकनीक देश की अन्य हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं में भी उपयोग की जा सकती है, जिससे यात्रा और अधिक तेज, सुरक्षित और आरामदायक हो सकेगी।

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