अमेरिका ने एक महीने बाद एक बार फिर ईरान पर हमला किया है। अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित ईरानी सैन्य ठिकाने पर जोरदार बमबारी की है। इसके जवाब में ईरान ने भी पलटवार करने की चेतावनी दी है। यानी आने वाले दिनों में एक बार फिर होर्मुज पूरी तरह से बंद हो सकता है।
बता दें कि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच जारी इस जंग को अब छह महीने पूरे हो चुके हैं। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया इसकी चपेट में है। होमुर्ज जलमार्ग से युद्ध से पहले रोजाना करीब 100 जहाज गुजरते थे। अब इनकी संख्या घटकर महज 5 के आसपास रह गई है।
जहाजों की आवाजाही में इस भारी गिरावट ने वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के साथ-साथ समुद्री माल ढुलाई व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ाया है। कई जहाजों ने अपने पुराने रास्ते छोड़कर वैकल्पिक मार्ग अपनाए हैं, जिससे यात्रा का समय और परिवहन लागत बढ़ रही है। इस संघर्ष ने न केवल मध्य पूर्व को अस्थिर किया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला की रीढ़ तोड़कर रख दी है। आइए समझते हैं कि होर्मुज रूट बंद होने से दुनिया की शिपिंग व्यवस्था कैसे बदली है।
100 की जगह सिर्फ 5 जहाज गुजर रहे
अमेरिका-ईरान युद्ध से पहले हर दिन लगभग 100 जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते थे, जिनमें से आधे से ज्यादा तेल टैंकर होते थे। फरवरी और मार्च में संघर्ष बढ़ने तथा IRGC द्वारा बंदी की घोषणा के बाद यह संख्या गिरकर औसतन 5 जहाज प्रति दिन रह गई। 17 जून को ईरान और अमेरिका के बीच हुए एक अंतरिम समझौते के बाद आवाजाही बढ़कर करीब 20 जहाज प्रतिदिन हुई। लेकिन यह भी सामान्य स्तर का केवल पांचवां हिस्सा था।
14 जुलाई को अमेरिकी नाकाबंदी फिर शुरू होने के बाद ट्रैफिक दोबारा घटकर करीब पांच जहाज प्रतिदिन रह गया। 15 जुलाई से 23 अगस्त के बीच भी ट्रैफिक सामान्य स्तर की तुलना में लगभग 95 प्रतिशत कम बना रहा, और जो थोड़ा-बहुत ट्रैफिक बचा है, उसमें मुख्य रूप से नौसेना की सुरक्षा में या ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चलने वाले टैंकर ही शामिल हैं।
वैश्विक शिपिंग रूट्स में आया बड़ा बदलाव
होर्मुज में युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक शिपिंग रूट्स में बड़ा बदलाव आया है। समुद्री ट्रैफिक खाड़ी क्षेत्र से हटकर लाल सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर मुड़ गया है, जहां सिंगापुर और मलेशिया प्रमुख ऊर्जा केंद्र बनकर उभरे हैं। उदाहरण के लिए, जुलाई में सिंगापुर और मलेशिया को रूस से होने वाले फ्यूल ऑयल के शिपमेंट में 2.5 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं, कुवैत के बंदरगाह ट्रैफिक में सबसे ज्यादा 86 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि यूएई, कतर, इराक और बहरीन में भी 66 से 69 प्रतिशत तक की कमी देखी गई।
इस बदलाव का मतलब है कि दुनिया का समुद्री व्यापार अब केवल एक मार्ग पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे रास्तों और बंदरगाहों की ओर फैल रहा है। लेकिन वैकल्पिक मार्ग हमेशा सस्ता या तेज नहीं होता। रास्ता लंबा होने पर ईंधन, बीमा, चालक दल और समय की लागत बढ़ सकती है।
होर्मुज में जहाजों की आवाजाही
किस देश पर कितना असर पड़ा?
होर्मुज संकट का असर सभी खाड़ी देशों पर एक जैसा नहीं पड़ा है। कुवैत में रोजाना बंदरगाह पर पहुंचने वाले जहाजों की संख्या करीब 86 फीसदी घट गई। इसकी बड़ी वजह यह है कि खुले समुद्र तक पहुंचने के लिए कुवैत का समुद्री रास्ता होर्मुज से होकर गुजरता है। संयुक्त अरब अमीरात में बंदरगाहों पर जहाजों के पहुंचने की संख्या करीब 69 फीसदी कम हुई। कतर, इराक और बहरीन में भी करीब 66 से 68 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
इसके मुकाबले सऊदी अरब पर असर अपेक्षाकृत कम रहा। वहां बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही में करीब 15 फीसदी की गिरावट आई। इसका एक कारण पाइपलाइन नेटवर्क और लाल सागर तक उसकी पहुंच है, जिससे तेल के कुछ प्रवाह को वैकल्पिक रास्तों से जारी रखा जा सका।
किन देशों के लिए ज्यादा बड़ा झटका?
मध्य पूर्व के तेल पर निर्भर देशों के लिए यह संकट और गंभीर है। इरिट्रिया और मेडागास्कर अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी तेल मध्य पूर्व से लेते हैं। पाकिस्तान की निर्भरता करीब 78 फीसदी, जबकि जापान और केन्या की करीब 77 फीसदी है। इन देशों के लिए समस्या सिर्फ तेल की उपलब्धता नहीं है। आपूर्ति में देरी, वैकल्पिक स्रोतों की तलाश और बढ़ती परिवहन लागत का असर भी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
होर्मुज नहीं खुला तो क्या वैकल्पिक रास्ते हैं?
एनर्जी एक्सपर्ट का कहना है कि दुनिया के समुद्री मार्ग में कुछ वैकल्पिक रास्ते जरूर मौजूद हैं, लेकिन वे होर्मुज की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। एशियाई और यूरोपीय बंदरगाहों के बीच आवाजाही करने वाले जहाजों को अब पूरा अफ्रीका महाद्वीप घूमकर जाना पड़ रहा है। इससे यात्रा का समय 10 से 14 दिन बढ़ गया है।
सऊदी अरब जैसे देशों के पास पाइपलाइन और लाल सागर के बंदरगाहों का विकल्प है। कुछ जहाज अब लाल सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जा रहे हैं। ईरान और ओमान के बीच अस्थायी समुद्री रास्तों की व्यवस्था भी की गई है, लेकिन इन रास्तों पर आवाजाही बेहद सीमित है। इसके अलावा सुरक्षा जोखिम भी बने हुए हैं। लाल सागर क्षेत्र में पहले से जहाजों पर हमलों का खतरा रहा है। ऐसे में एक समुद्री मार्ग से दूसरे मार्ग की ओर जाना पूरी तरह सुरक्षित समाधान नहीं माना जा सकता।
शिपिंग उद्योग के लिए नया खतरा
होर्मुज संकट ने शिपिंग उद्योग के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी कद दी है। दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते लगातार भू-राजनीतिक संघर्षों की चपेट में आ रहे हैं। कुछ साल पहले समुद्री परिवहन के लिए समुद्री डकैती सबसे बड़ा खतरा मानी जाती थी। अब ड्रोन हमले, मिसाइल हमले, नाकाबंदी और क्षेत्रीय युद्ध जैसे खतरे बढ़ गए हैं।
शिपिंग उद्योग के लिए इसका मतलब है कि कंपनियों को केवल जहाज और माल ढुलाई की लागत नहीं देखनी होगी। उन्हें युद्ध जोखिम, बीमा, वैकल्पिक मार्ग, चालक दल की सुरक्षा और बंदरगाहों की उपलब्धता को भी अपनी योजना में शामिल करना होगा।
आगे क्या होगा?
अगर होर्मुज में जल्द सामान्य आवाजाही बहाल होती है तो तेल और शिपिंग बाजार में धीरे-धीरे स्थिरता लौट सकती है। लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो वैकल्पिक मार्गों पर दबाव, परिवहन लागत, बीमा प्रीमियम और तेल की कीमतों में और अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब तक तेल भंडार ने बाजार को संभाला है, लेकिन यह सुरक्षा कवच लगातार कमजोर हो रहा है। ऐसे में होर्मुज में अगले कुछ महीने वैश्विक ऊर्जा और समुद्री व्यापार के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
