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Explained: किसानों को मिलती है कितनी सरकारी मदद? PM-KISAN से लेकर बीमा-सब्सिडी तक, जानें सबकुछ

Farmers Welfare Schemes Explained: सरकार PM-KISAN, फसल बीमा, सस्ता कर्ज, डिजिटल खेती, सौर ऊर्जा और ड्रोन जैसी योजनाओं से किसानों की मदद कर रही है, लेकिन पानी, कर्ज और बाजार की चुनौतियां अब भी कायम हैं।

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किसानों को सरकार देती है पैसा, बीमा और सब्सिडी का सहारा (तस्वीर-AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Oct 8, 2026, 13:33 IST
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Farmers Welfare Schemes Explained : भारत में खेती आज भी करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ी है। देश की अर्थव्यवस्था में खेती का हिस्सा करीब 15 से 18 प्रतिशत है, लेकिन करीब 46 प्रतिशत कामगार किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भर हैं। इसलिए किसानों की आमदनी बढ़ाना और खेती से जुड़े जोखिम कम करना बहुत जरूरी है। सरकार किसानों को आर्थिक मदद, फसल बीमा, सस्ता कर्ज, सिंचाई, डिजिटल तकनीक और बाजार उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं चला रही है। हालांकि, किसानों के सामने जमीन के छोटे टुकड़े, पानी की कमी, फसल का नुकसान और सही कीमत न मिलने जैसी बड़ी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।

PM-KISAN से किसानों को सीधे आर्थिक मदद

किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने वाली प्रमुख योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि यानी PM-KISAN शामिल है। इस योजना के तहत पात्र किसानों को हर साल 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह पैसा सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजा जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान को पैसा पाने के लिए किसी बिचौलिए पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। जून 2026 में जारी 23वीं किस्त तक 11 करोड़ से ज्यादा किसान परिवारों के बैंक खातों में 4.46 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि भेजी जा चुकी थी। सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में भी इस योजना के लिए 60,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इससे पता चलता है कि किसानों की सीधी आर्थिक मदद सरकार की प्राथमिकता में है।

फसल खराब होने पर बीमा का सहारा

खेती में मौसम सबसे बड़ा जोखिम है। बारिश ज्यादा हो जाए, सूखा पड़ जाए या तापमान बहुत बढ़ जाए तो पूरी फसल खराब हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यानी PMFBY चलाई जा रही है। यह योजना किसानों को फसल खराब होने पर बीमा का लाभ देती है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार किसानों ने 36,055 करोड़ रुपये का प्रीमियम दिया, जबकि 23.22 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को 1.92 लाख करोड़ रुपये के बीमा दावों का भुगतान किया गया। दावों के निपटारे में देरी रोकने के लिए डिजीक्लेम मॉड्यूल भी शुरू किया गया है। इसके तहत देरी होने पर बीमा कंपनियों पर 12 प्रतिशत का जुर्माना लगाया जा सकता है।

किसानों को सस्ता कर्ज देने की कोशिश

किसानों को खेती के लिए बीज, खाद, मशीन और दूसरी चीजें खरीदने के लिए पैसे की जरुरत होती है। इसके लिए सरकार संस्थागत कर्ज को बढ़ावा दे रही है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कृषि लोन का लक्ष्य बढ़ाकर 32.50 लाख करोड़ रुपये किया गया है। किसान क्रेडिट कार्ड यानी KCC के जरिए किसानों को खेती के लिए कर्ज मिल सकता है। समय पर कर्ज चुकाने वाले किसानों को अतिरिक्त ब्याज छूट भी मिलती है। इससे प्रभावी ब्याज दर 4 प्रतिशत तक आ सकती है। RBI ने बिना गारंटी वाले अल्पकालिक कृषि लोन की सीमा भी 1.60 लाख रुपये से बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी है।

खेती में डिजिटल तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल

अब खेती केवल हल और ट्रैक्टर तक सीमित नहीं है। इसमें मोबाइल, इंटरनेट, ड्रोन और डेटा जैसी नई तकनीकों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। डिजिटल कृषि मिशन के तहत कृषि क्षेत्र को डिजिटल बनाने पर काम किया जा रहा है। इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा एग्रीस्टेक है। इसमें किसानों का रिकॉर्ड, गांवों के नक्शे और बोई गई फसलों की जानकारी जैसी चीजें डिजिटल रूप में जोड़ी जा रही हैं। इससे सरकार को सही किसान तक सब्सिडी और दूसरी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में मदद मिल सकती है। भारत-विस्तार जैसे AI आधारित प्लेटफॉर्म किसानों को उनके इलाके और जरूरत के हिसाब से खेती की सलाह देने के लिए बनाए जा रहे हैं।

फसल की सही कीमत दिलाने के लिए e-NAM

किसान के लिए केवल अच्छी फसल उगाना काफी नहीं है। उसे अपनी फसल की अच्छी कीमत भी मिलनी चाहिए। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी e-NAM को बढ़ावा दिया जा रहा है। मार्च 2026 तक e-NAM से देश की 1,656 मंडियां जुड़ चुकी थीं। इस प्लेटफॉर्म पर 1.80 करोड़ से अधिक किसान और 2.73 लाख व्यापारी रजिस्टर्ड थे। इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर बाजार और पारदर्शी कीमत उपलब्ध कराना है। e-NWR जैसी व्यवस्था के जरिए किसान अपनी फसल को सुरक्षित गोदाम में रखकर तुरंत बेचने की मजबूरी से भी बच सकते हैं।

मिट्टी और पानी बचाने पर भी जोर

लगातार रासायनिक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत खराब हो सकती है। इसलिए सरकार जैविक खेती और वैकल्पिक खाद को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री-PRANAM योजना के तहत राज्यों को रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। नैनो यूरिया और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्वों पर भी काम हो रहा है। इसका उद्देश्य मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना और लंबे समय तक खेती को टिकाऊ बनाना है।

सौर ऊर्जा से खेती और अतिरिक्त कमाई

PM-KUSUM योजना किसानों को सौर ऊर्जा से जोड़ने की कोशिश करती है। इससे सिंचाई के लिए डीजल पर निर्भरता कम हो सकती है। अगस्त 2026 तक देश में 11.49 लाख से अधिक ऑफ-ग्रिड सोलर पंप लगाए जा चुके थे। किसान अपनी बेकार या कम उपयोग वाली जमीन पर सोलर प्लांट भी लगा सकते हैं। इससे बिजली पैदा की जा सकती है और अतिरिक्त बिजली बेचकर आमदनी का एक और स्रोत बनाया जा सकता है। यानी किसान खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन से भी कमाई कर सकता है।

महिलाओं को ड्रोन से जोड़ रही सरकार

खेती में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को कृषि ड्रोन उपलब्ध कराने का काम किया जा रहा है। इन महिलाओं को ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है। ड्रोन की मदद से खेतों में खाद और कीटनाशकों का छिड़काव तेजी और सही मात्रा में किया जा सकता है। इससे किसानों का समय बचता है और महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता भी खुलता है।

किसानों के लिए सरकार की योजनाओं का पिटारा! (तस्वीर-AI)

किसानों के लिए सरकार की योजनाओं का पिटारा! (तस्वीर-AI)

किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती छोटी जमीन

सरकारी योजनाओं के बावजूद किसानों की कई बड़ी समस्याएं हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या जमीन का छोटा होना है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, देश की 86 प्रतिशत कृषि जोतें छोटे और सीमांत किसानों के पास हैं। इन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। औसत कृषि जोत का आकार घटकर करीब 1.08 हेक्टेयर रह गया है। छोटी जमीन पर बड़े ट्रैक्टर या कंबाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनों का इस्तेमाल कई बार महंगा पड़ता है। इससे किसान आधुनिक खेती का पूरा फायदा नहीं उठा पाता।

पानी की कमी और मिट्टी की खराब होती सेहत

खेती के लिए पानी बहुत जरूरी है, लेकिन देश के कई हिस्सों में भूजल तेजी से कम हो रहा है। भारत में भूजल के कुल इस्तेमाल का करीब 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि में जाता है। पारंपरिक बाढ़ सिंचाई में पानी का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। दूसरी तरफ, खाद के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए खेती में पानी और खाद दोनों का सही इस्तेमाल जरूरी है।

फसल बेचने में भी किसानों को परेशानी

कई बार किसान अच्छी फसल पैदा करने के बावजूद उचित कीमत नहीं पा पाता। इसकी एक वजह बाजार में बिचौलियों की भूमिका है। फल और सब्जियों में किसान को अंतिम उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत का अक्सर केवल 20 से 35 प्रतिशत हिस्सा ही मिल पाता है। फसल की अधिक पैदावार होने पर कीमत अचानक गिर सकती है। अगर किसान के पास फसल रखने के लिए अच्छा गोदाम नहीं है, तो उसे मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ सकती है। भारत में कटाई के बाद हर साल बड़ी मात्रा में कृषि उपज खराब होने का अनुमान है।

कर्ज और मौसम का दोहरा दबाव

किसानों की एक बड़ी समस्या कर्ज भी है। 2019 के एक सर्वे के अनुसार, ग्रामीण भारत में करीब आधे कृषि परिवार कर्ज में थे। छोटे किसानों के पास जमीन के स्पष्ट कागज न होने पर बैंक से कर्ज लेना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में कुछ किसान महंगे ब्याज पर स्थानीय साहूकारों से पैसा लेते हैं। इसके साथ मौसम का खतरा भी बढ़ रहा है। देश के आधे से ज्यादा बोए गए क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा नहीं है और वह बारिश पर निर्भर है। तापमान बढ़ने और बारिश के बदलते पैटर्न से भविष्य में गेहूं जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।

महिला किसानों को ज्यादा अधिकार की जरुरत

महिलाएं खेती में बड़ी भूमिका निभाती हैं। वे बुआई, निराई और कटाई जैसे कई महत्वपूर्ण काम करती हैं। लेकिन जमीन का मालिकाना हक महिलाओं के पास बहुत कम है। इससे उन्हें बैंक कर्ज, किसान क्रेडिट कार्ड और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में परेशानी हो सकती है।

किसानों की आय बढ़ाने के लिए आगे क्या किया जा सकता है?

किसानों की स्थिति सुधारने के लिए केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं है। खेती की पूरी व्यवस्था को बेहतर बनाना होगा। किसानों और पट्टेदारों को कानूनी पहचान देने के लिए डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और ULPIN जैसी व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इससे ऐसे किसान भी सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकेंगे जिनके पास पारंपरिक जमीन के कागज नहीं हैं।

जलवायु के अनुकूल बीज, ड्रिप सिंचाई और आधुनिक खाद तकनीक को बढ़ावा देने से पानी और खाद दोनों की बचत हो सकती है। धान में पानी बचाने वाली तकनीकों और कार्बन खेती को बढ़ावा देकर किसानों के लिए आय के नए रास्ते भी बनाए जा सकते हैं।

इसके अलावा गांवों में छोटे स्तर पर फूड प्रोसेसिंग केंद्र बनाए जा सकते हैं। इससे किसान अपनी फसल को सीधे कच्चे रूप में बेचने के बजाय उससे बने उत्पाद बेच पाएगा और ज्यादा कमाई कर सकेगा। FPO यानी किसान उत्पादक संगठनों को डिजिटल बाजारों से जोड़ने पर किसान सीधे ग्राहकों तक भी पहुंच सकते हैं।

किसान की आय बढ़े, तभी खेती मजबूत होगी

किसानों के लिए सरकार की योजनाओं ने आर्थिक मदद, बीमा, कर्ज, डिजिटल तकनीक, बाजार और सौर ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों में मदद का रास्ता बनाया है। लेकिन किसानों की असली स्थिति सुधारने के लिए केवल योजनाएं काफी नहीं हैं। छोटी जमीन, पानी की कमी, मिट्टी की खराब सेहत, फसल के बाद होने वाला नुकसान, कर्ज और बाजार की समस्या को भी दूर करना होगा।

भारत को ऐसी खेती की जरुरत है जिसमें किसान सिर्फ ज्यादा फसल पैदा न करे, बल्कि उसे अपनी मेहनत की अच्छी और सुरक्षित आमदनी भी मिले। डिजिटल जमीन रिकॉर्ड, जलवायु-अनुकूल खेती, बेहतर भंडारण, फूड प्रोसेसिंग और FPO जैसे उपाय किसानों की आय और सुरक्षा दोनों बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। यही बदलाव खेती को ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और किसानों के लिए लाभदायक बना सकता है।

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