आमतौर पर रिजर्व बैंक के अधिकारी भारतीय रुपये के ओवरवैल्यूड या अंडरवैल्यूड होने पर सीधे तौर पर कुछ भी बोलने से बचते हैं। लेकिन रविवार (26 जुलाई) को 'बिजनेस लाइन' के साथ बातचीत में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि रुपया अब ओवरवैल्यूड नहीं रह गया है, बल्कि NEER और REER सूचकांकों के आधार पर यह अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। केंद्रीय बैंक की यह टिप्पणी को एक्सपर्ट्स बेहद खास मान रहे हैं। आइए समझते हैं कि रुपये के 'अंडरवैल्यूड' होने के क्या हैं मायने और कैसे यह भारत के लिए अभी भी राहत की खबर है?
रुपये में 2025 के बाद 2026 में बड़ी गिरावट
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारतीय रुपये में पिछले 14 सालों की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। इसकी मुख्य वजहें थीं - विदेशी निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में पैसा निकालना, व्यापार घाटे का बढ़ना और भू-राजनीतिक कारणों से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव। इस दौरान रुपये की कीमत में लगभग 9.5% से 11% तक की गिरावट आई और यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 से 94 के स्तर से भी नीचे चला गया। वहीं, अमेरिकी और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने और कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में आए उछाल के कारण इस साल भारतीय रुपये में बड़ी गिरावट आई। 14 जुलाई को डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के पार चला गया था। वहीं, रुपया 20 मई को डॉलर के मुकाबले 96.96 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था।
रुपया 'अंडरवैल्यूड' और 'ओवरवैल्यूड' का क्या मतलब है?
ओवरवैल्यूड का मतलब: जब किसी देश की करेंसी की कागजी कीमत उसकी असल आर्थिक क्षमता से ज्यादा होती है तो इस हालात को ओवरवैल्यूड कहा जाता है। इससे विदेशियों के लिए उस देश से सामान खरीदना महंगा हो जाता है, जिससे निर्यात को नुकसान पहुंचता है।
अंडरवैल्यूड का मतलब: जब करेंसी की कीमत अपनी वास्तविक वैल्यू से नीचे आ जाती है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि दुनिया के बाजार में उस देश के उत्पाद सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं, जिससे एक्सपोर्ट बढ़ता है।
रुपया अंडरवैल्यूड या ओवरवैल्यूड, कैसे तय होता है?
रुपया अंडरवैल्यूड या ओवरवैल्यूड है, यह केवल डॉलर के मुकाबले को देखकर यह तय नहीं किया जाता। इसके लिए रिजर्व बैंक 40 प्रमुख व्यापारिक देशों की करेंसी की बास्केट के मुकाबले रुपये को मापता है
इसके लिए दो मुख्य पैमाने इस्तेमाल होते हैं:
NEER (नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट): यह बिना महंगाई को जोड़े अन्य देशों की मुद्राओं के मुकाबले रुपये की बाहरी वैल्यू बताता है।
REER (रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट): यह NEER में भारत और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच की महंगाई के अंतर को जोड़कर वास्तविक वैल्यू बताता है। अगर REER 100 से ऊपर है तो करेंसी ओवरवैल्यूड है, और 100 से नीचे है तो अंडरवैल्यूड है।
इस तरह भारतीय रुपया अभी अंडरवैल्यूड
- नवंबर 2024: रुपये का REER 108.03 था। यानी उस समय रुपया 8% से ज्यादा ओवरवैल्यूड था।
- मई-जून 2026: डॉलर के मुकाबले रुपया 95.5 के स्तर पर पहुंचा और REER गिरकर 91.26 पर आ गया। यानी मौजूदा समय में रुपया अंडरवैल्यूड है।
चीन के 'युआन' से भी ज्यादा सस्ता हुआ रुपया!
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के 'RBEER' इंडेक्स के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय रुपये को बहुत बड़ा कॉम्पिटिटिव एडवांटेज मिला है।नवंबर 2024: चीन का युआन (92.16) रुपये (106.1) की तुलना में बहुत सस्ता और कॉम्पिटिटिव था। जून 2026: अब स्थिति उलट चुकी है। रुपये का इंडेक्स गिरकर 90.15 पर आ गया है, जबकि युआन 92.24 पर है। सरल शब्दों में कहे कि 6 साल में पहली बार भारतीय रुपया चीन की करेंसी युआन से भी ज्यादा अंडरवैल्यूड और सस्ता हुआ है।
सवाल- अर्थव्यवस्था मजबूत, फिर क्यों गिरा रुपया?
भारत के आर्थिक बुनियादी ढांचे (GDP ग्रोथ, नियंत्रित महंगाई और मजबूत बैंकिंग सेक्टर) काफी बेहतर थे। इसके बावजूद, रुपये में आई गिरावट घरेलू आर्थिक वजहों से नहीं, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल और जिओपॉलिटिकल झटकों के कारण हुई। अमेरिका-ईरान युद्ध और रेड सी (लाल सागर) संकट के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई और उसकी कीमतें बढ़ीं। वहीं, व्यापारिक रास्तों पर खतरे की वजह से भारत के आयात का बिल अचानक बढ़ गया, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी और रुपये पर दबाव आया। ये सारे फैक्टर मिलकर रुपये को कमजोर किए।
रुपया गिरने का असली सच
भारत और आम जनता को क्या फायदा होगा?
एक्सपोर्ट (निर्यात) में बढ़ोतरी: रुपया अंडरवैल्यूड होने से भारतीय उत्पाद (जैसे टेक्सटाइल, आईटी सेवाएं, दवाएं और ऑटो कंपोनेंट्स) वैश्विक बाजार में चीन और अन्य देशों के उत्पादों से सस्ते पड़ेंगे, जिससे भारतीय कंपनियों को विदेशी ऑर्डर ज्यादा मिलेंगे।
मेक इन इंडिया को बढ़ावा: आयात महंगा होने के कारण घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे देश के अंदर ही सामान बनाना ज्यादा किफायती हो जाएगा।
