WPI vs PPI : केंद्र सरकार देश में थोक महंगाई को मापने के तरीके बदलने जा रही है। अब तक देश में थोक महंगाई को मापने के लिए होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी WPI का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार अब इसकी जगह प्रोडक्शन प्राइस इंडेक्स यानी PPI लागू करने की तैयारी कर रही है। वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय ने इस बदलाव की जानकारी देते हुए बताया है कि यह बदलाव चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। इस बदलाव को लागू करने के लिए फिलहाल, WPI के लिए आधार वर्ष भी बदला गया है। अब 2011-12 की जगह 2022-23 आधार वर्ष होगा। इसके साथ ही मंत्रालय ने बताया है कि 15 जून को WPI और PPI एक साथ जारी किए जाएंगे।
क्या होता है WPI?
WPI यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स, जिसे हिंदी में थोक मूल्य सूचकांक कहते हैं। यह बताता है कि सामान की कीमतें थोक बाजार में कितनी बढ़ीं या घटीं। मसलन, किसी किसान ने मंडी में आलू किस भाव में बेचा, आटा मिल किसानों से किस दाम में गेहूं खरीद रही हैं। इसके अलावा फैक्ट्री से सामान कितने में रुपये में बनकर निकला।
WPI में क्या-क्या होता है शामिल?
WPI में मुख्य रूप से तीन तरह की चीजें को शामिल किया जाता है। प्राइमरी आर्टिकल्स यानी खेती और खदान से मिलने वाली चीजें जैसे गेहूं, चावल, सब्जियां, फल, दूध और कोयला शामिल होते हैं। वहीं, दूसरे नंबर पर फ्यूल और पावर यानी पेट्रोल, डीजल, गैस और बिजली जैसी चीजों की कीमत हो इसमें शामिल किया जाता है। आखिर में तीसरे नंबर पर मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स यानी फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान जैसे कपड़े, सीमेंट, स्टील, दवाइयां, मशीनें और खाने-पीने का पैकेट के दाम इसमें शामिल होते हैं। इस तरह इकोनॉमी के तीन अहम स्तरों पर थोक बाजार का एक सूचकांक तैयार किया जाता है, जो बताता है कि थोक स्तर पर महंगाई कितनी बढ़ी या घटी है।
सरकार ने क्या कहा?
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) ने WPI को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर PPI को लागू करने का ऐलान किया है। अगले 5 वर्षों के भीतर यानी 2031 तक WPI पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और इसकी जगह PPI लेगा।
WPI और PPI में अंतर क्या है?
WPI मोटे तौर पर थोक बाजारों या मंडियों में होने वाली खरीद-फरोख्त के आधार पर केवल वस्तुओं (Goods) के दाम में होने वाले बदलावों को मापता है और इसके आधार पर ही तय करता है कि थोक बाजार में महंगाई बढ़ी या घटी है। वहीं, दूसरी तरफ PPI वस्तुओं की जगह उत्पादन की चेन के स्रोत से आंकड़े जुटाता है। मसलन, किसी फैक्ट्री में कच्चे माल के आने की कीमत और तैयार सामान की कीमत में कितना बदलाव हुआ। इसी तरह किसान के खेत से फसल कितने में निकली और किसी फैक्ट्री तक वह फसल कितने में पहुंची और आखिर में उस फैक्ट्री से तैयार माल की कीमत कितनी रही। इस तरह यह सूचकांक उत्पादन की पूरी चेन में होने वाले बदलावों को आउटपुट PPI और इनपुट PPI की औसत दरों को ट्रैक करता है।
| तुलनात्मक मापदंड | WPI (थोक मूल्य सूचकांक) | PPI (उत्पादक मूल्य सूचकांक) |
|---|---|---|
| मूल्य स्तर का बिंदु | थोक बाजार या मंडी के स्तर पर | सीधे कारखाने (Factory Gate) या खेत के स्तर पर |
| क्षेत्रीय दायरा (Coverage) | केवल भौतिक वस्तुओं (Goods) तक सीमित | वस्तुओं के साथ-साथ सेवा क्षेत्र (Services) को भी शामिल करता है |
| दोहरी गणना की समस्या | मूल्य श्रृंखला के अलग-अलग चरणों में वस्तुओं के बार-बार शामिल होने से Double Counting की आशंका | हर स्तर पर वास्तविक Value Addition को ट्रैक कर Double Counting की समस्या खत्म करता है |
| संकलन आवृत्ति | मासिक आधार पर | वस्तुएं (Input/Output) : मासिक, जबकि Service PPI : त्रैमासिक (Quarterly) |
क्या होता है आधार वर्ष
देश में थोक महंगाई के आंकलन के लिए 1942 से WPI का इस्तेमाल होता आ रहा है। हालांकि, इसके आधार वर्ष में कई बार बदलाव हुआ है। अब तक इसके लिए आधार वर्ष 2011-12 रहा है, जिसे अब बदलकर 2022-23 कर दिया है। आधार वर्ष वह मानक होता है, जिसकी कीमतों, उत्पादन या खर्च को 100 मानकर आगे के सालों से तुलना करती है। मसलन, WPI का आधार वर्ष 2011-12 है, तो उस साल की कीमतों को आधार मानकर बाद के सालों की कीमतों में होने वाले बदलाव की तुलना की जाती है।
क्यों किया जा रहा यह बदलाव?
बहरहाल, आधार वर्ष के साथ ही पूरे सूचकांक को बदला जा रहा है। क्योंकि, मौजूदा तरीका यानी WPI देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पेश नहीं कर पा रहा है। असल में देश की GDP में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा हो गई है। लेकिन, WPI में सेवाओं के मूल्य को मापने का कोई तरीका नहीं है। इससे महंगाई की वास्तविक तस्वीर समझ नहीं आती है। इस दिक्कत को दूर करने के लिए दिसंबर 2024 में नीति आयोग के सदस्य रहे प्रोफेसर रमेश चंद की अध्यक्षता में एक 18-सदस्यीय कार्यसमूह का गठन किया गया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर इस नए वैज्ञानिक ढांचे को मंजूरी दी गई है ।
इससे सरकार को क्या फायदा
WPI जैसे सूचकांक के आंकड़े सिर्फ महंगाई के बारे में ही नहीं बताते हैं। बल्कि, ये देश की GDP का झरोखा भी है। फिलहाल, देश में GDP की गणना एकल अपस्फीति (Single Deflation) मॉडल पर होती है। इसकी वजह से कच्चे माल और अंतिम उत्पाद की कीमतों में होने वाले बदलावों की वास्तवित तस्वीर नहीं मिलती है, जिससे GDP के आंकड़े भी सटकी नहीं हो पाते हैं। PPI लागू होने से आंकड़े दोहरी अपस्फीति (Double Deflation) मेथड से आएंगे, जिससे GDP की गणना भी सटीक हो पाएगी। खासतौर पर सेवा क्षेत्र की महंगाई का इसमें शामिल होगी।
आप पर क्या होगा इसका असर?
भले ही PPI का आम लोगों के जीवन से कोई सीधा संबंध नहीं दिखता, लेकिन असल में यह सरकार से लेकर आपके घर के बजट तक को प्रभावित करेगा। क्योंकि यह आम लोगों को प्रभावित करने वाली खुदरा महंगाई (CPI) का एक फ्रंट रनिंग इंडिकेटर होगा। आम लोगों को महंगाई का झटका लगने से पहले ही यह बता देगा कि उनका बजट बिगड़ने वाला है। मिसाल के तौर पर अगर बेकरी इडस्ट्री के लिए मैदा, चीनी और बिजली की इनपुट कॉस्ट यानी इनपुट PPI में महंगाई बढ़ती है, तो आने वाले दिनों में ब्रेड और बिस्कुट के खुदरा दाम भी बढ़ जाएंगे ।
लोन की EMI और ब्याज दरों पर भी असर संभव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से अपनी मौद्रिक नीति तय करने और ब्याज दर घटाने बढ़ाने के लिए महंगाई के आंकड़ो का गहराई से आकलन किया जाता है। इस तरह आने वाले दिनों में PPI के आंकड़े आपके लोन और EMI को भी प्रभावित करेंगे। इसके अलावा नौकरीपेशा लोगों के अपरेजल और भत्ते भी महंगाई के आंकड़ों से तय होते हैं।
WPI to PPI
घर और फ्लैट की कीमतों पर असर
WPI, PPI और CPI जैसे आंकड़े सिर्फ बातों के लिए नहीं होते हैं। बल्कि, रोजमर्रा की जिंदगी पर इनका असर होता है। WPI या PPI में जब संकेत मिलते हैं कि उद्योगों को मिलने वाला कच्चा माल महंगा हो गया है, तो बाद में आम आदमी पर भी इसका असर आता है। यानी घर और फ्लैट तक की कीमतें भी इन आंकड़ों से तय होती हैं।
