US Tariff Impact : अमेरिका ने भारत समेत 17 देशों से आयात होने वाले कई प्रोडक्ट्स पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) लागू कर दिया है। यह नया शुल्क 24 जुलाई से प्रभावी हो चुका है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम कथित तौर पर फोर्स्ड लेबर यानी बंधुआ मजदूरी से बने प्रोडक्ट्स के आयात को रोकने के लिए उठाया गया है। हालांकि, भारत के व्यापार एक्सपर्ट्स और निर्यातकों का मानना है कि इस फैसले का उद्देश्य केवल श्रम संबंधी मुद्दा नहीं, बल्कि अमेरिका की संरक्षणवादी व्यापार नीति को आगे बढ़ाना भी हो सकता है। इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय निर्यात पर इसका बड़ा असर पड़ेगा, क्या अमेरिका में भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे और क्या भारत की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी? आइए विस्तार से समझते हैं।
क्या है अमेरिका का नया टैरिफ?
टैरिफ वह शुल्क होता है जो कोई देश दूसरे देशों से आने वाले सामान पर लगाता है। जब किसी प्रोडक्ट पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है। इसका असर अक्सर आयातक कंपनियों और अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत सहित 17 देशों से आने वाले कई उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया है। यह शुल्क सामान्य आयात शुल्क (MFN टैरिफ) के ऊपर लगाया जाएगा। यानी पहले जो शुल्क लगता था, अब उसके अलावा 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी देना होगा। हालांकि, 24 जुलाई से पहले भेजे गए और 28 जुलाई तक अमेरिका पहुंचने वाले सामान को इस नए शुल्क से छूट दी गई है।
अमेरिका ने यह फैसला क्यों लिया?
अमेरिका का दावा है कि यह कदम बंधुआ मजदूरी से बने प्रोडक्ट्स के आयात को रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन व्यापार एक्सपर्ट्स की राय इससे अलग है। न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका ने अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया है, जिससे यह साबित हो कि भारत बंधुआ मजदूरी से बने उत्पादों का निर्यात करता है। उनका कहना है कि भारत पहले ही अपनी विदेशी व्यापार नीति में बदलाव कर ऐसे प्रोडक्ट्स के आयात पर रोक लगा चुका है। इसके अलावा भारतीय कानून भी बंधुआ मजदूरी को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हैं। इसलिए इस नए शुल्क को केवल श्रम सुधारों से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
किन भारतीय उत्पादों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के करीब 70 प्रतिशत निर्यात इस नए 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क के दायरे में आ जाएंगे। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:- इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स, वस्त्र और परिधान, रसायन, मशीनरी, प्लास्टिक प्रोडक्ट्स, चमड़ा और फुटवियर, रत्न एवं आभूषण, फर्नीचर। इन क्षेत्रों की कंपनियों को अमेरिकी बाजार में पहले की तुलना में अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है।
किन प्रोडक्ट्स को मिली है राहत?
सभी प्रोडक्ट्स पर यह अतिरिक्त शुल्क लागू नहीं किया गया है। अमेरिका ने कुछ महत्वपूर्ण कैटेगरी को इस शुल्क से बाहर रखा है, जिनमें शामिल हैं:- कच्चा माल, कृषि से जुड़े कुछ कच्चे प्रोडक्ट्स, कुछ औद्योगिक प्रोडक्ट्स, मेडिकल और स्वास्थ्य संबंधी आपूर्ति, कुछ मेटल प्रोडक्ट्स। इसके अलावा स्टील, एल्युमीनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे प्रोडक्ट्स पहले से ही अलग अमेरिकी कानून (Section 232) के तहत ऊंचे शुल्क का सामना कर रहे हैं, इसलिए उन पर इस नए नियम का अलग प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मेरिका ने लगाया 10% अतिरिक्त शुल्क, भारतीय निर्यात पर कितना पड़ेगा असर?
क्या अमेरिका में भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे?
इस अतिरिक्त शुल्क का सीधा असर यह होगा कि अमेरिका में भारतीय सामान पहले की तुलना में महंगे हो सकते हैं। जब आयात शुल्क बढ़ता है तो अमेरिकी आयातकों की लागत भी बढ़ जाती है। कई मामलों में कंपनियां यह अतिरिक्त खर्च ग्राहकों से वसूलती हैं, जिससे बाजार में भारतीय प्रोडक्ट्स की कीमत बढ़ सकती है। अगर कीमत बढ़ती है तो कुछ अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों के प्रोडक्ट्स की ओर रुख कर सकते हैं। इससे भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर प्रभावित होने की आशंका रहती है।
फिर भी भारत की स्थिति क्यों मानी जा रही है बेहतर?
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (FIEO) का मानना है कि इस फैसले का असर केवल 10 प्रतिशत शुल्क देखकर नहीं समझा जा सकता। असल तुलना उन देशों से करनी होगी, जो भारत के प्रतिस्पर्धी हैं। फियो के अनुसार, भारत को 10 प्रतिशत के निचले शुल्क वर्ग में रखा गया है, जबकि चीन, वियतनाम, थाईलैंड, तुर्किये, संयुक्त अरब अमीरात, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई प्रतिस्पर्धी देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है। इसका मतलब यह है कि भारतीय प्रोडक्ट्स पर शुल्क जरूर बढ़ा है, लेकिन कई प्रतिद्वंद्वी देशों पर इससे भी अधिक शुल्क लगाया गया है। ऐसे में भारत की प्रतिस्पर्धी स्थिति पूरी तरह कमजोर नहीं होगी।
कपड़ा और चमड़ा उद्योग के लिए क्या है स्थिति?
भारत के वस्त्र, परिधान, चमड़ा और फुटवियर उद्योग अमेरिका के बड़े निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भारत का मुकाबला बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, कंबोडिया, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से होता है। इन देशों पर भी करीब 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है। इसलिए इन सेक्टरों में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति काफी हद तक पहले जैसी बनी रह सकती है। यानी इन उद्योगों को बड़ा झटका लगने की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।
क्या आगे और बढ़ सकता है दबाव?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि फिलहाल लागू हुआ 10 प्रतिशत शुल्क अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। जीटीआरआई के अनुसार, अमेरिका एक अन्य व्यापार जांच भी कर रहा है। अगर उस जांच के बाद नए शुल्क लगाए जाते हैं, तो भारत के औद्योगिक प्रोडक्ट्स पर और अधिक दबाव पड़ सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में अमेरिका की व्यापार नीति पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।
निर्यातकों को क्या सलाह दी गई है?
फियो ने भारतीय निर्यातकों को सलाह दी है कि वे केवल 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क देखकर घबराएं नहीं। हर प्रोडक्ट्स पर लागू होने वाले कुल अमेरिकी शुल्क, संभावित छूट, प्रतिस्पर्धी देशों पर लागू दरों और बाजार की मांग का अलग-अलग विश्लेषण करना चाहिए। कई मामलों में अतिरिक्त शुल्क का वास्तविक प्रभाव सीमित भी हो सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही रणनीति अपनाकर भारतीय कंपनियां इस चुनौती का सामना कर सकती हैं।
भारत के लिए आगे क्या हैं चुनौतियां और अवसर?
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार (India US Trade) है। ऐसे में किसी भी अतिरिक्त शुल्क का असर भारतीय उद्योगों पर पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि इस बार स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं दिख रही है, क्योंकि भारत के कई बड़े प्रतिस्पर्धी देशों पर इससे अधिक या बराबर शुल्क लगाया गया है। फिर भी जिन प्रोडक्ट्स पर अतिरिक्त शुल्क लागू हुआ है, वहां कंपनियों को लागत, कीमत और बाजार रणनीति पर नए सिरे से काम करना होगा। अगर भारत गुणवत्ता, लागत और आपूर्ति क्षमता बनाए रखता है, तो वह अमेरिकी बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी बरकरार रख सकता है।
संक्षेप में देखें तो नया 10 प्रतिशत टैरिफ भारतीय निर्यातकों के लिए एक चुनौती जरूर है, लेकिन इसे बड़ा झटका तभी माना जाएगा जब भविष्य में अमेरिका और कड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगाए। फिलहाल भारतीय कंपनियों के लिए सबसे जरूरी है कि वे बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपनी निर्यात रणनीति तैयार करें और प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अपनी बढ़त बनाए रखें।
