El Nino effect: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस बार 'अल नीनो' इफेक्ट के चलते सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान लगाया है। यह भारत के कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। IMD ने देश में 'सामान्य से कम' दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून-सितंबर) का अनुमान लगाया है। अगर यह अनुमान सही साबित हुआ तो इसका असर देश की जीडीपी से लेकर आपकी जेब पर सीधा होगा। मॉनूसन कम होने से खेतों में पैदावार कम हो सकती है। इससे जरूरी खाद्यान्न के दाम बढ़ेंगे। यह महंगाई बढ़ाने का काम करेगा। यानी आपकी जेब पर बोझ बढ़ेगा। कमजोर मॉनसून सिर्फ आपकी जेब पर ही नहीं, बल्कि देश की ग्रोथ रफ्तार पर भी असर डालेगा है। आइए समझते हैं कि कैसे मॉनसून पर 'अल नीनो' का साया GDP से लेकर आपकी जेब पर असर डालेगा।
इस बार सबसे कमजोर मॉनसून का अनुमान
2026 में भारत को पिछले कई सालों में सबसे सूखे मॉनसून का सामना करना पड़ सकता है। स्काईमेट का अनुमान है कि इस साल बारिश लंबे समय के औसत (LPA) का 94% रहेगी, जो सामान्य सीमा 96-104% से कम है। वहीं, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इसे 50 साल के औसत का 92% रहने का अनुमान लगाया है। यह अल नीनो प्रभाव के कारण होगा। इस बार सामान्य से कम बारिश या सूखे जैसी स्थिति की 70% संभावना है— जो कि 2023 की तुलना में अधिक है। हालांकि पूर्वानुमान मोटे तौर पर उम्मीदों के मुताबिक ही हैं, फिर भी उनकी विश्वसनीयता एक चिंता का विषय बनी हुई है। स्काईमेट और IMD, दोनों ही अक्सर बारिश का सही अनुमान लगाने में चूक जाते हैं। हाल के वर्षों में तो स्काईमेट की सटीकता में भी गिरावट आई है।
10 में से 7 अल नीनो में कमजोर रहा मॉनसून
1980 के बाद से, जितने भी साल अल नीनो वाले रहे हैं, उनमें से लगभग 70% सालों में गर्मियों का मॉनसून कमजोर रहा है। इससे पता चलता है कि प्रशांत महासागर की स्थितियों और देश में जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश के बीच का संबंध, भारत के बारिश के मौसम पर असर डालने वाली दुनिया भर की मौसम से जुड़ी घटनाओं में सबसे मजबूत संबंधों में से एक है। यह संबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप की मौसम एजेंसियों ने हाल ही में जो पूर्वानुमान जारी किए हैं, उनके अनुसार अल नीनो के अगले दो-तीन महीनों में शुरू होने की संभावना बढ़ गई है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि यह पहले के पूर्वानुमानों की तुलना में ज्यादा जोरदार हो सकता है। अपने मॉनसून पूर्वानुमान में, IMD ने कहा है कि इस मौसम में होने वाली बारिश सामान्य से कम रहने की उम्मीद है।
El Nino क्या है?
अल नीनो जलवायु से जुड़ी एक ऐसी घटना है जो समय-समय पर होती है। इसमें प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्से की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। पानी की यह गर्माहट हवाओं के चक्र को बिगाड़ देती है, जिससे पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बदल जाता है।
यह कैसे काम करता है?
- सामान्य स्थिति में: समुद्री हवाएं (Trade winds) गर्म पानी को पश्चिम की ओर, यानी दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं। इससे पूर्वी प्रशांत महासागर का हिस्सा ठंडा बना रहता है।
- अल नीनो के दौरान: ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या कभी-कभी अपनी दिशा बदल लेती हैं। इस वजह से गर्म पानी वापस पूर्व की ओर, यानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बहने लगता है। इससे समुद्र के तापमान और वायुमंडल का संतुलन बिगड़ जाता है।
अल नीनो का भारत पर कैसे होगा असर?
1. हवाओं के रुख में बदलाव
सामान्य तौर पर, गर्म हवाएं और नमी प्रशांत महासागर से हिंद महासागर (भारत की तरफ) आती हैं, जिससे अच्छी बारिश होती है। लेकिन अल नीनो के दौरान, यह नमी और गर्म हवाएं भारत की तरफ आने के बजाय उल्टी दिशा में (अमेरिका की तरफ) मुड़ जाती हैं। जब नमी वाली हवाएं भारत तक नहीं पहुंच पातीं, तो मॉनसून के बादल उतने घने और ताकतवर नहीं बन पाते। इसका नतीजा यह होता है कि भारत में औसत से कम बारिश होती है।
2. बारिश में देरी और लंबा सूखा
अल नीनो की वजह से मॉनसून अक्सर केरल के तट पर देरी से पहुँचता है। साथ ही, बारिश के बीच में लंबे 'ड्राई स्पेल' (सूखे के दिन) आते हैं, जिससे खेतों में खड़ी फसलें सूखने लगती हैं। कम बारिश और कमजोर बादलों की वजह से देश के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। अल नीनो वाले वर्षों में अक्सर भीषण गर्मी और लंबे समय तक लू चलने की घटनाएं देखी जाती हैं।
IMD monsoon forecast
मॉनसनू पर 40% कार्यबल का रोजगार निर्भर
कमजोर मॉनसून से अर्थव्यवस्था को काफी जोखिम होता है। कृषि, जो काफी हद तक बारिश पर निर्भर है, भारत के लगभग 40% कार्यबल को रोजगार देती है और ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ावा देती है। अतीत में, जिन वर्षों में बारिश सामान्य से कम हुई है, उन वर्षों में कृषि उत्पादन कमजोर पड़ा है और महंगाई तेजी से बढ़ी है। ईरान संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति में पहले से ही रुकावटें आ रही हैं। ऐसे में कमजोर मॉनसून खाने-पीने की चीजों की कीमतें और बढ़ा सकता है और विकास की गति को धीमा कर सकता है। फिर भी, पूर्वानुमान योजना बनाने के लिए दिशा-निर्देश देते हैं, हालांकि इनमें बड़ी गलतियों के कारण कृषि और जल प्रबंधन में गलत कदम उठाए जा सकते हैं।
किसानों पर पड़ती है दोहरी मार
सामान्य से कम बारिश का असर सिंचाई, खरीफ और रबी फसलों की बुवाई के रकबे पर पड़ सकता है। कम बारिश का असर न सिर्फ गर्मियों में बोई जाने वाली खरीफ फसलों के रकबे पर पड़ता है, बल्कि सर्दियों में बोई जाने वाली रबी फसलों पर भी पड़ता है, क्योंकि मिट्टी में नमी कम होती है और जलाशयों में सिंचाई के लिए पानी भी कम होता है। ऐसी स्थिति से अनाज के कुल उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है, भले ही देश ने पिछले कुछ सालों में अपने कृषि क्षेत्र को सूखे से बचाने के लिए कई कदम उठाए हों।
