शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि कौन-सा शेयर खरीदना है, कौन-सा म्यूचुअल फंड बेहतर है या सोने में कितना निवेश करना चाहिए। लेकिन, फर्स्ट ग्लोबल की संस्थापक और मशहूर निवेशक Devina Mehra के मुताबिक, निवेश की शुरुआत एसेट अलोकेशन की समझ के साथ होनी चाहिए। उनका कहना है कि निवेशकों की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है Asset Allocation को लेकर कोई स्पष्ट रणनीति नहीं पाना।
बाजार में निवेश के साथ एसेट अलोकेशन की समझ जरूरी
मेहरा के मुताबिक कई निवेशकों को यह तक पता नहीं होता कि उनका कुल पैसा अलग-अलग Asset Classes में कितना लगा हुआ है। Devina Mehra ने 12 अगस्त को अपनी Investing Guide सीरीज के दूसरे हिस्से में निवेशकों को इस गलती से सावधान किया। उन्होंने पूछा कि क्या निवेशक वास्तव में जानते हैं कि उनका पोर्टफोलिया अभी किस तरह Allocate है?
पहले जानिए पैसा कहां लगा है
Asset Allocation का मतलब है कि आपकी कुल निवेश योग्य रकम का कितना हिस्सा Equity, Debt, Gold, Real Estate या दूसरे Assets में लगा है। मसलन, किसी निवेशक के पास कुल ₹20 लाख का निवेश है और उसमें ₹15 लाख शेयरों और Equity Mutual Funds में हैं, तो उसका बड़ा हिस्सा Equity में है। समस्या तब पैदा होती है जब निवेशक अलग-अलग समय पर निवेश तो करते रहते हैं, लेकिन पूरे पोर्टफोलिया का हिसाब नहीं देखते। बाजार में किसी Asset की कीमत बढ़ने या गिरने से पोर्टफोलिया का संतुलन अपने आप बदल सकता है।
रिस्क को बाजार के हवाले न छोड़ें
मेहरा के मुताबिक, अगर निवेशक पहले से यह तय नहीं करता कि उसे Equity और दूसरे Assets में कितना पैसा रखना है, तो समय के साथ उसका पोर्टफोलिया उस Mix से दूर जा सकता है जिसे उसने अपने लक्ष्यों और रिस्क के हिसाब से चुना था। मिसाल के तौर पर अगर Equity बाजार लगातार तेजी में रहता है तो पोर्टफोलिया में Equity का हिस्सा काफी बढ़ सकता है। इससे संभावित रिटर्न बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही पोर्टफोलिया का रिस्क भी बढ़ जाएगा। वहीं, बाजार में गिरावट के दौरान Equity का हिस्सा कम हो सकता है।
गोल और रिस्क कैपेसिटी का रखें हिसाब
मेहरा का कहना है कि एसेट अलोकेशन का मकसद यह अनुमान लगाना नहीं है कि अगले साल कौन-सा एसेट सबसे अच्छा रिटर्न देगा। असली मकसद यह समझना है कि आपका पैसा कहां लगा है, आप कितना रिस्क उठा सकते हैं और आपके वित्तीय लक्ष्य (Financial Goals) क्या हैं। रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदने जैसे लक्ष्यों के लिए अलग-अलग समय अवधि और रिस्क क्षमता हो सकती है। इसलिए पोर्टफोलिया का अलोकेशन भी उसी के हिसाब से होना चाहिए।
पोर्टफोलिया की जांच जरूरी
निवेशकों को समय-समय पर अपने पूरे पोर्टफोलिया का ऑडिट करना चाहिए। Equity, Debt, Gold, Real Estate और अन्य निवेशों का प्रतिशत निकालकर देखें कि मौजूदा Allocation आपके लक्ष्य और रिस्क Profile के मुताबिक है या नहीं। अगर किसी एसेट का हिस्सा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है, तो रीबैलेंसिंग पर विचार किया जा सकता है। देविना मेहरा का कहना है कि निवेश सिर्फ यह तय करना नहीं है कि क्या खरीदना है, बल्कि यह भी तय करना है कि कुल पैसा कहां और कितना लगा होना चाहिए।
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