मिडिल ईस्ट में छिड़ा ईरान-इजरायल युद्ध अब एक भयानक आर्थिक संकट का रूप ले चुका है जिसका असर कच्चे तेल की कीमतों से लेकर शिपमेंट और सप्लाई सब पर दिखाई दे रहा है। मिडिल ईस्ट में भड़की आग और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। यह स्थिति हमें 1990 के खाड़ी युद्ध की याद दिलाती है, जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई थी। 1990 में हुए खाड़ी युद्ध के दौरान कच्चे तेल के दाम लगभग 140% तक उछल गए थे, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी और पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया था।
मौजूदा समय में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तेल उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है, क्योंकि दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। आज, एक बार फिर वैसी ही 'अग्निपरीक्षा' के मुहाने पर भारत खड़ा है। ऐसे में सवाल उठता है क्या 2026 में भी इतिहास खुद को दोहराएगा? आइए जानते हैं 1990 की तुलना में आज की स्थिति कितनी खतरनाक है और भारत इससे कैसे निपटेगा?
1990 का खाड़ी युद्ध
1990 का खाड़ी युद्ध और उसके बाद पैदा हुआ तेल संकट वैश्विक इतिहास की एक सबसे बड़ी विनाशकारी घटना थी, जिसने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा असर डाला। इस युद्ध की शुरुआत 2 अगस्त 1990 को हुई, जब इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सेना ने कुवैत पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया। इराक ने कुवैत पर तेल की चोरी करने और भारी कर्ज में डूबे होने जैसे आरोप लगाए थे, जिसके कारण यह युद्ध छिड़ा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हमले की कड़ी निंदा की और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद जब इराक पीछे नहीं हटा, तो अमेरिका के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी।
इस युद्ध के कारण तेल बाजार में दहशत फैल गई, क्योंकि इराक और कुवैत दोनों ही प्रमुख तेल उत्पादक देश थे। युद्ध शुरू होते ही कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो गई, जिससे कीमतें आसमान छूने लगीं। आंकड़ों के अनुसार, उस दौरान कच्चे तेल के दाम लगभग 140% तक उछल गए और कीमतें $17-18 प्रति बैरल से बढ़कर $40 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही रुकने से दुनिया भर में तेल की भारी कमी हो गई।
भारत पर इस संकट का प्रभाव विनाशकारी रहा, क्योंकि उस समय भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक तेल आयात करता था और विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम था। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल दोगुना हो गया, जबकि डॉलर के मुकाबले रुपया महज 17-18 रुपये के आसपास था। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि भारत सरकार को अपना सोना भंडार बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा था ताकि अंतरराष्ट्रीय भुगतान किया जा सके। इस भयानक वित्तीय संकट ने ही भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने और 1991 में बड़े आर्थिक सुधार (LPG Reforms) करने के लिए मजबूर किया।
1990 में रुपया डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर था, लगभग 17 से 18 रुपये प्रति डॉलर। तेल के दाम बढ़ने और डॉलर के महंगा होने से भारत का आयात बिल दोगुना हो गया। इसके परिणामस्वरूप, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट आई और देश को सोने का भंडार गिरवी रखना पड़ा था।
basmati rice crisis
वर्तमान में क्या है हालत?
आज की स्थिति 1990 से थोड़ी अलग है, लेकिन खतरे कम नहीं हैं। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) पहले ही $82 प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है। जानकारों का अनुमान है कि अगर तनाव बढ़ा, तो यह जल्द ही $100 से $120 प्रति बैरल के पार जा सकता है।
वर्तमान में रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 90 से 92 रुपये प्रति डॉलर के बीच कारोबार कर रहा है। 1990 की तुलना में भारतीय रुपया काफी नीचे है। महंगा तेल और कमजोर रुपया मिलकर भारत के आयात बिल को बहुत तेजी से बढ़ा सकते हैं।
crude oil prices
भारत के लिए 'अग्निपरीक्षा'
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है। मिडिल ईस्ट में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से भारत का लगभग 50% तेल आता है। अगर यह समुद्री रास्ता बंद होता है, तो भारत के लिए तेल की सप्लाई पर संकट पैदा हो जाएगा।
अगर कच्चे तेल के दाम $100 के पार जाते हैं, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5-10 रुपये तक का इजाफा हो सकता है। इससे न केवल पेट्रोल महंगा होगा, बल्कि ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ने से फल, सब्जियां और अन्य जरूरी चीजें भी महंगी हो जाएंगी, जिससे महंगाई (Inflation) आसमान छूने लगेगी।
कच्चे तेल की कीमतों में महा उछाल की वजह से सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा देखने को मिलेगा? जानकारों की मानें तो जब तक कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल को पार नहीं जातीं, तब तक देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में किसी इजाफे के आसार नहीं हैं। इसके पीछे कारण यह है कि भारत के पास कच्चे तेल का काफी रिजर्व मौजूद है और साथ ही रूस से तेल मंगाने का विकल्प भी खुला है, इसलिए अभी चिंता की कोई बात नहीं है। इसके बावजूद, सरकार की नजरें कीमतों पर बनी रहेंगी। अगर कच्चे तेल के दाम $100 प्रति बैरल के पार जाते हैं, तो पेट्रोल और डीजल के दाम में 3 से 5 रुपये तक का इजाफा देखने को मिल सकता है।
