Cooking Oil Prices: भारत में कच्चे सूरजमुखी तेल के आयात में फरवरी महीने में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार फरवरी में देश का कच्चा सूरजमुखी तेल आयात 51 प्रतिशत घटकर करीब 1,45,000 टन रह गया। आयात में यह गिरावट मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और काला सागर क्षेत्र के समुद्री परिवहन मार्गों में आ रही बाधाओं के कारण हुई है। इन हालातों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सूरजमुखी तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं और भारत के आयातकों पर अतिरिक्त लागत का दबाव पड़ा है।
पश्चिम एशिया युद्ध, बढ़ती कीमतों से फरवरी में भारत का सूरजमुखी तेल आयात 51 प्रतिशत घटा (तस्वीर-istock)
कीमतों में तेज उछाल
एसईए के मुताबिक, फरवरी में कच्चे सूरजमुखी तेल का औसत आयात मूल्य बढ़कर 1,420 डॉलर प्रति टन हो गया, जबकि एक साल पहले यह 1,216 डॉलर प्रति टन था। यानी कीमतों में करीब 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही भारतीय रुपये में पिछले साल करीब 4.2 प्रतिशत की गिरावट भी दर्ज की गई, जिससे आयातकों और रिफाइनिंग कंपनियों के लिए सूरजमुखी तेल खरीदना और महंगा हो गया। कीमतों में इस बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है।
रूस और यूक्रेन पर अधिक निर्भरता
भारत के सूरजमुखी तेल आयात का बड़ा हिस्सा रूस और यूक्रेन से आता है। एसईए के अनुसार, ये दोनों देश मिलकर भारत के कुल सूरजमुखी तेल आयात का करीब 70 से 90 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराते हैं। लेकिन काला सागर क्षेत्र में युद्ध से जुड़ी स्थितियों और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के कारण इन देशों से आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसके अलावा लाल सागर और स्वेज नहर क्षेत्र में तनाव के कारण भी जहाजों की आवाजाही में बाधा आ रही है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है।
आपूर्ति और लॉजिस्टिक पर बढ़ता दबाव
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक एसईए ने अपने बयान में कहा कि मौजूदा युद्ध और समुद्री मार्गों पर संभावित रुकावटों के कारण निर्यात खेपों में देरी हो सकती है। इससे लॉजिस्टिक खर्च बढ़ने के साथ-साथ बाजार में उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों के कारण व्यापारियों और उपभोक्ताओं को आपूर्ति सीरीज से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर रखनी पड़ रही है।
तेल वर्ष के शुरुआती महीनों में भी गिरावट
भारत में तेल वर्ष नवंबर से शुरू होता है। नवंबर 2025 से शुरू हुए तेल वर्ष 2025-26 के पहले चार महीनों में सूरजमुखी तेल आयात में गिरावट देखी गई है। इस अवधि में आयात घटकर 9.04 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 11.2 लाख टन था। यानी कुल आयात में भी स्पष्ट कमी दर्ज की गई है।
वैकल्पिक स्रोतों की तलाश
काला सागर क्षेत्र पर अधिक निर्भरता को कम करने के लिए भारत अब नए विकल्प तलाश रहा है। इसके तहत भारत मर्कोसुर देशों अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और उरुग्वे के साथ लंबे समय के लिए सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की आपूर्ति के अनुबंध पर बातचीत कर रहा है। यदि ये समझौते होते हैं तो भारत को भविष्य में आपूर्ति संकट से कुछ राहत मिल सकती है।
डी-ऑयल्ड केक निर्यात पर भी खतरा
यह संघर्ष केवल तेल आयात तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के खाद्य तेल डी-ऑयल्ड केक (डीओसी) निर्यात पर भी असर डाल सकता है। लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया के देशों में जाने वाली खेपों में देरी या कमी आ सकती है। ये क्षेत्र भारत के कुल खाद्य तेल डीओसी निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं।
कुल वनस्पति तेल आयात और स्टॉक की स्थिति
हालांकि सूरजमुखी तेल का आयात घटा है, लेकिन फरवरी में कुल वनस्पति तेल आयात (खाद्य और अखाद्य दोनों) पिछले साल की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत बढ़कर 53.24 लाख टन हो गया। इस दौरान पाम तेल का आयात 8.47 लाख टन और सोयाबीन तेल का आयात 2.99 लाख टन रहा। वहीं एक मार्च तक देश में कुल वनस्पति तेल का स्टॉक 18.72 लाख टन दर्ज किया गया, जो पिछले महीने की तुलना में करीब 85,000 टन अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक हालात सामान्य होने तक खाद्य तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
