छठ पर घर जाना है। मां इंतजार कर रही है, पिता फोन करके पूछ रहे हैं कि बेटा, कब तक पहुंचोगे? घर में छठ घाट जाने रंगने-सजाने की तैयारी चल रही है। किसी को प्रसाद बनाना है, किसी को घाट सजाना है और किसी को अपनों के साथ चार दिन की खुशियां बांटनी हैं, लेकिन दिल्ली, मुंबई या दूसरे शहरों में नौकरी करने वाले लाखों लोगों के सामने इस बार सबसे बड़ा सवाल है, घर जाएं तो जाएं कैसे?
जिस पटना तक पहुंचने के लिए आम दिनों में 5-6 हजार रुपये का हवाई टिकट मिल जाता है, वहां छठ के मौके पर किराया 27 हजार से 34 हजार रुपये तक पहुंच गया है। हालत यह है कि मुंबई से लंदन जाने का हवाई किराया करीब 25 हजार रुपये है, जबकि दिल्ली से पटना की फ्लाइट उससे भी महंगी पड़ रही है। ट्रेनों में टिकट के लिए हाथ-पैर मारने के बाद स्क्रीन पर REGRET दिखाई दे रहा है और बसों में भी जेब ढीली करनी पड़ रही है। सवाल यह है कि क्या अब छठ जैसे लोकपर्व पर घर लौटना भी आम आदमी की आर्थिक हैसियत से तय होगा?
लंदन जाना सस्ता, पटना पहुंचना महंगा!
जरा किराये का गणित समझिए। 12 नवंबर 2026 को दिल्ली से पटना जाने के लिए एयर इंडिया की फ्लाइट का किराया 27,523 रुपये तक पहुंच गया है। 11 नवंबर को भी एयर इंडिया की लगभग सभी फ्लाइट के किराये 27 हजार रुपये की रेंज में हैं। यानी जिस सफर को आम दिनों में कुछ हजार रुपये खर्च करके पूरा किया जा सकता है, उसके लिए अब एक महीने की कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ सकता है।
12 नवंबर 2026 को किराया
मुंबई से पटना जाने वालों की मुश्किल तो और भी बड़ी है। 12 नवंबर को इस रूट पर हवाई किराया 33,893 रुपये तक पहुंच चुका है। इंडिगो की एक फ्लाइट का किराया भी 20,285 रुपये है। दूसरी तरफ, मुंबई से लंदन का किराया करीब 25 हजार रुपये होने का आंकड़ा इस अंतर को और चुभने वाला बनाता है। हालांकि, दोनों रूटों के किराये तारीख, उपलब्ध सीटों, फ्लाइट और बुकिंग की शर्तों के हिसाब से बदल सकते हैं, फिर भी पटना के लिए सामने आ रहे ये आंकड़े यात्रियों की परेशानी बयां करते हैं।
11 नवंबर, मुंबई से पटना
अब उस परिवार के बारे में सोचिए, जिसमें पति-पत्नी और दो बच्चे हैं। अगर एक व्यक्ति का टिकट ही 27 हजार रुपये का है, तो चार लोगों के आने-जाने का खर्च लाख रुपये के आसपास पहुंच सकता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कोई सामान्य नौकरीपेशा परिवार छठ मनाने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च कर सकता है?
छठ कोई छुट्टी नहीं, घर लौटने की भावना है
दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद और दूसरे शहरों में काम करने वाले बिहार के लाखों लोगों के लिए छठ सिर्फ एक त्योहार नहीं है। यह वह मौका है, जब साल भर परिवार से दूर रहने वाला बेटा घर लौटता है। मां के हाथ का खाना खाता है, पिता के साथ बाजार जाता है और घाट पर परिवार के साथ खड़ा होता है। बहुत से लोग पूरे साल इसी उम्मीद में पैसे बचाते हैं कि दिवाली और छठ पर घर जा सकेंगे।
लेकिन जब आने-जाने का किराया ही हजारों से बढ़कर दसियों हजार रुपये हो जाए, तो त्योहार की खुशी बजट का हिसाब लगाने में निकल जाती है। किसी को बच्चों की पढ़ाई के लिए रखे पैसे निकालने पड़ते हैं, तो किसी को घर के दूसरे खर्च टालने पड़ते हैं। और जो अतिरिक्त रकम जुटा नहीं पाता, उसके हिस्से में वीडियो कॉल पर छठ देखने की मजबूरी आती है।
क्या त्योहार पर घर लौटना अब सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए रह जाएगा, जिनकी जेब इसकी इजाजत देती है? यह सवाल सिर्फ हवाई किराये का नहीं, बल्कि आम आदमी के त्योहार मनाने के अधिकार और उसकी आर्थिक मजबूरी का भी है।
एयरलाइंस के किराये पर कौन लगाएगा लगाम?
त्योहारी सीजन में मांग बढ़ना कोई नई बात नहीं है। छठ और दिवाली के दौरान दिल्ली और मुंबई से पटना जाने वाले यात्रियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। लेकिन क्या मांग बढ़ने का मतलब यह है कि किराया भी आम दिनों के मुकाबले तीन गुना या उससे अधिक हो जाए? जब सामान्य दिनों में इसी रूट पर 5-6 हजार रुपये के आसपास टिकट मिल सकता है, तो त्योहार के समय 20 से 30 हजार रुपये से अधिक खर्च करना यात्रियों के लिए बड़ा झटका है।
यहीं पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय और संबंधित नियामक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठते हैं। यात्रियों को यह जानने का हक है कि इतने बड़े अंतर के पीछे क्या वजह है और इस तरह की कीमतों पर निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। एयरलाइंस मांग और उपलब्ध सीटों के आधार पर किराया तय कर सकती हैं, लेकिन जब त्योहार पर घर लौटने की मजबूरी का फायदा उठाए जाने का सवाल उठता है, तो पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी की मांग भी तेज होती है।
मंत्रालय और नियामक संस्थाओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि त्योहारी सीजन में किराये की निगरानी कैसे की जा रही है और यात्रियों को असामान्य रूप से महंगे टिकटों से राहत देने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। आखिर हवाई सफर लग्जरी हो सकता है, लेकिन अपने परिवार से मिलने की इच्छा को महज लग्जरी नहीं कहा जा सकता।
ट्रेन में टिकट नहीं, हर तरफ REGRET!
अगर आपको लगता है कि हवाई किराया ज्यादा है, तो ट्रेन का विकल्प भी देख लीजिए। यूपी और बिहार जाने वाली कई प्रमुख ट्रेनों में टिकट की स्थिति REGRET तक पहुंच चुकी है। इसका मतलब है कि संबंधित कोटे में फिलहाल टिकट बुक नहीं किया जा सकता। ऐसे में जिन यात्रियों ने पहले से टिकट की योजना नहीं बनाई या जिन्हें कन्फर्म टिकट नहीं मिला, उनके सामने विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं।
इस बार रेलवे की टिकट बुकिंग व्यवस्था को लेकर भी यात्रियों की शिकायतें सामने आई हैं। रेलवे ने RailOne ऐप लॉन्च किया, IRCTC की वेबसाइट को अपग्रेड किया और उम्मीद जगाई कि टिकट बुक करना आसान होगा। लेकिन यात्रियों की परेशानी यह रही कि दिवाली और छठ के लिए 60 दिन पहले बुकिंग खुलते ही कई लोगों को भारी लोड और तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
अब हालात ये हैं कि बुकिंग के शुरुआती मिनटों में ही वेबसाइट और ऐप पर लोड ज्यादा होने का एरर दिखने लगा। कई लोग 5-10 मिनट तक कोशिश करते रहे, लेकिन दोबारा लॉगिन करने या भुगतान की प्रक्रिया तक पहुंचने के बाद भी टिकट नहीं मिला। इसके बाद कई ट्रेनों में सीटों की स्थिति REGRET हो गई।
यहां एक जरूरी सवाल है.....जब त्योहारों के दौरान टिकट की मांग का अंदाजा रेलवे को पहले से होता है, तो बुकिंग के शुरुआती मिनटों में ही आम यात्रियों को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ती है? टिकट दलालों की भूमिका और बुकिंग व्यवस्था में संभावित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि, सिर्फ टिकट जल्दी खत्म होने या वेबसाइट पर एरर आने से यह साबित नहीं होता कि सभी टिकट दलालों ने बुक किए हैं। लेकिन यात्रियों की शिकायतों को नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है।
नई वंदे भारत स्पेशल का ऐलान, लेकिन सीटें कहां?
रेलवे ने नई दिल्ली से पटना के बीच 02252 नंबर की वंदे भारत स्पेशल ट्रेन चलाने का ऐलान किया है। यात्रियों को उम्मीद थी कि इससे छठ पर घर जाने की राह आसान होगी। लेकिन इस ट्रेन में भी सीटों की उपलब्धता को लेकर निराशा सामने आ रही है और बुकिंग की स्थिति REGRET दिखाई देने की शिकायत है।
इस ट्रेन को सप्ताह में तीन दिन चलाने का फैसला किया गया है। सवाल यह है कि जब छठ के समय बिहार जाने वाली ट्रेनों में इतनी भारी भीड़ है, तो अतिरिक्त ट्रेनें चलाने की योजना त्योहार की वास्तविक तारीखों और यात्रियों की जरूरत के हिसाब से क्यों नहीं बनाई जाती? सिर्फ नई ट्रेन का ऐलान कर देना काफी नहीं है। उसका समय, फेरे और सीटों की संख्या भीड़ के अनुपात में होनी चाहिए।
रेलवे को मांग का आकलन करके अतिरिक्त फेरे बढ़ाने, जरूरत के मुताबिक विशेष ट्रेनें चलाने और बुकिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने पर काम करना चाहिए। अगर ट्रेन की घोषणा के बावजूद यात्री टिकट नहीं ले पा रहे हैं, तो राहत का उद्देश्य अधूरा ही रह जाता है।
बस का किराया भी आम आदमी की पहुंच से बाहर
ट्रेन और फ्लाइट में टिकट नहीं मिल रहा, तो बहुत से लोग बस का विकल्प तलाशते हैं। लेकिन यहां भी राहत मिलती नहीं दिख रही। दिल्ली से पटना जाने वाली बसों का किराया त्योहार के दौरान 5 हजार से 8 हजार रुपये तक पहुंचने गया है, जबकि सामान्य दिनों में कई सेवाओं का किराया करीब 1,000 से 1,500 रुपये के बीच रहता है।
12 नवंबर 2026 को Tegra Express बस का दिल्ली से पटना का किराया 4,839 रुपये है। वहीं, 1 नवंबर को इसी बस सेवा का किराया 1,614 रुपये था। यानी तारीख बदलने के साथ किराये में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। बसों में भी किराया ऑपरेटर, सीट, सुविधा और बुकिंग के समय के हिसाब से बदल सकता है, लेकिन यात्रियों के लिए इतनी बढ़ोतरी का बोझ उठाना आसान नहीं है। हाल में जो बस में आग लगने की घटनाएं हुई हैं, वो रिस्क अलग है।
12 नवंबर को बस का किराया
जिस व्यक्ति की महीने की कमाई 20-25 हजार रुपये है, उसके लिए घर जाने और वापस लौटने में ही हजारों रुपये खर्च हो जाना बड़ी परेशानी है। अगर परिवार के दो या तीन सदस्य साथ यात्रा कर रहे हों, तो खर्च और बढ़ जाता है। ऐसे में बस, ट्रेन और फ्लाइट, तीनों विकल्प आम आदमी को राहत देने के बजाय उसके बजट पर दबाव डालते नजर आते हैं।
सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल: घर जाने का रास्ता इतना मुश्किल क्यों?
छठ के दौरान बिहार जाने वाले यात्रियों की भीड़ अचानक पैदा नहीं होती। रेलवे, एयरलाइंस और प्रशासन को हर साल इसका अनुभव होता है। ऐसे में व्यवस्था का काम सिर्फ मांग बढ़ने के बाद अतिरिक्त सेवाओं का ऐलान करना नहीं, बल्कि पहले से योजना बनाना भी है।
रेलवे को समय रहते विशेष ट्रेनों और अतिरिक्त फेरों की योजना बनानी चाहिए। टिकट बुकिंग में तकनीकी दिक्कतों की जांच होनी चाहिए और संदिग्ध बुकिंग गतिविधियों पर निगरानी बढ़नी चाहिए। नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भी त्योहारी किरायों की स्थिति पर पारदर्शी जानकारी देनी चाहिए। बस सेवाओं के मामले में यात्रियों को अलग-अलग ऑपरेटरों के किराये और शर्तों की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे मजबूरी में किसी एक महंगे विकल्प पर निर्भर न रहें।
यह भी जरूरी है कि यात्रियों को समय रहते अतिरिक्त ट्रेनों, बसों और उड़ानों की जानकारी मिले। आखिरी समय पर विकल्प तलाशने वाले लोगों को अक्सर सबसे महंगा किराया चुकाना पड़ता है। लेकिन पूरी जिम्मेदारी यात्रियों पर डाल देना भी ठीक नहीं है। त्योहारों के दौरान परिवहन व्यवस्था पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है, पर इसकी तैयारी करना संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
मां का इंतजार और जेब का हिसाब, आखिर किसे चुनें?
छठ का पर्व उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का ही नहीं, बल्कि परिवार, आस्था और घर लौटने की भावना का भी प्रतीक है। इस मौके पर कोई मां अपने बेटे का इंतजार करती है, कोई बच्चा अपने पिता के आने की राह देखता है और कोई पत्नी फोन पर पूछती है कि इस बार छठ में घर आ पाओगे न?
लेकिन जब सामने फ्लाइट का 27 हजार रुपये का टिकट हो, बस का किराया कई गुना बढ़ा हुआ हो और ट्रेन में REGRET लिखा दिखाई दे, तो जवाब देना आसान नहीं होता। आदमी टिकट की कीमत देखता है, फिर अपनी सैलरी, घर का खर्च, बच्चों की फीस और महीने भर का बजट याद करता है। आखिरकार कई लोगों को मन मारकर घर जाने का विचार छोड़ना पड़ सकता है।
त्योहार पर घर लौटना किसी के लिए कारोबार का मौका हो सकता है, लेकिन आम आदमी के लिए यह अपने परिवार से मिलने की जरूरत और भावना है। सवाल यह नहीं कि छठ पर भीड़ क्यों बढ़ती है। सवाल यह है कि जब यह भीड़ हर साल आती है, तो व्यवस्था पहले से तैयार क्यों नहीं रहती?
सरकार, रेलवे और विमानन क्षेत्र से जुड़े जिम्मेदार संस्थानों को इस सवाल का जवाब देना होगा। क्योंकि छठ पर घर जाने की इच्छा रखने वाला हर व्यक्ति अमीर नहीं है। बहुत से लोग अपनी मेहनत की कमाई से परिवार चलाते हैं और पूरे साल बचत करके त्योहार पर घर लौटते हैं।
अगर उन्हें भी अपने ही घर पहुंचने के लिए इतना संघर्ष करना पड़े, तो यह सिर्फ महंगे किराये की कहानी नहीं, बल्कि उस आम आदमी की बेबसी है, जो त्योहार पर अपनों के साथ होना चाहता है, लेकिन रास्ते का खर्च उसकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
