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बिहार का मखाना बना दुनिया का 'सुपरफूड', अमेरिका, कनाडा, यूएई समेत कई देशों में बढ़ी मांग

Bihar Makhana Exports: बिहार का मखाना दुनिया में 'सुपरफूड' बनकर उभर रहा है। सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीकों और राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के सहयोग से भारत वैश्विक आपूर्ति कर अमेरिका, कनाडा और यूएई सहित कई देशों में निर्यात बढ़ा रहा है।

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दुनियाभर में छाया बिहार का मखाना: अमेरिका, कनाडा और अरब देशों में भारी मांग, बना एक्सपोर्ट का नया किंग! (तस्वीर-AI)

Bihar Makhana Exports : बिहार का पारंपरिक खाद्य पदार्थ 'मखाना' (फॉक्स नट) आज अपनी पौष्टिकता के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'सुपरफूड' के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। वैज्ञानिक रूप से Euryale ferox के नाम से जाना जाने वाला यह जलीय पौधा मुख्य रूप से उथले तालाबों और आर्द्रभूमियों में उगाया जाता है। इसके बीजों को भूनकर तैयार किया जाने वाला मखाना आज न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बन गया है। भारत विश्व में मखाने का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, और इसमें बिहार की भूमिका सबसे अग्रणी है। अनुकूल जलवायु, पारंपरिक ज्ञान, सरकारी योजनाओं और स्टार्टअप्स के सहयोग से मखाना उद्योग आज एक नए वैश्विक आयाम को छू रहा है।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और सरकारी सहायता से मिली नई दिशा

मखाना क्षेत्र को आधुनिक बनाने और इसकी पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित 'राष्ट्रीय मखाना बोर्ड' का औपचारिक शुभारंभ 15 सितंबर 2025 को बिहार में किया गया। इसके साथ ही सरकार ने 'मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र योजना' को मंजूरी दी है, जिसके लिए 2025-26 से 2030-31 की अवधि के लिए 476.03 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इस योजना के तहत वर्ष 2025-26 के लिए 30 करोड़ रुपये और 2026-27 के लिए 90 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता बढ़ाना, अनुसंधान, नई तकनीक, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और निर्यात को बढ़ावा देना है।

उत्पादन में भारत का दबदबा और बिहार की केंद्रीय भूमिका

पीआईबी के मुताबिक वैश्विक मखाना आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी करीब 80 से 85 प्रतिशत है। देश के कुल उत्पादन में अकेला बिहार करीब तीन-चौथाई योगदान देता है। बिहार के उत्तर-पूर्वी इलाकों विशेष रूप से कोसी बेसिन (सुपौल, सहरसा, मधेपुरा) तथा मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में मखाने का उत्पादन 2024-25 के 63,910 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 80,590 मीट्रिक टन पहुंच गया है। इस दौरान औसत उत्पादकता भी 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर हो गई। 2025-26 में अकेले बिहार ने 2.00 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता के साथ 60,000 मीट्रिक टन मखाने का उत्पादन किया।

तालाबों से निकलकर विदेश तक छाया बिहार का मखाना, बना दुनिया का नया पसंदीदा 'सुपरफूड'

तालाबों से निकलकर विदेश तक छाया बिहार का मखाना, बना दुनिया का नया पसंदीदा 'सुपरफूड'

आधुनिक तकनीक और उन्नत किस्मों से बदला खेती का स्वरूप

पारंपरिक रूप से केवल प्राकृतिक तालाबों तक सीमित रहने वाली मखाने की खेती में अब बड़ा बदलाव आया है। 'फील्ड-सिस्टम' (खेतों में पानी भरकर खेती) जैसी आधुनिक तकनीकों और 'स्वर्ण वैदेही' तथा 'सबौर मखाना-1' जैसी वैज्ञानिक रूप से विकसित उन्नत किस्मों के प्रयोग ने इसकी उत्पादकता में अप्रत्याशित वृद्धि की है। इन नई तकनीकों से न केवल मखाने की खेती का क्षेत्रफल बढ़ा है, बल्कि किसानों के लिए फसल से जुड़े जोखिम भी काफी कम हुए हैं।

ग्लोबल मार्केट में मखाने का निर्यात और कमाई के आंकड़े

वर्ष 2025 में विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने पॉप्ड मखाना के लिए अलग HSN कोड जारी किया, जिससे इसके सटीक निर्यात आंकड़ों का पता चलना संभव हुआ। पीआईबी के मुताबिक वर्ष 2025–26 में भारत ने 19,296.08 लाख रुपये मूल्य का 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पाद निर्यात किया। भारत के मखाना निर्यात का 77% हिस्सा तीन प्रमुख देशों में जाता है, अमेरिका (40%), कनाडा (20%) और यूएई (17%)। हालांकि, इन बड़े बाजारों में औसत कीमत $13.3 से $19.5 प्रति किग्रा मिलती है। इसके विपरीत, जर्मनी ($26.0/किग्रा), नेपाल ($21.6/किग्रा) और ऑस्ट्रेलिया ($21.0/किग्रा) जैसे छोटे बाजार सीमित मात्रा के बावजूद मखाने की प्रीमियम कीमतें दे रहे हैं, जबकि ब्रिटेन ($20/किग्रा) 10% बाजार हिस्सेदारी के साथ एक संतुलित बाजार बना हुआ है।

किसान कल्याण और भविष्य की संभावनाएं

मखाना विकास योजना के तहत देश भर में 1,010 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मखाने की खेती के अंतर्गत लाया गया है और 73 हेक्टेयर में विशेष बीज उत्पादन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। किसानों को उन्नत तकनीकों से जोड़ने के लिए 89 फ्रंट-लाइन प्रदर्शन आयोजित किए गए। साथ ही, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि विश्वविद्यालयों के माध्यम से प्रशिक्षण, सेमिनार और एक्सपोजर विजिट कराए गए। वर्ष 2025-26 के दौरान इस योजना से देश के 8,159 किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हुए हैं। मखाने का यह बढ़ता बाजार न केवल बिहार के किसानों की आय बढ़ा रहा है, बल्कि भारत के कृषि निर्यात को भी एक नई पहचान दे रहा है।

Ramanuj Singh
रामानुज सिंहauthor

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, इनकम टैक्स, बैंकिंग, बुलियन और कमोडिटी मार्केट जैसे विषयों पर गहरी विशेषज्ञता विकसित की है। जर्नलिज्म में एमए की डिग्री और वर्षों के अनुभव से विकसित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ, रामानुज जटिल वित्तीय विषयों को सरल, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। अब तक वे 22,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं।

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