Pakistan's terrorism: सीजफायर पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत होने जा रही है। खास बात यह है कि यह वार्ता कहीं और नहीं पाकिस्तान में हो रही है। बातचीत के लिए अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस की अगुवाई में एक बड़ा शिष्टमंडल इस्लामाबाद पहुंचा है। ईरानी दल भी आ चुका है। पाकिस्तान की राजधानी में लंबे अरसे बाद इस स्तर का कोई विदेशी शिष्टमंडल पहुंचा है। वैश्विक मोर्चे पर अलग-थलग रहने वाले पाकिस्तान के लिए यह बहुत बड़ी बात है। इसे वह अपनी एक बड़ी उपलब्धि मान रहा है। वह दुनिया भर में अमन, शांति, अपनी कूटनीतिक जीत का ढिंढोरा पीट रहा है। इस सीजफायर पर हो रही इस बातचीत को लेकर भी वह दुनिया को गुमराह और झांसा दे रहा है। इस सीजफायर वार्ता के पीछे पाकिस्तान नहीं बल्कि अमेरिका है। अमेरिका के ही इशारे पर पाकिस्तान 'डाकिया' बना। यहां तक कि शहबाज शरीफ का ट्वीट भी वाशिंगटन से 'ड्रॉफ्ट' होकर आया।
आतंकवाद का गढ़ है पाकिस्तान
पाकिस्तान के मुंह से अमन-शांति की बातें शोभा नहीं देतीं। जिस मुल्क की फितरत में ही फरेब, धोखा, दगाबाजी हो, उस मुल्क पर भरोसा नहीं किया जा सकता और आतंकवाद को अपनी विदेश नीति के एक अघोषित सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाने वाला देश शांति का भी पक्षधर नहीं हो सकता। वह आतंकवाद का गढ़ है। दर्जन भर से ज्यादा आतंकवादी संगठनों को वह पालता-पोसता और उन्हें संरक्षण देता आया है। आज भी दर्जन भर से ज्यादा आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी सरजमीं पर सक्रिय हैं। लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद, अल कायदा (पाकिस्तान), हिज्बुल मुजाहिदीन, लश्कर ए झांगवी, हरकत उल मुजाहिदीन, तहरीक ए तालिबान ये आतंकवादी संगठन पाकिस्तान की धरती पर मौजूद हैं और इनमें से कई को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) का संरक्षण प्राप्त है।
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कश्मीर में खेला आतंक का 'खेल'
पाकिस्तान के इन आतंकवादी संगठनों ने भारत सहित दुनिया भर में आतंकी हमले किए और अपने हमलों में हजारों लोगों को मारा। पाकिस्तान के इस आतंकवाद का सबसे ज्यादा शिकार यदि कोई देश रहा है तो वह भारत है। 1990 के दशक से कश्मीर में पाकिस्तान ने आतंक का 'खूनी खेल' खेलना शुरू किया जिसकी वजह से लाखों की संख्या में कश्मीरियों को पलायन करना पड़ा। ये दशकों से सुरक्षाबलों पर हमले करते आए हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए आतंकी घटनाएं कराता रहा। मुंबई हमला, संसद पर हमला, सोमनाथ मंदिर, जयपुर, मुंबई ट्रेन विस्फोट इन सभी हमलों की साजिश पाकिस्तान में रची गई। भारत को हजार छोटे घाव देकर लहुलूहान करने की जिया उल हक की रणनीति पर पाकिस्तान चलता आया है। भारत से पांच युद्ध लड़ने के बाद भी वह नहीं बदला है। आज भी वह अपनी इसी रणनीति पर कायम है।
लादेन को छिपाया, US से लिए पैसे
फरेब, मक्कारी और धोखेबाजी पाकिस्तान के रग-रग में है। 9/11 के मुख्य साजिशकर्ता और अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को वह अपने यहां ऐबटाबाद में छिपाए रखा। हैरान करने वाली बात है कि लादने को ढूंढने के लिए वह अमेरिका से लाखों डॉलर लिए। यह अमेरिका और दुनिया की आंखों में सीधे धूल झोंकना था। सोवियत-अफगान युद्ध जो कि 1979 से 1989 तक चला, रूस को वहां से निकालने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से अरबों डॉलर लिए और तालिबान को ट्रेनिंग देकर रूस के खिलाफ खड़ा किया। मतलब पैसों के लिए यह देश अपने सम्मान को गिरवी को भी गिरवी रखने से नहीं हिचकता। कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने नेशनल असेंबली में अमेरिका पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल 'टॉयलेट पेपर' की तरह किया। उनका यह बयान बताता है कि कैसे पाकिस्तान पैसे लेकर खुद का इस्तेमाल होने देता रहा है।
पैसे के लिए गिरवी रख देता है अपना इमान
इतना ही नहीं, उस मुल्क की सोच, नैतिकता और मूल्य क्या होंगे जो लड़ाई में मारे गए अपने सैनिकों को अपनाने से मना कर दे। 1999 में कारगिल की लड़ाई में मारे गए अपने सैनिकों के शव लेने से उसने इंकार कर दिए। भारतीय सैनिकों ने मारे गए इन पाकिस्तानी सैनिकों को अपनी सरजमीं में सम्मान के साथ दफ्न किया। पैसों के लिए पाकिस्तान किसी भी देश के आगे बिछ जाता है। कभी चीन से तो कभी अमेरिका से वह खैरात मांगता रहा है। सऊदी अरब, यूएई जैसे खाड़ी के देश उसके हाथ में कुछ न कुछ पकड़ाते रहे हैं। आज हालत यह है कि दूसरों के दिए गए 'दान एवं खैरात' से पाकिस्तान खुद को खड़ा रख पाया है।
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यह भी बंद हो जाए तो उसकी व्यवस्था को चरमरा कर गिरने में देर नहीं लगेगी। पाकिस्तान के लिए आज पैसा ही सब कुछ है। पैसा देकर उससे कोई भी गलत काम कराया जा सकता है। इसके हुक्मरानों को फजीहत होने, झूठ बोलने और दगाबाजी करने में कोई अफसोस नहीं होता। निर्लज्जता ही इनका स्थायी भाव बन गया है। कहने का मतलब है कि पैसा ही जिसका इमान हो उस देश से मक्कारी, धोखेबाजी और आतंकवाद की ही उम्मीद की जा सकती है, अमन और शांति कि नहीं। उस पर भरोसा करना खुद को धोखे में रखने जैसा है।
