पश्चिम एशिया के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव सामने आया है। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने रविवार को संयुक्त रूप से फलस्तीनी राष्ट्र को औपचारिक मान्यता देने की घोषणा की। यह कदम अमेरिका और इजराइल के विरोध के बावजूद उठाया गया है। राष्ट्रमंडल के इन तीनों देशों की पहल गाजा में जारी युद्ध के बीच इजराइल की कार्रवाइयों के प्रति बढ़ते आक्रोश को दर्शाती है। वहीं इन तीनों देशों के इस कदम पर इजराइल भड़का हुआ दिख रहा है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना "नहीं होगी।"
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (फोटो- ap)
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इजराइल का कड़ा रुख
इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जॉर्डन नदी के पश्चिम में फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होगी।” उन्होंने पश्चिमी देशों के नेताओं पर हमास को "इनाम" देने का आरोप लगाया।
ब्रिटेन का रुख
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य शांति प्रक्रिया को जीवित रखना है। उन्होंने साफ किया कि यह हमास के लिए किसी भी तरह का तोहफा नहीं है। स्टार्मर ने वीडियो संदेश में कहा, “आज ब्रिटेन औपचारिक रूप से फलस्तीन राष्ट्र को मान्यता देता है। यह कदम शांति और द्वि-राष्ट्र समाधान की उम्मीद को पुनर्जीवित करने की दिशा में उठाया गया है।” उन्होंने याद दिलाया कि 75 वर्ष पहले ब्रिटेन ने इजराइल को यहूदी मातृभूमि के रूप में मान्यता दी थी और अब फलस्तीन को मान्यता देकर 150 से अधिक देशों की पंक्ति में शामिल हो गया है।
ऑस्ट्रेलिया और कनाडा का समर्थन
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने कहा कि यह घोषणाएं “द्वि-राष्ट्र समाधान को नई गति देने का हिस्सा” हैं। वहीं, कनाडा ने भी कहा कि यह फैसला एक न्यायसंगत और स्थायी शांति के लिए आवश्यक है।
फलस्तीन की प्रतिक्रिया
फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने ब्रिटेन की घोषणा का स्वागत करते हुए इसे “अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप न्यायपूर्ण शांति कायम करने की दिशा में ऐतिहासिक और आवश्यक कदम” बताया। ब्रिटेन स्थित फलस्तीनी मिशन के प्रमुख हुसम जोमलोट ने कहा कि यह फैसला औपनिवेशिक काल की गलती को सुधारने जैसा है।
अमेरिका का विरोध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ब्रिटेन की यात्रा के दौरान इस योजना का विरोध किया था। उन्होंने कहा, “इस मामले पर मैं प्रधानमंत्री स्टार्मर से असहमत हूं।” अमेरिका और इजराइल दोनों ही इस कदम को हमास और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। आलोचकों का तर्क है कि फलस्तीन की मान्यता व्यावहारिक बदलाव नहीं ला सकेगी क्योंकि वेस्ट बैंक और गाजा अब भी विभाजित हैं और कोई मान्यता प्राप्त राजधानी नहीं है।
ऐतिहासिक संदर्भ
ब्रिटेन और फ्रांस का पश्चिम एशिया की राजनीति में ऐतिहासिक हस्तक्षेप रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात क्षेत्र का विभाजन इन्हीं देशों ने किया था। 1917 का बैल्फोर घोषणापत्र भी ब्रिटेन ने ही तैयार किया था, जिसमें यहूदी मातृभूमि की स्थापना का समर्थन किया गया, लेकिन फलस्तीनियों के अधिकारों की रक्षा संबंधी प्रावधान लंबे समय तक उपेक्षित रहे।
विशेषज्ञों की राय
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (लंदन) की विशेषज्ञ बुर्कू ओजेलिक का मानना है कि फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की मान्यता ऐतिहासिक रूप से अहम है, लेकिन अमेरिका को साथ लिए बिना इससे बड़े पैमाने पर बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है। वहीं, थिंक टैंक चैटहम हाउस की निदेशक ओलिविया ओ'सुलिवन ने इसे “प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक महत्व वाला कदम” बताया, जो द्वि-राष्ट्र समाधान की प्रासंगिकता को बनाए रखने की कोशिश है।
