Malacca Strait, Gibraltar & Red Sea : स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान अपना नियंत्रण और प्रबंधन चाहता है। वह इस पर अमेरिका की कोई भी शर्त मानने के लिए तैयार नहीं है। वह चाहता है कि होर्मुज से गुजरने वाले तेल एवं ईंधन के टैंकर व जहाज उसे 2 मिलियन डॉलर का टोल (शुल्क) दें। यानी कोई टैंकर यदि होर्मुज से गुजरना चाहता है तो उसे वहां से गुजरने की कीमत चुकानी पड़ेगी। यही नहीं, ईरान की एक और मांग है। ईरान का कहना है कि यह टोल उसे डॉलर में नहीं बल्कि युआन में चाहिए। युआन चीन की करेंसी है। दरअसल, ईरान ने समुद्र के प्राकृतिक मार्ग पर टोल लगाने की बात कह अंतरराष्ट्रीय मुक्त नौवहन की जो वैश्विक व्यवस्था है और जो दशकों से चली आ रही है उसे चुनौती दी है। ईरान की मांग एवं शर्त दुनिया भर के समुद्री नौवहन मार्गों पर यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉज ऑफ द सी (UNCLOS) का उल्लंघन है। फिर भी यदि ईरान अपनी शर्त से पीछे नहीं हटता तो सवाल है कि ईंधन के जहाज क्या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरना बंद कर देंगे या उसके दो मिलियन डॉलर टोल का भुगतान कर आगे बढ़ेंगे? एक्सपर्ट की राय है कि ईंधन की अपनी जरूरतों एवं इसकी कमी को देखते हुए देश न चाहते हुए भी ईरान की शर्त मानकर उसे दो मिलियन डॉलर का टोल चुका सकते हैं। तेल या तेल नहीं इन दो विकल्पों में से देश तेल वाले विकल्प को ही चुनेंगे।
सुरक्षित गलियारे उपलब्ध कराने काअधिकार देता है UNCLOS
UNCLOS की अगर बात करें तो इसका चार्टर अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के लिए सुरक्षित गलियारे उपलब्ध कराने के अधिकार का गारंटी देता है। इसका ऑर्टिकल 37 से 44 तक में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि जहाज एवं एयरक्राफ्ट को लगातार एवं अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ने का आधिकार है। यही नहीं किसी देश के क्षेत्राधिकार में यदि कोई जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) आता भी है तो वह देश जहाजों की आवाजाही में न तो कोई अवरोध पैदा कर सकता है और न ही उन्हें रोक सकता है। UNCLOS का आर्टिकल 26 कहता है कि कोई भी देश विशेष सेवाओं को छोड़कर जहाजों से किसी तरह का शुल्क नहीं ले सकता। अगर मान लें कि ईरान की टोल वाली शर्त दुनिया मान लेती है तो क्या होगा? ऐसा शर्त UNCLOS के चार्टर को अप्रासंगिक बना देगा। होर्मुज पर ईरान की शर्त मानना 'बोतल से जिन्न' को बाहर निकालने जैसा होगा।
गलत मिसाल पेश करेगा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
स्टेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की शर्त यदि दुनिया एक बार मान लेती है तो यह विश्व के अन्य जलडमरूमध्य पर टोल वसूलने के लिए एक मिसाल बन जाएगा। इस तरह के सकरे समुद्री रास्ते के नजदीक पड़ने वाले देश, ईरान की तरह शर्त रखत हुए स्ट्रेट में जहाजों से चुंगी और टोल वसूलने का काम शुरू कर सकते हैं। अभी फिलहाल, मामला स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक सीमित है, यदि इसका दायरा बढ़कर अन्य जलडमरूमध्य की तरफ जाता है तो दुनिया के सामने बड़ी विकट स्थिति पैदा हो जाएगी। होर्मुज से अभी तो दुनिया का करीब 20 प्रतिशत ईंधन गुजरता है, तब यह हाल है। विश्व में होर्मुज से भी ज्यादा सकरे और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं जिनसे होकर मालवाहक जहाज एवं टैंकर गुजरते हैं। इसी बारे में पिछले सप्ताह सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने अपनी संसद में दुनिया को याद दिलाते हुए कहा कि वैश्विक ऊर्जा जरूरतों की आपूर्ति करने के लिए स्ट्रेट ऑफ मलक्का कहीं ज्यादा अहम है।
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...तो उस सूरत में क्या होगा?
विदेश मंत्री ने आगे कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जहां सबसे पतला है, वहां भी उसकी चौड़ाई 21 नॉटिकल मील है जबकि इसी बिंदु पर स्ट्रेट ऑफ मलक्का की चौड़ाई महज दो नॉटिकल मील है। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए स्ट्रेट ऑफ मलक्का कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन इसे आसानी से ब्लॉक किया जा सकता है। कच्चे तेल की अगर बात करें तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है जबकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का से करीब 29 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। कुल वैश्विक समुद्री व्यापार को अगर देखें तो होर्मुज से करीब 11 प्रतिशत जबकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का से 24 प्रतिशत समुद्री व्यापार होता है। ऐसे में सिंगापुर मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ मिलकर यदि स्ट्रेट ऑफ मलक्का में टोल वसूलने की तैयारी कर ले या इस समुद्री मार्ग को बाधित या असुरक्षित बना दे तो उस सूरत में क्या होगा?
मलक्का को पार करने में लगता है 20 घंटे का समय
यह समुद्री मार्ग दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए एक तरह से 'लाइफ लाइन' है। मलक्का से जहाजों के निकलने पर यदि रोक लग गई तो चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, लाओस, थाईलैंड, फिलिपींस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की हालत खराब हो जाएगी। ये देश अपनी ऊर्जा जरूरतों एवं व्यापार के लिए करीब-करीब पूरी तरह से इस स्ट्रेट ऑफ मलक्का पर निर्भर हैं। यही नहीं स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पार करने में एक जहाज को लगभग छह घंटे का समय लगता है जबकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का को पार करने में करीब 20 घंटे लगते हैं। इन 20 घंटों के दौरान जहाज को मलक्का के संकीर्ण गलियारे में आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का की ही तरह लाल सागर में मौजूद बाब अल मंदेब भी एक महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य है, इसे 'गेट ऑफ टीयर्स' भी कहा जाता है।
जहाजों को केप ऑफ गुड होप स्ट्रेट के पास से गुजरना होगा
स्वेज नहर की तरफ जाने वाले या उधर से आने वाले जहाजों को बाल अल मंदेब से गुजरना होता है। पूर्वी एवं पश्चिम एशिया को यूरोप एवं उत्तर अफ्रीका से जोड़ने में इस स्ट्रेट की अहम भूमिका है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 10 से 12 प्रतिशत वैश्विक कच्चा तेल और 14 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होता है। अपने सबसे संकीर्ण प्वाइंट पर बॉब अल मंदेब की चौड़ाई 18 नॉटिकल मील है। इस समुद्री मार्ग पर अवरोध होने पर जहाजों को केप ऑफ गुड होप स्ट्रेट के पास से गुजरना होगा।jahaj
इससे समुद्री मार्ग की दूरी और लागत दोनों बढ़ जाएगी। यमन में हूती विद्रोही सक्रिय हैं। इन्हें ईरान समर्थित माना जाता है। ईरान के इशारे पर वे इस जलडमरूमध्य को नौवहन के लिए असुरक्षित बना सकते हैं।
स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर से गुजरते हैं करीब 300 जहाज
इनके अलावा भूमध्यसागर में स्थित स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर भी महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। स्पेन के पुंटा डे टैरिफा और मोरक्को के प्वाइंट सायर्स के बीच स्थित यह स्ट्रेट अपने सबसे संकीर्ण बिंदु पर केलव 8 नॉटिकल मील चौड़ा है। स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर से हर साल अनुमानत: 100,000 और प्रतिदिन करीब 300 जहाज गुजरते हैं। इस रास्ते से विश्व का करीब 10-12 प्रतिशत व्यापार होता है। ईरान की तरह यदि स्पेन भी इस रास्ते पर दो मिलियन डॉलर का टोल वसूलना शुरू कर दे तो रोजाना उसकी कमाई लगभग 600 मिलियन डॉलर हो सकती है। जाहिर है कि ये देश अपनी समुद्री सीमा के करीब इन स्ट्रेट से टोल वसूलना यदि शुरू कर देते हैं तो जहाजों के आवागमन की लागत बढ़ जाएगी। लागत जब बढ़ेगी तो दुनिया भर में वस्तुओं एवं ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी। ईंधन की कीमत बेतहाशा महंगाई लेकर आएगी। ईरान की बात अगर मान ली जाती है तो अन्य देश भी इसी तरह से अपनी कमाई और राजस्व बढ़ाने का जरिया ढूंढ सकते हैं। ऐसा होने पर वैश्विक समुद्री व्यापार का जो बुनियादी ढांचा है वह खतरे में आ सकता है।
