Iran US Peace Deal: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जल्द ही थम सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, ईरान की तरफ से अभी कोई पुख्ता संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन कई कूटनीतिक सूत्रों ने दावा किया कि स्विट्जरलैंड के जिनेवा में दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर दस्तखत हो सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (बाएं) और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा (दाएं)
आखिर कब खुलेगा होर्मुज?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में मौजूदा युद्धविराम को आगे बढ़ाने, रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत के लिए एक रूपरेखा तय करने का प्रावधान शामिल है।
सूत्रों के मुताबिक, जिनेवा को समझौते के हस्ताक्षर समारोह के लिए प्रमुख स्थान के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना भी विकल्पों में शामिल है। इस समझौते को कुछ कूटनीतिक हलकों में 'इस्लामाबाद एग्रीमेंट' कहा जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान ने वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
वेंस भी हो सकते हैं शामिल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ एक 'बेहतरीन समझौता' लगभग तैयार है और अगले कुछ दिनों में इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर यूरोप में हो सकते हैं और इसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल हो सकते हैं।
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प्रस्तावित मसौदे के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर होते ही 60 दिनों का व्यापक युद्धविराम लागू होगा, जिसमें लेबनान सहित सभी मोर्चे शामिल होंगे। इसके अलावा, होर्मुज स्ट्रेट को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा, जिससे वैश्विक ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति सामान्य हो सकेगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए प्रतिबंधों में भी कुछ राहत दी जा सकती है। हालांकि, यह राहत समझौते के क्रियान्वयन और दोनों पक्षों के सहयोग पर निर्भर करेगी। परमाणु मुद्दे पर भी दोनों पक्षों के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति बनने की बात कही जा रही है।
'अभी तक नहीं हुआ कोई समझौता'
हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने बताया कि अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि कतर और पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन अमेरिकी पक्ष बार-बार अपने रुख में बदलाव करता रहा है, जिससे बातचीत जटिल हुई है।
