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चीन का नया Ethnic Unity Law क्या है, उइगरों को क्यों सता रहा इसका डर? समझें पूरा विवाद

चीन हालिया महीनों में लागू हुए Ethnic Unity Law को लेकर आलोचकों के निशाने पर है। आलोचकों का डर है कि ‘जातीय एकता’ के नाम पर कहीं अल्पसंख्यक समुदायों पर अपनी भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और पहचान को छोड़कर बहुसंख्यक चीनी संस्कृति के साथ घुलने-मिलने का दबाव न बढ़ जाए।

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चीन के नए कानून पर विवाद। (फोटो- ai)
Edited by: शिव शुक्ला
Updated Sep 13, 2026, 20:14 IST
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चीन ने देश के अलग-अलग जातीय समुदायों के बीच एकता और सामाजिक समरसता बढ़ाने के उद्देश्य से नया कानून लागू किया है। बीजिंग इसे समानता, भेदभाव कम करने, विकास और राष्ट्रीय एकता की दिशा में अहम कदम बता रहा है। लेकिन चीन के शिनजियांग क्षेत्र में रहने वाले उइगर समुदाय को लेकर मानवाधिकार संगठनों और उइगर कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है। आशंका यह है कि ‘जातीय एकता’ के नाम पर कहीं अल्पसंख्यक समुदायों पर अपनी भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और पहचान को छोड़कर बहुसंख्यक चीनी संस्कृति के साथ घुलने-मिलने का दबाव न बढ़ जाए। ऐसे में हम बात करेंगे कि आखिर चीन का यह नया कानून क्या है? उइगरों को इससे क्या खतरा महसूस हो रहा है? और चीन इन आरोपों पर क्या कहता है? आइए समझते हैं।

क्या है चीन का नया Ethnic Unity Law?

चीन के नए कानून का आधिकारिक नाम Ethnic Unity and Progress Promotion Law है। इसे चीन की शीर्ष विधायी संस्था ने मार्च में मंजूरी दी और यह 1 जुलाई से लागू हो गया। चीन में आधिकारिक तौर पर 56 जातीय समूह माने जाते हैं। इनमें हान चीनी सबसे बड़ा समुदाय है, जबकि उइगर, तिब्बती, मंगोल, कजाख और अन्य समुदाय अल्पसंख्यक हैं। सरकार के मुताबिक नए कानून का उद्देश्य इन सभी समुदायों के बीच समानता और सहयोग बढ़ाना है। इसका जोर एक साझा राष्ट्रीय पहचान विकसित करने और अलग-अलग जातीय समूहों को देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में साथ लेकर चलने पर है।

सबसे बड़ा बदलाव भाषा को लेकर

नए कानून का सबसे अहम हिस्सा शिक्षा और भाषा से जुड़ा है। कानून के अनुच्छेद 15 के मुताबिक बच्चों को स्कूल से पहले की शिक्षा से लेकर अनिवार्य शिक्षा और हाईस्कूल तक मंदारिन चीनी पढ़ाई जाएगी।

चीन में मंदारिन पहले से ही सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख भाषा है। तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया जैसे इलाकों में भी शिक्षा में मंदारिन का इस्तेमाल काफी बढ़ा है।आलोचकों को डर है कि नए कानून के बाद स्थानीय और अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए स्कूलों और सार्वजनिक जीवन में जगह और कम हो सकती है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि किसी समुदाय की संस्कृति और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसलिए शिक्षा में स्थानीय भाषाओं का सीमित होना सांस्कृतिक पहचान को भी प्रभावित कर सकता है।

उइगर और तिब्बती समुदाय क्यों चिंतित हैं?

चीन में करीब 1.1 करोड़ उइगर और लगभग 70 लाख तिब्बती बताए जाते हैं। शिनजियांग में उइगर और तिब्बत में तिब्बती आबादी का बड़ा हिस्सा है। चीन पहले से ही इन समुदायों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने 2018 में अनुमान जताया था कि बड़ी संख्या में उइगर और अन्य तुर्किक मुस्लिम लोगों को चीन के कथित ‘री-एजुकेशन सेंटरों’ में रखा गया था। चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इन केंद्रों को व्यावसायिक प्रशिक्षण और कट्टरपंथ से निपटने के लिए बनाए गए संस्थान बताया था।

तिब्बत के मामले में भी चीन और तिब्बती नेताओं के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। दलाई लामा को चीन अलगाववादी नेता के तौर पर देखता है, जबकि तिब्बती पक्ष चीन की नीतियों पर सांस्कृतिक और धार्मिक हस्तक्षेप के आरोप लगाता रहा है।

आलोचकों को जबरन समानीकरण का डर

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि नया कानून अल्पसंख्यक समुदायों को उनकी विशिष्ट पहचान बनाए रखने के बजाय एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिसे चीनी सरकार तय करती है। आलोचकों का कहना है कि इसका असर केवल भाषा तक सीमित नहीं रहेगा। शिक्षा, मीडिया, धार्मिक गतिविधियों, सार्वजनिक संस्कृति और स्थानीय प्रशासन में भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। उनका दावा है कि तिब्बती, उइगर, मंगोल और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए अपनी भाषा, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सार्वजनिक रूप से बनाए रखने की जगह और सीमित हो सकती है। इसी वजह से मानवाधिकार संगठन इसे ‘जबरन समानीकरण’ यानी अलग-अलग समुदायों को एक जैसी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान में ढालने की कोशिश के रूप में देखते हैं।

विदेशों में रहने वालों पर भी असर?

नए कानून का एक और प्रावधान सबसे ज्यादा चर्चा में है। इसके तहत चीन की सीमा के बाहर मौजूद व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है, अगर उन्हें ‘जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने’ या ‘जातीय अलगाववाद भड़काने’ जैसी गतिविधियों में शामिल माना जाए। इसी प्रावधान ने चीन के बाहर रहने वाले आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में चिंता पैदा की है। ताइवान ने भी आशंका जताई है कि चीन इस प्रावधान का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ कर सकता है जिनके विचार या गतिविधियां बीजिंग को स्वीकार्य नहीं हैं। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अलगाववाद के खिलाफ कड़ा रुख रखता है।

तिब्बती निर्वासित प्रशासन ने भी कानून की आलोचना की है। उसका कहना है कि यह कानून तिब्बती भाषा, धर्म, शिक्षा और पारंपरिक जीवन शैली पर पहले से मौजूद दबाव को और संस्थागत रूप दे सकता है।

चीन ने आलोचनाओं पर क्या कहा?

चीन ने इन आरोपों को खारिज किया है। बीजिंग का कहना है कि पश्चिमी मीडिया ने कानून के विदेशी प्रभाव वाले प्रावधान को गलत तरीके से पेश किया है। चीनी अधिकारियों के मुताबिक, दुनिया के हर देश को अलगाववादी और देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से निपटने का अधिकार है। चीन का कहना है कि विदेशों से होने वाली गैरकानूनी गतिविधियों को रोकना उसकी संप्रभुता, सुरक्षा और विकास हितों की रक्षा के लिए जरूरी है। बीजिंग ने यह भी स्पष्ट किया है कि कानून का उद्देश्य सामान्य अंतरराष्ट्रीय संपर्क, अकादमिक चर्चा, व्यापार या चीन और दूसरे देशों के लोगों के बीच सामान्य आदान-प्रदान को प्रभावित करना नहीं है।

अब महत्वपूर्ण यह होगा कि इसे जमीन पर कैसे लागू किया जाता है। यदि कानून का इस्तेमाल अलग-अलग समुदायों के बीच समान अवसर,भेदभाव खत्म करने और आर्थिक विकास के लिए होता है,तो चीन के दावे के अनुरूप इसका उद्देश्य पूरा हो सकता है। लेकिन अगर ‘एकता’ के नाम पर भाषा, धर्म, संस्कृति या शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति पर अतिरिक्त नियंत्रण लगाया जाता है, तो मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए आने वाले समय में शिनजियांग में शिक्षा, भाषा, धार्मिक गतिविधियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़े नियमों के लागू होने के तरीके पर खास नजर रहेगी।

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