जापान के गिफू प्रांत के गेरो शहर में बनी बेहद खड़ी और संकरी सीढ़ी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसे लोग 'अंतिम भयावह सीढ़ी' कह रहे हैं। इस सीढ़ी (japan ultimate terrifying staircase) पर सिर्फ एक तरफ जंग लगी रेलिंग है और ढलान इतना तेज है कि जरा सी फिसलन जानलेवा हो सकती है। पहले इसका इस्तेमाल मछुआरे करते थे, लेकिन अब इसकी डरावनी बनावट लोगों को हैरान कर रही है। मध्य जापान के गिफू प्रान्त के गेरो शहर में बनी एक बेहद खतरनाक सीढ़ी इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लोग इसे 'अंतिम भयावह सीढ़ी' (The Last Terrifying Stairs) कह रहे हैं।
दुनिया की सबसे डरावनी सीढ़ी! (फोटो: Facebook)
इसकी तस्वीरें और वीडियो देखकर ही लोगों की रूह कांप जाती है, क्योंकि यहां जरा सी चूक सीधे जानलेवा साबित हो सकती है। यह सीढ़ी गेरो शहर के कनायामाचो इलाके में स्थित है और जेआर हिदा ताकायामा स्टेशन से पैदल करीब 10 मिनट की दूरी पर है। पहली नजर में यह किसी आम सीढ़ी जैसी लग सकती है, लेकिन जैसे ही आप पास जाकर देखते हैं। इसकी असलियत सामने आ जाती है। सीढ़ियां बेहद संकरी हैं, जिन पर मुश्किल से एक व्यक्ति खड़ा हो सकता है। हर सीढ़ी की गहराई करीब 20 सेंटीमीटर ही है और रेलिंग भी सिर्फ एक तरफ लगी हुई है। वह भी जंग लगी हुई।
सोशल मीडिया पर यूजर्स ने किए कमेंट्स
द मैनिची रिपोर्ट के मुताबिक इस सीढ़ी की सबसे डरावनी बात इसका बहुत ज्यादा ढलान है। नीचे से देखने पर यह लगभग सीधी दीवार जैसी नजर आती है। कुछ एंगल से तो यह पूरी तरह खड़ी दिखाई देती है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं, “इतना खतरनाक एंगल कैसे हो सकता है?” और “यह तो सीढ़ी कम और दीवार ज्यादा लगती है।” सीढ़ी के पास ही नदी बहती है और आसपास काई जमी रहती है, जिससे फिसलने का खतरा और भी बढ़ जाता है। एक रिपोर्टर ने बताया कि वहां खड़े होकर ही डर लगने लगता है कि अगर पैर फिसल गया तो सीधे नीचे गिरना तय है।
लोगों की मांग पर बनाई गई सीढ़ियां
दरअसल, इस इलाके में ऐसी पत्थर की सीढ़ियां बहुत पुराने समय से मौजूद हैं। पर्यटन विभाग के मुताबिक पास की मेज नदी स्वीटफिश मछली पकड़ने के लिए मशहूर है। पहले मछुआरे नदी तक पहुंचने के लिए इन्हीं सीढ़ियों का इस्तेमाल करते थे। इतिहास की बात करें तो 1959 में इसेवान तूफान और 1961 में मुरोटो तूफान के दौरान इस इलाके में भयंकर बाढ़ आई थी। नदी का पानी बढ़ने से इलाके को काफी नुकसान हुआ था। बाद में 1962 में यहां करीब 10 मीटर ऊंची सुरक्षा दीवार बनाई गई। उसी समय लोगों की मांग पर ये सीढ़ियां भी बनाई गईं ताकि मछुआरे बिना परेशानी नदी तक जा सकें।
इन सीढ़ियों का डिजाइन भी अलग है। आम तौर पर सीढ़ियों में चौड़ाई और ऊंचाई का अनुपात 2:1 होता है, लेकिन यहां यह 1:1 है। यानी सीढ़ियां ऊपर की ओर बहुत तेजी से चढ़ती हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम खर्च में काम पूरा हो सके, लेकिन यही डिजाइन आज इसे बेहद खतरनाक बना रहा है। हालांकि सोशल मीडिया पर यह जगह वायरल हो चुकी है, लेकिन पर्यटन संघ इसे किसी पर्यटन स्थल की तरह प्रचारित नहीं कर रहा है। अधिकारियों का साफ कहना है कि वे इसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते और अगर कोई यहां चढ़ता है तो उसकी जिम्मेदारी खुद की होगी।
