अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र और सेहत के लिए किया जाता है। यह व्रत कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन रखा जाता है। उत्तर भारत में अर्हो अष्टमी के व्रत की महिमा बहुत मानी जाती है। अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ व्रत के चौथे दिन रखा जाता है। दोनों व्रत लगभग समान तरीके से किए जाते हैं लेकिन अहोई के व्रत में तारा देखकर व्रत खोला जाता है। जबकि करवा चौथ में चांद दिखने पर व्रत खोला जाता है। अहोई माता को देवी पार्वती का ही एक स्वरूप माना जाता है और इस व्रत पर उनकी पूजा का भी विधान है।
अहोई व्रत के लिए सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा के लिए गेरू से दीवाल पर अहोई माता का और साथ ही स्याहु व उसकी सात संतानो का चित्र बनाया जाता है। इन चित्रों के सामने चावल, मूली, सिंघाड़े के साथ दीया रखकर कहानी सुनी जाती है। कहानी सुनने के दौरान हाथ में चावल रखें और फिर बाद में सूट या साड़ी में बांध लें। इस पूजा में लोटे में पानी लें और इसके ऊपर करवा चौथ वाले करवे में पानी रखें। इस पानी को दिवाली के बाद पूरे घर में छिड़का जाता है।
शाम को सुबह बनाए गए चित्रों की पूजा करें और चौदह पूरी व आठ पूयों का भोग अहोई माता को लगाएं। बायने में चौदह पूरी या मठरी या काजू रखें। तारा दिखने पर लोटे के पानी से अर्घ्य दें और माता के सामने दीया जलाएं। पूजा का सारा सामान (पूरी, मूली, सिंघाड़े, पूए, चावल और पका खाना) पंडित जी या घर के बड़ों को देते हैं। इसके बाद आशीर्वाद लेकर व्रत खोलें। परंपरा है कि अहोई माता का कैलंडर दिवाली तक घर में लगाया जाता है।