रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों ना हो मंजिल बताती है आपकी यात्रा सफल रही है या फिर असफल। मंजिल को पा लेने से सफर की तमाम मुश्किलें भूलाई जा सकती है। मंगलवार को जब महिला ट्रैप स्पर्धा में नीरू ढांडा ने गोल्ड मेडल पर निशाना साधा तो पूरा देश उनकी सफलता में शरीक हो गया। लेकिन सब बस उनके मेडल का जश्न मना रहे थे, बस नीरू जानती थी कि उसने यहां तक पहुंचने के लिए किन-किन परिस्थितियों का सामना किया है? उधार की बंदूक से निशाने का सफर शुरू करने वाली नीरू पर आज देश के पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर आमजन गर्व कर रहा है, लेकिन रिश्ते के भाई लक्ष्य श्योराण के पिता की भारतीय निर्मित बंदूक से कामचलाऊ निशानों पर निशाना साधने से लेकर एशियाई मंच पर दबदबा कायम करने तक नीरू का सफर बेहद असाधारण रहा है।
नीरू ढांडा (साभार-X/AI)
किसान परिवार में हुआ नीरू का जन्म
अक्सर देखा जाता है कि वैश्विक मंच पर देश का नाम रोशन करने वाले के पीछे की कहानी देश की मिट्टी से जुड़ी होती है। नीरू की कहानी कुछ ऐसी ही है। हरियाणा के जींद जिले के एक किसान की बेटी नीरू के पास 2019 में भोपाल जाने के समय निशानेबाजी का महज छह महीने का अनुभव था। मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी की ओर से उपलब्ध कराई गई मुफ्त बंदूक और कारतूस ने उन्हें इस खेल को आगे बढ़ाने का अवसर दिया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
भाई ने जगाई उम्मीद की लौ
आपको किसी क्षेत्र में कुछ बड़ा करने के लिए एक हीरो की जरूरत होती है। नीरू के लिए वह हीरो बने उनके भाई लक्ष्य। लक्ष्य ने 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था। अपने भाई की उपलब्धि से प्रेरित होकर नीरू ने निशानेबाजी में हाथ आजमाने का फैसला किया।
टिन के डब्बे से गोल्ड का सफर
नीरू पहले अस्थाई रूप से बने टिन के डब्बे पर निशाना साधती थी, लेकिन उसने अपने लक्ष्य को कभी डिगने नहीं दिया। भाई के पिता की बंदूक लेकर उन्होंने भोपाल के एक तालाब के पास अभ्यास किया। वहां टिन के डिब्बे को अस्थायी निशाना बनाकर उन्होंने खुद ही प्रयास और गलतियों के जरिए निशाना साधना सीखा। लक्ष्य के माता-पिता ही उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर आए जहां मुफ्त बंदूक, कारतूस और संस्थागत सहयोग ने उनके शुरुआती प्रयास को अंतरराष्ट्रीय करियर में बदलने में अहम भूमिका निभाई।
नीरू के लिए यह सहयोग बेहद महत्वपूर्ण था। उनके पिता किसान और मां गृहिणी है। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होने के कारण निशानेबाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था।
10 दिन पहले थी खराब स्वास्थ्य
यह स्वर्ण पदक नीरू ने बेहद मुश्किल परिस्थितियों के बीच जीता। प्रतियोगिता से केवल 10 दिन पहले गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। वह पूरे प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा नहीं ले सकीं और पांच दिन तक कुछ नहीं खाया।
कोच ने नहीं टूटने दिया भरोसा
नीरू की तैयारी प्रभावित होने के बावजूद उनके कोच मनशेर सिंह ने उनका ध्यान लक्ष्य पर बनाए रखने में मदद की। उन्होंने कहा, ’’मेरी हालत बहुत खराब थी। मैंने पूरे शिविर में अभ्यास नहीं किया। पांच दिन तक कुछ नहीं खाया। सिर्फ पानी पीती थी। मैं रोज अपने कोच से बात करती थी।’’ नीरू ने कहा, ’’यहां आने के बाद भी मैं उनसे रोज बात करती थी। उन्होंने मेरे से कहा कि अगर मैं चार-पांच दिन अभ्यास नहीं कर पाई तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’’
उन्होंने कहा, ’’जब आपके दिल में पूरा समर्पण हो तो बाधाएं मायने नहीं रखतीं। मुझे अपने परिवार, देश, भारतीय सेना और मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी के लिए जीतना था। मेरे पीछे इतने सारे लोग हैं। जब वे मेरे लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं तो जीतना छोटी बात है।’’
मौसम ने भी ली परीक्षा
बीमारी ने जहां उनकी तैयारियों को प्रभावित किया तो वहीं नागोया में लगातार बारिश और गिरते तापमान ने उनकी तकनीक और मानसिक मजबूती की परीक्षा ली। बारिश से उनकी पकड़ प्रभावित हुई और बंदूक संभालने का परिचित अहसास बदल गया जिससे उन्हें अपना ध्यान भटकने से बचाना पड़ा। नीरू के प्रशिक्षण ने उन्हें ऐसी परिस्थितियों के लिए पहले से तैयार किया था। उनके कोच जानबूझकर अभ्यास के दौरान ध्यान भटकाने वाली परिस्थितियां पैदा करते हैं। वह कभी उनकी जैकेट खींचते हैं तो कभी निशाना साधने की तैयारी के दौरान सामने कुर्सी रख देते हैं।
उन्होंने कहा, ’’हम अभ्यास में ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं जहां हमें ध्यान भटकाने वाली चीजों से लड़ना होता है। हम तेज संगीत और अन्य व्यवधानों के बीच भी अभ्यास करते हैं।’’ नीरू के लिए यह स्वर्ण पदक व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक है। उन्हें उम्मीद है कि इससे भारतीय शॉटगन निशानेबाजों की अगली पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।
सेना को समर्पित किया मेडल
सेना की निशानेबाज नीरू ने अपना पदक देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे सैनिकों को समर्पित किया और कहा कि सेना का प्रतिनिधित्व करने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा बनी रहेगी। उन्होंने कहा, ’’पदोन्नति के अवसर होते हैं लेकिन पदोन्नति मिले या ना मिले, हमें सेना के लिए खेलना है। सैनिक सीमाओं पर तैनात हैं। वे देश के लिए लड़ते हैं और अपने प्राणों की आहुति देते हैं। यह पदक उन्हें समर्पित है।’’ उन्होंने यह स्वर्ण 1978 के एशियाई खेलों के चैंपियन राजा रणजीत सिंह को भी समर्पित किया जिनका इस साल निधन हो गया।
शॉटगन में मेडल जीतने वाली पहली महिला
नीरू महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ स्वर्ण पदक जीतकर एशियाई खेलों में व्यक्तिगत शॉटगन स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं। नीरू ने ऐतिहासिक जीत के बाद कहा, ’’उससे पहले मुझे निशानेबाजी के बारे में कुछ भी पता नहीं था। मेरे रिश्ते के भाई लक्ष्य ने जकार्ता में रजत पदक जीता था। मैं उस पदक से प्रेरित हुई।’’ उन्होंने कहा, ’’मैं निशाना काफी दूर रखती थी और उस पर निशाना लगाने की कोशिश करती थी।’’
