ईशा योग केंद्र में स्थित लिंग भैरवी देवी स्त्रैण दैवीय ऊर्जा को समर्पित ऐसा ही एक स्थान है, जिसे सद्गुरु ने प्राण प्रतिष्ठित किया है। सद्गुरु कहते हैं कि किसी भी समाज में स्त्री प्रकृति की ऊर्जा को उसका स्थान देना बहुत महत्व रखता है। अगर केवल पौरुष ऊर्जा को ही प्रकट किया गया, तो हमारे पास पर्याप्त मात्रा में भोजन तो होगा, किंतु हमारे पास जीवन की गुणवत्ता और सुंदरता नहीं होगी।
कौन हैं लिंग भैरवी देवी?
दुर्लभ है देवी का ये स्वरूप: लिंग भैरवी एक सशक्त, रौद्र स्त्री प्रकृति से जुड़ा ऊर्जा रूप है। लेकिन लिंग स्वरूप में, दैवीय स्त्री ऊर्जा का पूजन बहुत दुर्लभ है। कुछ रूप पहले से मौजूद हैं, पर ऐसे रूप सार्वजानिक परिस्थितियों में नहीं पाए जाते। बहुत ही वीरान जगहों पर ऐसे छोटे-छोटे मंदिर हैं। सद्गुरु के अनुसार शायद पहली बार आम जन-मानस के लिए इस तरह के स्थान को सार्वजनिक किया गया है, और बड़े ही अलग तरह से संभाला जा रहा है।
उपासिका और वैरागनी मां करती हैं पूजा: लिंग भैरवी में श्रद्धालु कई तरह की पूजन प्रक्रियाएं और अनुष्ठान का हिस्सा बन सकते हैं और खास बात ये है कि इन सभी अनुष्ठानों को महिलाओं द्वारा ही संचालित किया जाता है। लिंग भैरवी मंदिर में पूजा के लिए समर्पित महिलाओं को वैरागनी मां और उपासिका के रूप में संबोधित किया जाता है।
लिंग भैरवी देवी के गर्भगृह में देवी के पास केवल यही महिलाएं रह सकती हैं और यहां पुरुषों का रहना वर्जित है। महिलाओं को भारत के कुछ खास मंदिरों में प्रवेश ना मिलने के मुद्दे पर जब एक पत्रकार ने सद्गुरु से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि कैसे भारत में खास उद्देश्यों से मंदिरों का निर्माण किया जाता रहा है। कुछ जगहों पर पुरुषों का जाना भी प्रतिबंधित है। यहां वह लिंग भैरवी का उदाहरण देते हैं।
साढ़े तीन चक्रों के साथ प्राण प्रतिष्ठा: लिंग भैरवी के रूप की विशेषता ये है कि इसमें साधे तीन चक्र प्रतिष्ठित हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक और आधा अनाहत चक्र। स्त्रियोचित ऊर्जा का यह सबसे तीव्र और प्रखर रूप है। यह ऊर्जा इतनी तीव्र है कि यह लोगों के आनुवांशिक तत्वों को भी प्रभावित कर सकती है, इसलिए देवी से जुड़े पूजा-अनुष्ठान के लिए उनके निकट सिर्फ महिलाओं को आने की अनुमति है।
सद्गुरु बताते हैं कि हमारी संस्कृति ही दुनिया में एकमात्र संस्कृति है जो यह मानती है कि ‘देवताओं’ को हमने ही बनाया है। यही वजह है कि हमारे यहां लगभग साढ़े तीन करोड़ देवी-देवता हैं। दरअसल हमने देवता बनाने की पूरी तकनीक विकसित की है। हमने ऊर्जा को एक रूप देना शुरु किया और इन्हें देवों के रूप में पूजा जाता है।
बाएं ओर झुका त्रिशूल: त्रिशूल जीवन के तीन मूलभूत पहलुओं का प्रतीक है। इसे पिंगला, इड़ा और सुषुम्ना या पुरुष, स्त्री और परमात्मा कहा जा सकता है। मानव तंत्र के ऊर्जा शरीर में ये तीन मूल नाड़ियां हैं - बाएं, दाएं और मध्य। ईशा योग केंद्र में लिंग भैरवी के पास लगा त्रिशूल बाईं ओर थोड़ा झुका हुआ है जो स्थान की स्त्रैण प्रकृति का प्रतीक है।
एंटीक्लाकवाइज परिक्रमा: आम तौर पर मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में परिक्रमा की जाती है लेकिन लिंग भैरवी में देवी के पास जाकर बाहर आने की दिशा एंटीक्लाकवाइज यानी बाईं ओर से दाईं ओर है और यह भी इस जगह की स्त्री प्रकृति को प्रदर्शित करता है।
होती हैं कई पूजा-अनुष्ठान: लिंग भैरवी में कई तरह के अनुष्ठान होते हैं, जिसमें अभिषेकम, क्लैश नाशन क्रिया, सर्प सेवा, कर्ण वेदन, माला अर्पण, वस्त्र अर्पण, नेत्र अर्पण, लिंग भैरवी विवाह, भूत शुद्धि विवाह, काल भैरव कर्म और काल भैरव शांति जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
पूर्णिमा को होती है शोभा यात्रा: ईशा योग केंद्र, कोयंबटूर, तमिलनाडु में हर पूर्णिमा को लिंग भैरवी की शोभा यात्रा भी निकाली जाती है और इस अवसर पर देवी अपने स्थान से बाहर आकर ध्यानलिंग के पास जाती हैं जोकि लिंग भैरवी के लिए ऊर्जा का स्रोत भी है।
कई जगहों पर विराजमान हैं लिंग भैरवी: लिंग भैरवी देवी का स्थान सिर्फ ईशा योग केंद्र कोयंबटूर में नहीं है बल्कि सद्गुरु ने उनकी प्राण प्रतिष्ठा नेपाल में भी की है। साथ ही ईशा योग केंद्र, दिल्ली में भी देवी का एक छोटा सा मंदिर मौजूद है।
