Skanda Sashti Vrat Katha (स्कंद षष्ठी व्रत कथा): स्कंद षष्ठी व्रत भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की उपासना के लिए किया जाता है, जिन्होंने दैत्य तारकासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी। यह व्रत बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से शत्रुओं पर विजय, साहस, स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त होती है। भक्त इस व्रत को मनोकामनाओं की पूर्ति, संकटों से मुक्ति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के लिए करते हैं। यह व्रत आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाने वाला माना जाता है। आज स्कंद षष्ठी व्रत है, यहां पढ़ें स्कंद षष्ठी व्रत कथा, तारकासुर वध की कहानी।
स्कंद षष्ठी व्रत कथा (Photo Credit - Ai Image)
Skanda Sashti Vrat Katha 2026 Pdf
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय दैत्य तारकासुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। अपनी तपस्या के बल पर उसने ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव होगा। यह वरदान पाकर वह अत्यंत अहंकारी हो गया। उसे यह विश्वास था कि माता सती के देह-त्याग के बाद भगवान शिव संसार से विरक्त होकर गहन तप में लीन हैं, इसलिए उनका विवाह और पुत्र होना लगभग असंभव है। इसी सोच के साथ उसने तीनों लोकों में अत्याचार और आतंक फैलाना शुरू कर दिया।
तारकासुर के अत्याचारों से देवता, ऋषि और समस्त प्रजा त्रस्त हो गई। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेजा। तब भगवान विष्णु ने समाधान बताते हुए कहा कि यदि शिवजी का विवाह पुनः हो और उनके पुत्र का जन्म हो, तभी तारकासुर का अंत संभव है।
इसके बाद देवताओं ने शिवजी की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने अपने पुष्पबाणों से शिवजी का ध्यान भंग करने का प्रयास किया। इससे शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी, जिससे कामदेव भस्म हो गए। हालांकि, बाद में माता पार्वती की कठोर तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनसे विवाह स्वीकार कर लिया।
समय बीतने पर शिव और पार्वती के दिव्य तेज से एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ, जिनका नाम कार्तिकेय रखा गया। वे छः मुख और बारह भुजाओं वाले थे, और अत्यंत पराक्रमी थे। देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध के लिए भेजा।
कार्तिकेय ने षष्ठी तिथि से युद्ध आरंभ किया, जो लगातार छह दिनों तक चला। यह युद्ध अत्यंत भीषण और निर्णायक था। अंततः सातवें दिन भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य अस्त्र 'शक्ति भाला (वेल)' से तारकासुर का वध कर दिया।
तारकासुर के अंत के साथ ही तीनों लोकों में शांति स्थापित हुई और देवताओं ने आनंदपूर्वक भगवान कार्तिकेय की स्तुति की। इसी विजय की स्मृति में हर वर्ष स्कंद षष्ठी का पर्व मनाया जाता है, जो धर्म की विजय और अधर्म के विनाश का प्रतीक है।
