Navratri Day 5th, Maa Skandmata Vrat Katha: नवरात्रि के पांचवे दिन पढ़ें माता स्कंदमाता की व्रत कथा

Navratri Day 5th, Maa Skandmata Vrat Katha (मां स्कंदमाता व्रत कथा): शारदीय नवरात्रि के पांचवे दिन में मां स्कंदमाता की पूजा का विधान है। इनकी पूजा करने से साधक की सारी मनोकामना पूरी होती है। नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की कथा पढ़ने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। यहां पढ़ें स्कंदमाता व्रत कथा।

Navratri Day 5th, Maa Skandmata Vrat Katha: हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि का बहुत महत्व है। इन दिनों मां पूजा का विधान है। नवरात्रि का चौथा दिन मां स्कंदमाता को समर्पित है। इस दिन पूरे विधि विधान के साथ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इस स्वरूप की पूजा से माता की अविरल व अखण्ड भक्ति प्राप्त होती है। यह स्वरूप ऐसा है कि माता स्कन्दमाता कमल पर विराजमान हैं। इनका नाम पद्मासना भी है। माता के गोद में स्कंद बालक रूप में हैं। इनकी उपासना बहुत ही शिशु की भांति रहकर निश्छल व केवल माता पर ही समर्पित भाव से करना चाहिए।देवी की चार भुजाएं हैं। नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प,बाएं ऊपर वाली भुजा वर मुद्रा में,नीचे वाले में कमल पुष्प है। यहां पढ़ें माता स्कंदमाता की व्रत कथा हिंदी में।

Skandmata Vrat Katha

Skandmata Vrat Katha

Maa Skandmata Vrat Katha In Hindi (मां स्कंदमाता व्रत कथा)

पौराणिक मान्यता के अनुसार स्कंदमाता हिमालय की पुत्री पार्वती हैं जिन्हें माहेश्वरी और गौरी भी कहा जाता है। स्कंदमाता कमल के फूल पर अभय मुद्रा में पाई जाती हैं। माँ का रूप अत्यंत सुन्दर है। उनके चेहरे पर चमक है। इनका चरित्र निष्पक्ष है। इसीलिए इन्हें देवी गौरी भी कहा जाता है। भगवान स्कंद या कार्तिकेय की माता होने के कारण उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। स्कंदमाता प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं की सेनापति थीं। इसी कारण पुराणों में स्कंदमाता को कुमार और शक्ति नाम से महिमामंडित बताया गया है। तरकासुर को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव का पुत्र ही कर सकता है। उसके आंतक को समाप्त करने के लिए भगवान शिव में माता पार्वती से शादी की और उनके पुत्र हुए कार्तिक। तब मां पार्वती ने अपने पुत्र स्कंद (कार्तिकेय) को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करने के लिए स्कंद माता का रूप लिया था। स्कंदमाता से युद्ध प्रशिक्षण लेने के बाद भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया था। तब से ही मां के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा की जानें लगी।

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