Hariyali Teej Ki kahani Hindi Mein: हरियाली तीज का पर्व शिव जी और माता पार्वती को समर्पित है, जो हर साल श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार 14 अगस्त 2026 को शाम 06:46 बजे से श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि का आरंभ हुआ है, जिसका समापन आज 15 अगस्त 2026 को शाम 05:28 बजे होगा। ऐसे में आज 15 अगस्त 2026, शनिवार को ही हरियाली तीज का निर्जला व्रत रखा जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और शिव-शक्ति जी की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और खुशियां बढ़ती हैं। साथ ही पति की लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है।
हरियाली तीज की कथा लिखित में क्या है?
वहीं, कुंवारी कन्याएं योग्य वर की चाह में हरियाली तीज का व्रत रखती हैं। यदि आपने भी आज उपवास रखा है तो हरियाली तीज व्रत की कथा यहां से पढ़ लें, जिसे पढ़ने के बाद ही श्रावण शुक्ल तृतीया तिथि की पूजा को पूर्ण माना जाता है।
हरियाली तीज की कथा क्या है
देवी सती ने अपनी इच्छा से किया विवाह
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्ययुग में माता पार्वती ने दक्ष प्रजापति के घर उनकी पुत्री 'सती' के रूप में जन्म लिया था। देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से भगवान शिव से विवाह किया था। राजा दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे और हर समय उनका विरोध करते थे।
शिव जी ने समझाया देवी सती को
एक बार दक्ष प्रजापति ने अपने महल में भव्य यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री सती और शिव जी को नहीं बुलाया था। जब देवी सती को ये बात पता चली तो उन्होंने वहां जाने की हठ की। शिव जी ने उन्हें बहुत समझाया कि ऐसे बिना बुलाए हमें नहीं जाना चाहिए, लेकिन देवी सती ने उनकी एक बात नहीं मानी और शिव जी की आज्ञा के बिना अपने मायके चली गईं।
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देवी सती ने त्यागे प्राण
दक्ष प्रजापति ने जब देवी सती को यज्ञ में देखा तो उनका और महादेव का बहुत अपमान किया, जिसके बाद देवी सती ने कहा' महादेव के मना करने के बाद भी मैं यहां पर आई हूं और आप मेरे कारण ही उनका अपमान कर रहे हैं। अब मैं किस मुंह से अपने पति शिव के सामने जाऊंगी।' देवी सती को अपने पिता की बातों का बहुत बुरा लगा था, जिसके बाद उन्होंने अपने पिता के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।
शिव जी का भयंकर और रौद्र स्वरूप हुआ प्रकट
भगवान शिव को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया, जिससे उनका अत्यंत भयंकर और रौद्र स्वरूप 'वीरभद्र' प्रकट हुआ। वीरभद्र जी ने दक्ष प्रजापति को उसी समय नष्ट कर दिया। वहीं, शिव जी घोर साधना में लीन हो गए।
शिव जी ने दिया देवी पार्वती को वचन
देवी सती ने शिव जी की आज्ञा का उल्लंघन किया था, जिसके दंड स्वरूप उन्हें 107 जन्मों तक शिव जी को पुन: पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या करनी पड़ी। वहीं, 108वें जन्म में देवी पार्वती का हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म हुआ। इस जन्म में माता पार्वती ने शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सावन माह में शिवलिंग बनाकर पूजा की और वहीं पर तपस्या में लीन हो गईं।
माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी हरियाली तीज पर देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में अपनाने का वचन दिया। इसी वजह से हर साल हरियाली तीज पर शिव जी और माता पार्वती की पूजा की जाती है। साथ ही व्रत रखने और कठिन तपस्या करने का विधान है।
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